अर्थ का सामाजिक व नैतिक  मूल्य- दर्शनशास्त्रीय परिपेक्ष्य में

 

महेन्द्र कुमार प्रेमी

शोध छात्र (पी-एच.डी.), स्वामी विवेकानन्द स्मृति तुलनात्मक धर्म, दर्शन एवं योग अध्ययनशाला, पं. रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय, रायपुर छत्तीसगढ़

 

 

सारांश- 

मानव कल्याण के निहितार्थ सबसे बड़ी विशेषता यह है कि जीवन को उपयोगी व क्रियाशील  बनाने हेतु आर्थिक कार्यप्रणाली का होना आवश्यक है। दार्शनिक मान्यताआंें के आधार पर समाजिक जीवन का संबंध अर्थ पर निर्भर करता है, जिससे संपूर्ण मानव जाति को नैतिक मूल्य के साथ - साथ आर्थिक मूल्य जीवनचर्या को सार्थक बनाते हंै। दार्शनिकों ने मानव जीवन को सर्वाधिक प्रभावित करने वाला एवं सुविधाजनक बनाने हेतु अर्थ के महत्व को पहला स्थान दिया है जो कि प्राचीन वैदिक परम्पंरा से लेकर आज तक मानव मूल्य को स्थिरता प्रदान करता रहा है। अर्थ सामाजिक सुविधा व अनुशासन के लिए व्यवहारिक रूप से गणना, संकलन व आदान - प्रदान के आर्थिक  सिद्धंात पर तर्कसंगत तथा बौद्धिक रूप से व्यवस्थित जीवन का विशेष पक्ष है। दर्शनशास्त्रीय  परिपेक्ष्य में अर्थ मानव जीवन के बौद्धिक क्षमता एवं कार्यकुशलता पर अधिक बल देता है। मानव जीवन को सहज,सरल तथा व्यवस्थित रूप प्रदान करने हेतु अर्थ का विशेष महत्व है। गणितीय तथा तर्कसिद्धांत दर्शनशास्त्र की प्राचीन शाखा है जो कि किसी देश या राज्य के मजदूर से लेकर राजा तक के स्तर को प्रभावित करने वाले कारक थे जो वर्तमान में भी गतिशील है।

 

अर्थ व्यवस्था सदियों से मानव जीवन का एक समाजिक विनिमय की स्ंास्था है जिसका प्रत्यक्ष उदाहरण बाजार व्यवस्था है। दर्शनशास्त्रीय  परिपेक्ष में वैदिक युग में चार आश्रमों का वर्णन है जिसमें अर्थ का विशेष महत्व है। चार्वाक दर्शन में अर्थ को मानव जीवन हेतु आवश्यक वस्तु माना गया है। अर्थ एक ऐसी व्यवस्था व क्रियाशील संस्था है जो मानव को सामाजिक सीमा प्रदान कर उनके नैतिक व समाजिक  मूल्य के स्तर को ऊंचा उठाता व प्रभावशाली बनाता है।

 

 

प्रस्तावना- नेैतिक व सामाजिक मूल्य मूलतः आर्थिक विकास के स्तर पर निर्भर करता है। मानव जीवन की आवश्यकताओं की पूर्ति प्राथमिक रूप से अर्थ रूपी आर्थिक अर्जन, उपार्जन व संचयन पर केन्द्रित होती है जिसके द्वारा व्यक्ति के नैतिक व सामाजिक मूल्य उसके अर्थ के अनुसार व्यक्तित्व व गुणवŸाा की पहचान की जाती है। आर्थिक कार्यप्रणाली  मानव जीवन के सामाजिक मान्यताओं के साथ घनिष्ठ संबंध है जिसके अभाव में जीवन की गतिशीलता में मंदता अर्थात् गिरावट आ जाती है। वही अधिकता होने पर उच्चता व तेजी से परिवर्तन हो जाता है।

 

 

मानव का वास्तविक जीवन स्तर उसके विकास के रचनात्मक कार्यप्रणाली, सुविधायुक्त रहन-सहन के तरीके व विलासितापूर्ण जीवन, समाज में एक प्रभावशासली व्यक्तित्व स्थापित करती है। अर्थ का मूल्य नितांत बौध्दिक क्षमता , कार्यकुशलता, चतुरता और तार्किक विश्लेषणात्मकता के गुणों पर आधारित है। अर्थ का सृजन प्रायः संतुलित जीवन शैली, आर्थिक परिकल्पना, भविष्य के प्रति सजग, समझदारी ,तर्कसंगत वैचारिक दृष्टिकोण व अनुशासन के नीेंव पर आधारित है। अर्थ का अर्जन, उपार्जन तथा निश्चित समय में निश्चित उपयोगिता आर्थिक मूल्य की कुंजी है।

