छत्तीसगढ़ के घुमन्तु बच्चों की सामाजिक-शैक्षणिक स्थिति: छत्तीसगढ़ के विभिन्न रेल्वे स्टेशनों के घुमन्तु बच्चों के विशेष संदर्भ में एक मानववैज्ञानिक अन्वेषण

 

उमराव सिंह एवं जितेन्द्र कुमार प्रेमी

मानवविज्ञान अध्ययपनशाला, पं. रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय रायपुर (छ.ग.) 492010

*Corresponding Author E-mail: jitendra_rsu@yahoo.co.in

 

सारांश- 

भारतीय जाति व्यवस्था के कुछ घुमन्तुपन की प्रकृति से युक्त जातियाॅ जैसे नट, देवार, डंगचगहा इत्यादि छत्तीसगढ़ में निवासरत जातियों के बालक-बालिकाए, शहरों के मलीन बस्तियों के आर्थिकतंग परिवारों के बच्चों तथा अनाथ बच्चों में स्वाभाविक रूप से अर्थअर्जन के कार्याें में संलग्नता देखी जाती है। नट जाति के बच्चे अक्सर रेल डिब्ब¨ं इत्यादि में खेल-तमाशा दिखाकर भीख मांगते हैं व कुछ बच्चे रेल डिब्ब¨ं में झाडू पोछा लगाते हुए भीख मांगते देखे जाते है। भारत में बच्चों की इस स्थिति के लिए जाति व्यवस्था, गरीबी या अनाथपन मुख्य कारण हंै। यद्यपि भारत आज एक विकासशील देश है और यहाॅ तेजी से नगरीकरण और औद्योगिकरण की प्रक्रिया जोरो पर है जिसकी गति उदारवादी नीतियों के बाद से और भी तेज हो गई है। इस प्रक्रिया ने ग्रामीण तथा निम्न आय स्तर के लोगों को रोजगार की तलाश में शहरों की ओर आकर्षित किया है, परिणामस्वरूप नगरों के चारों तरफ विशेषकर रेल्वे स्टेशनों के आस-पास मलिन बस्तियों के विस्तार को बढ़ावा मिला है। इससे एक जटिल सामाजिक समस्या तब आती है जब इन्ही बस्तियों के बच्चों को अर्थअर्जन हेतु भीख मांगते, खेल-तमाशा दिखते, खाली बोतल या रद्दी बिनते हुए देखे जाते है। प्रत्यक्ष रूप से ये बालक-बालिकाएं शैक्षणिक गतिविधियों से दूर होते चले जाते हैं जो इनके भविष्य तथा राष्ट्र के विकास के लिए नकारात्मक दिशा एवं दशा निर्धारित करते हैं। उद्देश्य स्वरूप उपर्युक्त रूप से वंचित व उपेक्षित अनाथ, बेघर तथा धुमन्तु बालक-बालिकाओं में अशिक्षा की स्थिति तथा कारणों का अध्ययन करने के लिए भारत के मध्य-पूर्व में स्थित राज्य छत्तीसगढ़ के 23 रेल्वे स्टेशनों में पाए गए बालक-बालिकाओं से तथ्य एवं आंकड़े संकलित किये गए है। दैव निदर्शन विधि द्वारा 88 बालक तथा 36 बालिकाओं (कुल 124 बालक-बालिकाओं) पर किए गए अध्ययन से प्राप्त तथ्यों के अनुसार 49, 30, तथा 21, बालक-बालिकाएं क्रमशः घुमन्तु, अनाथ तथा बेघर थे। इनमें से अधिकांत 66ः बच्चे कभी स्कूल नहीं गए और बाकी जो बच्चे स्कूल गए थे वे अधिकतम 2 री या 3री कक्षा तक ही पढ़ पाए थे। इनमें से वे बच्चे जिनके माता या पिता या दोनो जीवित हैंे उनमें से अधिकतर पालक इनकी शिक्षा पर गंभीरता नही दिखाते। इसके बदले इन्हें उनके माता-पिता अथवा पालक द्वारा  अर्थअर्जन हेतु भीख मांगने, खेल-तमाशा दिखानें या रेल डिब्ब¨ं की साफ-सफाई कर भीख मांगने के लिए भेज दिया जाता है। एसेे बालक-बालिकाएं जो अनाथ थे, वे शिक्षा ग्रहण करने में अक्षम थे क्योंकि उनके पास अवसर एवं साधन नहीं थे। निःशुल्क तथा अनिवार्य शिक्षा का अधिकार कानून के युग में भी शिक्षा से वंचित इन बालक-बालिकाओं का उचित पुनर्वास की व्यवस्था की जानी चाहिए जिसमें आवासीय आधुनिकतम शिक्षा की सुविधा अनिवार्य रूप से सम्मिलित हो।