 

दार्शनिक परिप्रेक्ष्य में अर्थ का मूल्य अनुशासनात्मक लेन-देन, व्यवहारिक ज्ञान, वैचारिक सिध्दांत जो मानव कल्याण हेतु सुव्यवस्थित,रचनात्मक विकास की वैेधानिक अवधारणा है। जिसका उल्लेख प्राचीन वैदिक ग्रंथों में स्पष्ट किया गया है जिसमें आश्रम व्यवस्था व पुरूषार्थ मुख्य है। प्रकृति प्रदत्त वस्तुओं का उपभोग ,प्राकृतिक नियमों की समझ तथा प्राकृतिक संसाधनों की उपयोगिता व संरक्षण आर्थिक विकास के सिध्दांत का महत्वपूर्ण व मजबूत आर्थिक अवधरणा के  केन्द्रबिन्दु हंै। प्राचीन सिध्दांत का महत्ता तार्किक दृष्टिकोण व सृजनशील मस्तिष्क की उपज है जो कि समय व मांग की वास्तविक पहचान की सकारात्मक आर्थिक विकास का परिणाम है।

 

अर्थ का मूल्य:-

अर्थ जीवन के प्रत्येक पक्षों हेतु एक महत्वपूर्ण वस्तु है जिसके बदले में आवश्यक वस्तु का विनिमय या आदान-प्रदान की जाती है। प्रायः अर्थ को हम धन-संपŸिा या मुद्रा के रूप में परिभाषित करते हंै जिसके द्वारा हम अपनी मनचाही वस्तु को उसके मूल्य चुका कर हासिल कर सकते हैं। यह प्रक्रिया मानव जीवन को प्रभावित करने वाली प्रत्येक कारकों पर प्रभाव डालती है क्योंकि अर्थ के बिना किसी वस्तु को हम बिना मूल्य चुकाये प्राप्त नहीं कर सकते। मूल्य किसी वस्तु का निश्चित की हुई लागत है जिसका सार्वभौमिक रूप से विभिन्न देशों, कालों व स्थानों में अलग-अलग होती है। अर्थ का मूल्य मानक तात्कालिक अर्थव्यवस्था पर निर्भर करती है। अर्थ में एक अप्रत्यक्ष शक्ति निहित होती है जिसके द्वारा उसके स्वामी उसका उपयोग जीवन मूल्य के अनुसार अपने लाभ के निमित्त करता है। अर्थ का मूल्य जीवन के भौतिक आवश्यकताओं को पूर्ण करने में महत्वपूर्ण योगदान प्रदान करता है दार्शनिक दृष्टि से देखा जाए तो उसकी वास्तविक मूल्य रचनात्मक रूप से सामाजिक व्यवहार में आदान - प्रदान की व्यवस्थित प्रक्रिया है। जिसके द्वारा किसी वस्तु का तर्कसंगत रूप से मूल्यांकन कर विशेष एवं निश्चित अनुपात में मान्यता दी जाती है।

 

अर्थ निश्चित तौर पर प्रत्येक वस्तु का लेन - देन विनिमय तथा आदान - प्रदान की वह व्यवास्था है जिसको  इस्तेमाल में या व्यवहार में लाई जाती है। अर्थ का मूल्य से संबंध किसी वस्तु की गुणवत्ता से है जिसके द्वारा समाज में उसके महत्व पर प्रभावी होता है। मानव जीवन चाहे भौतिक पक्ष हो, सामाजिक, राजनैतिक या आर्थिक व धार्मिक सभी स्तर पर अर्थ का मूल्य अपना विशेष स्थान व महत्व है। जीवन के विकास के स्तर को ऊंचा उठाने मेें अर्थ प्रथम सीढ़ि है जिसके बिना विकास की कल्पना  नही की जा सकती। वर्तमान में यदि धन है तो बल है, बल है तो जीवन है, जीवन है तो  व्यक्ति का मूल्य है । इसके अभाव में जीवन की पहिया व विकास की गति रूक-सी जाती है। सपना अधूरी सी प्रतीत होती है। अर्थ के मूल्य के संबंध में अमत्र्य सेन (1987) ने अपनी लेख नीतिशास्त्र और अर्थशास्त्र में यह उल्लेख किया है कि अर्थ तर्कसंगत रूप से स्वार्थ की वह धरणा है जिसके द्वारा व्यक्ति अपनी मनचाही वस्तु का कीमत चुका कर उसे प्राप्त कर लेता है। अर्थ किसी व्यति की साधन सपन्नता व पहचान है जो उसे सामाजिक स्तर पर दूसरों से अलग करता है। एक सामान्य व्यक्ति की तुलना जिसके पास वस्तु विनिमय करने या मूल्य चुकाने की कोई साधन उपलब्ध नही होती इसी से उसका सामाजिक स्तर का मूल्य परिलक्षित होता है।    