 

प्रस्तावना

जाति व्यवस्था भारतीय संस्कृति की एक प्रमुख विशेषता है। इनमें से छत्तीसगढ़ की कुछ जातियां जैसे नट, डंगचगा, देवार आदि की प्रकृति ही घुमन्तुपन का रहा है क्योंकि वे विभिन्न क्षेत्रों में घुम -घुमकर खेल-तमाशा दिखाते हैं।

 

इस व्यवसाय में उके बच्चों की पूरी भागीदारी होती है। खेल-तमाशा दिखाने में बच्चों की भूमिका ज्यादा महत्वपूर्ण ह¨ते हैं। ऐसे परिवार कालांतर में रेलगाड़ियों से अधिक दूरी तय करके भरण-पोषण की कोशिश करते हैं। इसके अगले चरण में ऐसे परिवार रेल्वे स्टेशनां के आसपास रहने लगते हैं जिससे उनके बच्चों का ध्यान पूर्णतः रोजी-रोटी पैसा कमाने की ओर प्रवृत्त हो जाता है। इसीतरह जिन जातियों की संस्कृति में घुमन्तुपन नहीं है परन्तु इनमें आर्थिक परेशानियां है तो ऐसी स्थिति में इनके बच्चे भी रेल्वे स्टेशनों में भीख मांगने झाडू-पोछा करने या गुटखा बेचने जैसे अवैध कार्याें को करके दैनिक जीवन गुजारते हैं।

 

वर्तमान शिक्षा व्यवस्था के दौर में यदि भारतीय परिप्रेक्ष्य में बात की जाए तो देश कें बाल विकास तथा बाल संरक्षण के उद्देश्य से संविधान के अनुच्छेद 24 के माध्यम से तथा शिक्षा के अधिकार कानून के द्वारा कदम उठाए गए हैं। शिक्षा, बाल अधिकार का मुद्दा है बाल अधिकार 18 वर्ष से नीचे के सभी मानव जाति के मौलिक अधिकार तथा उनमें निहित अधिकार हैं (वर्मा, 2008)। वर्तमान भारतीय समाज में बहुत अधिक संख्या में बच्चे आर्थिक गतिविधियों में लगे हुए हैं (गौतम, वही) जिनमें लाखों बच्चे रेल्वे स्टेशनों में भीख मांगते, कचड़ा बिनते, गुटखा या फल्ली बेचते तथा खेल-तमाशा दिखाते देखे जाते हंै।

   

बाल अधिकार के मुद्दे पर शिक्षा का सुदृढ़ीकरण के परिप्रेक्ष्य में शिक्षा का अधिकार कानून अभी तक का सबसे प्रमुख कदम रहा है जिसमें निःशुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा का अधिकार अधिनियम 2009 (आरटीई अधिनियम) के अस्तित्व में आने के बाद 6-14 वर्ष तक के सभी बच्चों को प्राथमिक स्तर (कक्षा-8) तक शिक्षा के मौलिक अधिकार की गारंटी प्राप्त हो गई है (सिन्हा, 2012)। सर्व शिक्षा अभियान के द्वारा 6-14 वर्ष आयु वर्ग के सभी बच्चों को प्रारंभिक शिक्षा प्रदान करना उद्देश्य बनाया गया है।