अर्थ का सामाजिक व नैतिक  मूल्य:-

प्राचीन भारतीय शास्त्रोंे जिसमें वेद का सर्वोच्च स्थान है में मानव के जीवन चक्र की निरंतरता का वर्णन है। उसी जीवन चक्र को चलने चलाने के लिए एक पद्धति का निर्माण किया गया है। इस पद्धति से ही जीवन के लक्ष्य तक पहुंचने का उपक्रम किया गया है। भारतीय दार्शनिकों ने जीवन की गहराई तक पहुंचने हेतु मानव जीवन दर्शन का दिशा निर्धारित किया। दिशा निर्धारण में सामाजिक संगठन को भी शामिल किया। दूसरे शब्दों में जीवन के परिचालन में जीवन दर्शन या जीवन व पद्धति काम में आती है। जीवन एक दर्शन है जिसका मूल्य पुरूषार्थ है जो परिकल्पना नही बल्कि एक वास्तविकता है। मनुष्य को जीवन जीने के लिए अपनी लौकिक इच्छाओं अर्थात, भौतिक इच्छाओं की भी पूर्ति करनी होती है। अर्थात् दार्शनिक विश्वदृष्टिकोण से भौतिक वस्तु जीवन अस्तित्व के लिए आवश्यक है। शास्त्रों में लौकिक व पारलैकिक जीवन से संबंध मानव जीवन के पुरूषार्थ का वर्णन किया गया है वे चार प्रकार है - धर्म, अर्थ काम और मोक्ष। जो कि पुरूषार्थ की वास्तविक समग्रता में जीवन की समग्रता चरितार्थ होती है। जिसके आदर्शांे  पर चलना ही मनुष्य का अंतिम उद्देश्य है।

 

नैतिक तथा सामाजिक दृष्टि से मानव की सम्पूर्णता अर्थ से होती है जिसके द्वारा मनुष्य अपना जीवन जीता है। दर्शनशास्त्रीय परिपेक्ष्य में अर्थ का मूल्य उक्त चार पुरूषार्थ में विशेष है। पुरूषार्थ की अवधारणा आश्रम व्यवस्था से जुड़ी हुई है - जिसमें चार - ब्रह्मचर्य, गृहस्थ  वानप्रस्थ व सन्यास  सम्बद्ध है। इन्हीं के माध्यम से मनुष्य ज्ञान, भावना और क्रिया की पूर्ति करने हेतु निर्देशित है। पुरूषार्थांे में अर्थ का महत्वपूर्ण स्थान दिया गया है। दार्शनिकों द्वारा मनुष्य के जीवन में अर्थका महत्व स्वीकार किया गया है। कहा गया है कि बिना धन के धर्म नहीं होती और भूखे  भजन न होहिं गोपाला।शरीर से धर्म की क्रियाएॅ सम्पन्न होती है, परन्तु शरीर की रक्षा के लिए अर्थ की आवश्यकता होती है। अर्थ के विषय में महाभारत के अनेक स्थानों में वर्णन मिलता है। यज्ञ , दान, सेवा आदि जितनी धार्मिक क्रियाएॅ है उनके लिए धन सम्पत्ति की आवश्यकता होती है। अतः धन नही तो धर्म भी नही । महाभारत के उद्योग पर्व (72-23-24)में उद्घृत किया गया है कि - अर्थ उच्चतम धर्म है, धन से ही स्वर्ग की प्राप्ति होती है।

 

’’धनमाहुः परं धर्म धने सर्वप्रतिष्ठतम्।

जीवन्ति धनिनो लोके मृता येत्वधना नरा।।’’

 

जिसके पास धन नहीं है वह मृतक के समान है। अर्थहीन व्यक्ति ग्रीष्म की सूखी सरिता के समान है। प्राचीन कालीन महापुरूषों ने भी अर्थ की उपयोगिता सिद्ध की है।

 

नीतिशास्त्र में कहा गया है कि जिसके पास धन है वहीं अच्छें कुल और उच्च वर्चस्व वाला माना जाता है , वही पंडितज्ञानी, गुणज्ञ तथा दर्शनीय भी माना गया है। अर्थ के मूल्य को प्रकाशित करते हुए महाभारत मेें कहा गया है कि धनात् सवति धर्मो हि धारणादूेति निश्चयः (शांति पर्व 90.18) अर्थात् अर्थ के प्राप्त करने का सदैव कारण है अर्थ का फल काम होता है।

 