 

उपर्युक्त तमाम प्रयासों के बावजूद सहारनपुर में 15000 बाल श्रमिक लड़की की नक्काशी के काम में लगे हुए हैं। वाराणसी में 5000 बच्चे रेशम बूनने के उद्यमों में कार्यरत है (मिश्र, 2007)

 

इस तरह से शैक्षणिक सुअवसर तथा नागरिक अधिकार संबंध्ी संवैधानिक गारंटी के बावजूद व्यापक स्तर पर लाखों बच्चे अपने इन अधिकारों से वंचित हैं (वर्मा , वही)।

 

समस्या का वर्णन (क्पेबतपचजपवद व िच्तवइसमउ )

बालक-बालिकाओं में अनाथपन, बेघरपन या घुमन्तुपन की स्थिति के कारण अशैक्षणिक स्थिति से ग्रसित होना आज एक वैश्विक समस्या है। विकासशील देशों में नगरीकरण के कारण शहरों तथा मलीन बस्तियों के विस्तार से बच्चों में यह स्थिति अधिक देखी जा रही है। इसी कारण विश्व के 120 लाख बच्चें मजदूर हैं जिनमें से भारत में सबसे अधिक हैं। पंडित नेहरू के उस कथन में जिसमें उन्होनें कहा था कि बच्चों की आंखों में मैं भारत का भविष्य देखता हूॅॅ। वास्तव में बच्चे ही किसी भी देश के भावी नागरिक होते हैं इस सिद्धांत को व्यवहारिक रूप से प्रदान करने में तब कठिनाई आती है जब बढ़ती नगरीकरण से ग्रामीण गरीब आकर्षित होते हैं और रोजगार के तलाश में शहरों की अ¨र पलायन करने के लिए विवश होते हैं। इस प्रघटना से मलिन बस्तियों का निर्माण होता है और जो बस्तियाॅ रेल्वे स्टेशनों से करीब होते हैं उन बस्तियों के बच्चों की पहुंच बहुत दूर -दूर तक होती जाती है क्योंक ऐसे बच्चे आर्थिक पूर्ति के उद्देश्य से रेल्वे स्टेशन को माध्यम बनाकर शहर-दर-शहर भटकते रहते हैं। हम आज के समय में ऐसे लाखों बच्चे देख सकते हैं जो अपना बचपन रेल्वे स्टेशनों में बिताते हैं। यह सामाजिक-आर्थिक समस्या जहां एक ओर देश की प्रगति में बाधक है, वहीं दूसरी ओर बच्चों को सड़कों व रेल्वे स्टेशनों में आवारा, अनाथ एवं घुमन्तु के रूप में जीवन बिताने तथा भीड़भाड़ या होटलों में ‘‘छोटू’’ कहे जाने को मजबूर कर दिया है जिसका विपरित प्रभाव उनके बाल मानसिकता पर पड़ता है।

 

पूर्व में इस तरह के विषय¨ं पर अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर जो कार्य या अध्ययन हुए हैं उनमें टेन्टेको(1993) ने फिलीपिन्स के ऐसे बेघर व अनाथ बच्चे जो सड़कों पर जीवन व्यतीत कर रहे थे उन्हे संकट में बताते हुए कहा कि फिलीपिन्स के 91 प्रतिशत व्यक्ति जो एच.आई.व्ही. संक्रमित हैं, उनकी उम्र 15-44 वर्ष के बीच हैं और संक्रमण की दर 45 प्रतिशत है। इनमें बेघर बच्चों की संख्या ज्यादा प्रभावित हैं, जो गरीबी के कारण सड़कों पर रहते हैं या काम करते हैं। इसी तरह 2004 में अरक्जू (ब्राजील) में अब्दील गालील व उनके सहयोगियों ने 58 ऐसे परिवारों में कार्य किया जो अपना जीवन सड़क पर गुजारते थे साथ ही इनके जीवन से जुड़ी आम समस्याओं को सामने लाकर बताया कि इनमें से अधिकांश परिवार ऐसे थे जिनमें सिर्फ माता-पिता में से कोई एक ही उपस्थित हैं या जीवित हैं। ये किसी मलीन बस्तियों या निम्न आय परिवार के हैं। शिक्षा का स्तर भी कम है। बेरोजगारी तथा नशे की आदते हैं या ये परिवार किसी अन्य स्थान से विस्थापित होकर यहां पहुंचे हैं। अब ये परिवार अपनी आर्थिक सहायता हेतु अपने बच्चों को बाल मजदूरी जिसमें खेल-तमाशा दिखाना, भीख मांगना, ट्रेन में झाडू -पोंछा लगाना आदि कार्याें को कराते हैं।

 

यह समस्या वैश्विक है केवल भारत में ही नहीं विश्व के अनेक देशों में बच्चों की स्थिति उपेक्षित है। एक अनुमान के अनुसार सन् 2001 में पूरे विश्व में 120 लाख बाल मजदूर थे जिसमें सबसे अधिक भारत में थे। बच्चों पर उनके परिवार, माता-पिता का अनदेखापन व उपेक्षित किया जाना आदि स्थितियां भारत के संदर्भ में भी सामान्यतः पायी जाती हंै। यही कारण है कि निदर्शन प्राप्त करने के लिए भारत के मध्य पूर्व में स्थित राज्य छत्तीसगढ़ के सिर्फ 30 दिनों के सर्वेक्षण द्वारा 124 ऐसे बच्चे मिल गये जिनमें से अधिकांश बच्चे कभी स्कूल नहीं गए हैं, वे खेल-तमाशा दिखाकर लोगों से भीख मांगा करते हैं। जबकि राज्य में प्राथमिक शिक्षा के लिए अनेक योजनाएं लागू हैं।

 

राष्ट्र के विकास के लिए बच्चों का संपूर्ण विकास एक अत्यंत ही रूचिपूर्ण एवं जनसुरक्षा की दृष्टि से काफी महत्वपूर्ण विषय है। ऐसी परिस्थिति में इस समस्या को अध्ययन हेतु चयन करने का मुख्य कारण यही है कि देश की प्रगति के वर्तमान दौर, जिसमें हम भारत को एक उभरती हुई आर्थिक महाशक्ति के रूप में देख रहे हैं, शिक्षा, तथा कुपोषण की समस्या से निजात पाने के लिए एक पैकेज के रूप में शिक्षा का अधिकार कानून तथा सर्वशिक्षा अभियान चलाया जा रहा है । खाद्य सुरक्षा संबंधी खाद्य सुरक्षा कानून पारित कर दिया गया 

है। परन्तु इन तमाम प्रयत्नों के बाद भी आज बचपन उपेक्षित है। कुछ बच्चे आज भी सड़कों, रेल्वे स्टेशनों, बस अड्डों, धर्म स्थलों, गलि मोहल्लों इत्यादि में किसी न किसी तरह से भीख मांगते दिखाई देते हैं। जब तक योजना निर्माणकर्ताओं द्वारा योजना का लाभ देश के सभी वर्ग तक विस्तारित नहीं हो जाता तब तक विकास की कल्पना, मात्र कल्पना रह जाएगी। अतः संकट में फंसे बचपन को विद्यालयों कीे कक्षाओं में बैठाने के भी प्रयास की जानी चाहिए।

 