चार्वाक दर्शन में अर्थ का नैतिक व सामाजिक मूल्य पर प्रकाश डाला गया है। उनके अनुसार सुख प्राप्त करना ही जीवन का अंतिम उद्देश्य है। चार्वाकों का कहना है कि कांटों के डर से गुलाब के फूल से दूर भागना मूर्खता है। उसी तरह केवल जीवन के दुखों को ही देखकर जीवन से विमुख होना एक बड़ी गलती है। चार्वाकों का यह भी कहना है  कि कोई बुद्धिमान व्यक्ति अन्न को इसलिये नहीं छोड़ता कि उसमें भूसा लगा है। जानवरों के द्वारा खेत के फसल के उजाड़ देने के डर से किसान खेती करना नहीं छोड़ सकते। चार्वाकों ने तो यहाॅ तक कहा है कि-

 

’’यावज्जीवेत्् सुख्ंा जीवेत् ऋणं कृत्वा घृतं पिबेत्।

भस्मीभूतस्य देहस्य पुनरागनं कुतः ।।

 

जब तक जीओं सुख से जीओं और ¬ऋण लेकर घृत पीओ।शरीर को राख बनाए जाने पर वह दुबारा नहीं मिल सकता। उपरोक्त  कथनों से यह स्पष्ट होता है कि अर्थ का नैतिक व सामाजिक मूल्य सबसे उच्च है। अर्थ का नैतिक व सामाजिक दृष्टि से व्यक्ति व समाज के निर्माण में अहम् योगदान है। समाज में व्यक्ति की आवश्यकताएॅ होती है मनुष्य के जीवन में धन का परम मूल्य है। अर्थ मानव जीवन के आवश्यकता पूर्ति की वह कुंजी है जिसके द्वारा विकास के चरम यात्रा पूरी की जा सकती है। मानव जीवन के निहितार्थ व कल्याण के लिए नैतिक व सामाजिक दृष्टि से अर्थ का मूल्य सर्वोच्च स्थान रखता है। वेद, शास्त्रों व महाकाव्यों जैसे महाभारत रामायण इत्यादि में भी अर्थ के नैतिक व सामाजिक मूल्यों का वर्णन किया गया है।

 

अतः अर्थ भविष्य के विकास कार्यों हेतु वास्तविक जरूरी वस्तु है। आर्थिक प्रणाली एक सुरक्षित व व्यवस्थित नैतिक सामजिक सिद्धांत की वह व्यवस्था है जिसके माध्यम से मानव जीवन को सुविधायुक्त मजबूत, प्रभावशाली व सुट्टढ़ ,उच्च स्तर के जीवन शैली  प्रदान करने में मदद करती है। आर्थिक विकास मानव की बौद्धिक तथा कार्यकुशलता पर निर्भर करता है व उसके नैतिक तथा सामाजिक दृष्टि से समाज में गतिशीलता तथा व्यक्ति के व्यक्तित्व के स्तर को उच्च व प्रभावशाली बनाता है।

 

निष्कर्ष: -

दार्शनशास्त्रीय सिद्धांत प्रायः तर्क संगत, तार्किक मूल्यांकन पर आधारित होता है जिसका मूल उद्देश्य समस्या के जड़ तक पहुंचना होता है। उपरोंक्त लेख से यह स्पष्ट होता है कि अर्थ का मूल्य जीवन के प्रत्येक पक्षों हेतु आवश्यक वस्तु है, विकास की कल्पना धनाभाव से नहीं की जा सकती । व्यक्ति समाज व राष्ट्र के विकास में अर्थ का विशेष मूल्य व महत्व है। व्यक्ति केे विकास से ही समाज व राष्ट्र का विकास संभव है क्योंकि किसी राष्ट्र की विकास उसके अर्थ या संसाधानों पर निर्भर करता है। अतः अर्थ का नैतिक व सामाजिक मूल्य दर्शनशास्त्रीय परिपेक्ष्य में आदि से लेकर वर्तमान में अभी अत्यंत आवश्यकता की वस्तु है, जिसके अभाव में किसी देश , समाज  या व्यक्ति के विकास की कल्पना भी नही की जा सकती है। व्यक्ति का नैतिक व सामाजिक मूल्य का स्तर का आकलन अर्थ के अधिकता व निम्नता के आधार पर किया जा सकता है। ठीक इसी प्रकार से किसी राष्ट्र की सामाजिक व नैतिक मूल्य का स्तर का आकलन उसके आर्थिक संसाधनों के उपलब्धता से लगाया जा सकता है कि वह कितना प्रभावी व शक्तिशाली है।

 

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Received on 10.09.2013       Modified on 11.11.2013

Accepted on 26.11.2013      © A&V Publication all right reserved

Int. J. Rev. & Res. Social Sci. 1(2): Oct. - Dec. 2013; Page 31-33