अध्ययन के उद्देश्य

वर्तमान अध्ययन के निम्नलिखित उद्देश्य हैं।

1.       छत्तीसगढ़ के विभिन्न रेल्वे स्टेशनों में पाये जाने वाले घुमन्तु बच्चों के घुमन्तुपन संबंधी सामाजिक स्थिति को ज्ञात करना।

2.       छत्तीसगढ़ के विभिन्न रेल्वे स्टेशनों में पाये गये घुमन्तु बच्चों की शैक्षणिक स्थिति तथा इनके शैक्षिक पिछड़ेपन के कारणों को जानना।

3.       छत्तीसगढ़ के विभिन्न रेल्वे स्टेशनों में पाये गये घुमन्तु बच्चों के माता-पिता अथवा पालकों की शैक्षिक स्थिति को प्रकट करना।

 

शोध प्रविधियाँ

वर्तमान शोध पत्र, क्षेत्र्ाकार्य अध्ययन प्रविधि द्वारा वर्तमान शिक्षा व्यवस्था से वंचित विभिन्न रेल्वे स्टेशनों के घुमन्तु बालक-बालिकाओं पर आधारित है। इस मुद्दे को साक्ष्य स्वरूप प्राप्त करने के लिए भारत के मध्य-पूर्व में स्थित राज्य छत्तीसगढ़ के विभिन्न 23 रेल्वे स्टेशनों में रहकर दैनिक जीवन व्यतीत करने वाले 88 बालक तथा 36 बालिकाओं, इस तरह कुल 124 अनाथ, बेघर तथा घुमन्तु बालक-बालिकाओं का अध्ययन किया गया है। इस अध्ययन में दैव निर्दशन विधि के द्वारा स्टेशनों तथा सूचनादाता घुमन्तु बालक-बालिकाओं को चिन्हांकित किया गया है। सूचनादाता घुमन्तु बालक-बालिकाओं का गहन साक्षात्कार (प्दकमचजी प्दजमतअपमू) एक संरचित अनुसूची द्वारा किया गया है।

 

परिणाम एवं विवेचना

घुमन्तु बच्चों की सामाजिक प्रस्थिति

तालिका 1 के अनुसार छत्तीसगढ़ के रेल्वे स्टेशनों से अन्वेषित बालक-बालिकाओं में से सर्वाधिक 49.18 प्रतिशत बालक-बालिकाएं घुमन्तुपन की प्रस्थिति के पाये गये हैं। घुमन्तुपन से तात्पर्य उन बालक-बालिकाओं से हैं जिनके माता या पिता या दोनो जीवित हैं तथा उनकी क¨ई स्थायी या अस्थायी बस्ती है और ऐसे बच्चे दिन में भीख मांगकर, रद्दी बिनकर या खेल-तमाशा दिखाने के द्वारा पैसे अर्जित करके शाम को घर वापस आ जाते हैं। इस तरह के बालक-बालिकाओं में से 33.06 प्रतिशत बालक तथा 16.12 प्रतिशत बालिकाएं थी।इसी तरह जिन बालक या बालिकाओं के माता-पिता अर्थात दोनों पालकों की मृत्यु हो गई हो या जिसकी पैतृक स्थिति ज्ञात न हो उन्हें अनाथ कहा जाता है। वर्तमान अध्ययन में 30 प्रतिशत अनाथ बालक-बालिकाएं पाए गए जिनमें बालकों की संख्या 22ण्58 प्रतिशत तथा बालिकाओं की कुल संख्या केवल 7ण्25 प्रतिशत ही है। अगले क्रम में वर्तमान अध्ययन के दौरान 21 प्रतिशत बेघर बालक-बालिकाएं मिले थे। बेघर से तात्पर्य वे बच्चे जिनके माता या पिता या दोनों हैं परन्तु उनका कहीं स्थायी घर नहीं हैं, वे घुमन्तु जीवन बिताते हैं तथा ऐसे बच्चे अधिक समय तक पालक के संपर्क में नहीं रहते। स्वेच्छा से ही दूर-दूर तक रेल्वे स्टेशनों में रहकर भीख मांगने के द्वरा उदरपूर्ती करते हैं।इस तरह के बालक-बालिकाओं में से 15.32 प्रतिशत बालक तथा 5.64 प्रतिशत बालिकाएं थी।

 

घुमन्तुु बच्चों की शैक्षणिक स्थिति

अध्ययन के इस भाग में घुमन्तु बालक-बालिकाओं की शैक्षणिक स्थिति का आंकलन किया गया है। प्राप्त परिणामों को तालिका क्र-2 में प्रदर्शित किया गया है। जिसके अनुसार सर्वाधिक 66 प्रतिशत बालक-बालिकाएं निरक्षर थे जो कभी स्कूल ही नहीं गए थे जिसमें बालकों की संख्या 67 प्रतिशत तथा 64 प्रतिशत बालिकाएं थी।दूसरे क्रम में प्राथमिक कक्षा से कम अर्थात 5 वीं से कम पढ़े हुए 24 प्रतिशत बच्चे थे। इसी तरह 5 प्रतिशत बालक-बालिकाएं 5वीं कक्षा तक की पढ़ाई पूरे कर चुके थे। 5वीं कक्षा तक की पढ़ाई पूरी किये हुए बच्चों में बालकों की संख्या 6 प्रतिशत थी जबकि बालिकाओं की संख्या भी 6 प्रतिशत थी। पांचवीं से अधिक किन्तु आठवीं कक्षा अर्थात पूर्व माध्यमिक शिक्षा से कम कक्षा तक की  पढ़ाई करने वाले घुमन्तु बच्चों की संख्या 6 प्रतिशत थी इसमें बालकों की संख्या 8 प्रतिशत तथा बालिकाओं की संख्या शून्य थी। अगले क्रम में पूर्व माध्यमिक कक्षा अर्थात् आठवीं तक की पढ़ाई करने वाल बच्चों की संख्या केवल 3 प्रतिशत थी। इनमें बालकों की संख्या 3 प्रतिशत तथा बालिकाओं की संख्या भी 3 प्रतिशत थी।

 

अध्ययन न कर पाने का कारण

तालिका क्रमांक-3 के अनुसार ऐसे 66 प्रतिशत बच्चे ज¨ कभी स्कूल नहीं गये थे उसके उस स्थिति के कारणों की जानकारी लेने पर अलग-अलग तथ्य सामने आये।

 

तालिका क्र-3 के अनुसार सर्वाधिक 30‐48 प्रतिशत बच्चों को उनके माता-पिता ही कभी ही स्कूल नहीं भेजते थे। जबकि 22 प्रतिशत के माता-पिता नहीं होने के कारण वे पढने में असमर्थ थे।अगले क्रम में 18 प्रतिशत बालकों व 13 प्रतिशत बालिकाओं (कुल 20‐73 प्रतिशत) को घर में भोजन के अभाव के कारण भीख मांगना पड़ता था जिसके कारण उन्हें स्कूल जाने का कभी अवसर ही नहंी मिला। जबकि 16 प्रतिशत बच्चें घर के बाहर काम करने जाने की विवशता के कारण उन्हे कभी स्कूल जाने का अवसर ही नहीं मिल पाया था।

 

पालकों की शैक्षणिक स्थिति

एक सामान्य मान्यता है कि वर्तमान समय में पालक यदि अशिक्षित होता है ऐसी स्थिति में भी वह बच्चों को पढ़ाने पर ध्यान देता है परन्तु वंचित बच्चों के संदर्भ में तालिका 3 में अवलोकित आंकड़ो के अनुसार 30‐48 प्रतिशत बच्चों के पालकों पर यह बात लागू नहीं होती है। इसके कई कारण हो सकते हैं। इसलिए सबसे पहले पालकों की शैक्षणिक स्थिति पर प्रकाश डाला गया है जिसे तालिका 4 5 में प्रदर्शित किया गया है।

 

भारत एक पितृसत्तात्मक समाज है तथा यहां बच्चों पर प्रमुख प्रभाव पिता का होता है। इसलिए यह भी आवश्यक हो जाता है कि पिता आर्थिक व शैक्षणिक रूप से कितना सक्षम है। इससे संबंधित तालिका क्र-4 के अनुसार सर्वाधिक 37‐90 प्रतिशत बच्चों के पिता निरक्षर थे तथा 27‐41प्रतिशत बालक-बालिकाओं को अपने पिता की शैक्षणिक स्थिति के संबंध में जानकारी नहीं थी। इनमे 28 प्रतिशत बालक तथा 25 प्रतिशत बालिकाएं थी। इसी तरह 18 प्रतिशत बच्चों के अनुसार उनके पिता केवल प्राथमिक कक्षा तक पढ़े थे जिसमें सर्वाधिक 22प्रतिशत बालकों के पिता व 8 प्रतिशत बालिकाओं के पिता थे।

 

समाज वैज्ञानिक दृष्टिकोण से देखा जाए तो किसी बच्चे के जीवन के लिए पारिवारिक संरचना में माता-पिता दोनों से सरोकार होना आवश्यक होता है परन्तु कुद परिस्थितियां है जिसके कारण जो बच्चे अनाथ हैं उनका तो दोनों पालकों से कोई सरोकार नहीं होता है। जिन बच्चों के माता-पिता का दोनों में से कोई एक जीवित है या साथ में है तो ऐसी स्थिति में भारतीय समाज में बच्चे का अधिक समय माता के साथ बितता है इसलिए बालक या बालिका की वैचारिक तथा शैक्षणिक विकास के लिए माता का भी शिक्षित हानेा समय की मांग है।

 

तालिका क्र-5 के अनुसार बालक व बालिकाओं के कुल जनसंख्या में से 38 प्रतिशत तथा 37 प्रतिशत बालकों की माताएं निरक्षर थी। दूसरे क्रम में 23 प्रतिशत बच्चों की माताएं प्राथमिक कक्षा तक शिक्षित थी जबकि क्रमशः बालक तथा बालिकाओं के कुल प्राप्त संख्या का 30 प्रतिशत बालक व 8 प्रतिशत बालिकाओं को अपनी माताओं की शैक्षणिक स्थिति के संबंध में कोई ज्ञान नहीं था। तीसरे क्रम में 10 प्रतिशत बच्चों की माताएं प्राथमिक कक्षा अर्थात 5वीं तक पढ़ी थी।

 

समस्या का मानववैज्ञानिक विवेचना

मानववैज्ञानिक दृष्टिकोण से तात्पर्य है समस्या का कार्य-कारण संबंध। भारतीय समाज में बच्चों की एक अलग भूमिका होती है जिसमें उन्हें परिवार में रहकर पारिवारिक सदस्यों द्वारा समाजीकरण की प्रक्रिया से गुजरना होता है। उनका समाजीकरण ही यह निश्चित करता है कि उस बच्चे के व्यवहार तथा विकास की दशा एवं दिशा क्या होगी। परिवार के साथ-साथ बच्चों को राष्ट्र के विकास की धारा से जोड़ने तथा राष्ट्रीय संस्कार निर्मित करने के लिए संविधान द्वारा बाल सुरक्षा अधिकार द्वारा संरक्षण प्रदान किया गया है। परन्तु भारत की सामाजिक संरचना में परिवार की भूमिका उस समय हासिये पर चली जाती है जब वह पालक बच्चों के सरोकार से दूर हो जाते हैं या दूर होने गलते हैं। अर्थात् ऐसे परिवार बच्चों के जीवन को गंभीरता से नहीं लेते। इसका कारण है कि पालकों में वैश्विक दृष्टिकोण का न होना तथा राष्ट्र के मुख्य धारा से न जुड़ पाना।

 

जो बच्चे प्रतिदिन सुबह घर परिवार से निकलकर स्कूल जाते हैं उसका दैनिक जीवन स्कूल के वातावरण में गुजरता है परन्तु जो बच्चा मोहल्लें में रूक जाता है किसी कारण से कभी स्कूल नहीं जा पाता उसका दैनिक जीवन के लिए घुमन्तुपन तथा बेघरपन की स्थिति प्राप्त कर लेना स्वाभाविक होता है। उसे स्कूल के रास्ते पर ले जाने के लिए जागरूक एवं जिम्मेदार हाथ सामने नहीं आते। ऐसे बच्चे वे बच्चे होते हैं जो निम्नतर आय स्तर वाले परिवार से संबंधित होते हंै। इसलिए वे रेल्वे स्टेशनों में भीख मांगने लगते हैं और प्रतिदिन कुछ आमदनी हो जाने के आकर्षण में ऐसे बच्चों का तथा उसके पालकों का ध्यान भी आमदनी की ओर चला जाता है। जो बच्चे कुछ रद्दी या पुराने बोतल बीनकर या गुटखा आदि बेचकर पैसा कमाने लगते हैं तब स्वाभाविक रूप से उसका ध्यान किताबों की ओर नहीं जाता और ये बच्चे रेल्वे स्टेशनों या इसी तरह भीड़-भाड़ वाले अन्य स्थानों में ही जीवन-यापन करने लगते हैं। इस दौरान उनका सामना अलग-अलग संास्कृतिक पृष्ठभूमि वाले व्यक्तियों से होता है जिसके कारण उनके व्यक्तित्व में आक्रामक्ता एवं भद्दापन प्रदर्शित होने लगते हैं।चूंकि ऐसे बालक-बालिकाएं ऐसे मोहल्ले में रहते हैं जिसे सामान्यतः गंदी बस्तियां कहे जाते हैं। गंदी बस्तियों से तात्पर्य उन गरीबी रेखा के नीचे रहने वाले परिवार जो शहरों के अवांछनीय क्षेत्रों में रहते हैं। उस समुदाय के ज्यादातर परिवार निम्नस्तरीय सामाजिक तथा आर्थिक स्थिति के होते हैं। इसलिए इनके माता व पिता का ज्यादातर समय मजदूरी, उद्योगों में निम्न स्तर के काम, रिक्शा चलाने, झाडू-पोछा के कार्य आदि में संलग्न रहते हैं। इन सभी कारणों से बच्चों से उनका संपर्क एक भौतिक संबंध के रूप में होता है, अभौतिक एवं मार्मिक रूप से नहीं।

 

उपर्युक्त तमाम वातावरण उन्हें शैक्षिक वातावरण सुलभ नहीं कर पाता तथा वे स्वयं की अर्थ अर्जन के लिए निम्न स्तर के कार्याें में लग जाते है या लगा दिये जाते हंै। और दूषित सामाजिक पृष्ठभूमि के कारण से उनमें आक्रामकता तथा भद्दापन की भावना बढ़ती जाती है। कालान्तर में ऐसे बच्चे कभी-कभी कुख्यात् अपराधी बनकर अपने तथा समाज के लिए मुसिबत बन जाते हंै।

 

इस तरह अशैक्षणिक स्थिति तथा असंगठित वातावरण के कारण उनके व्यवहार में होने वाले कारात्मक परिवर्तनों से एक विशेष प्रकार की सामाजिक-सांस्कृतिक समस्या का जन्त हो जाता है।

 

उपसंहार

छत्तीसगढ़ के विभिन्न रेल्वे स्टेशनों में घुमन्तुपन का जीवन-यापन करने वाले अनाथ, बेघर तथा घुमन्तुपन युक्त बालक-बालिकाओं की सामाजिक प्रस्थिति का अध्ययन किया गया जिसमें पाया गया कि अधिकांश बालक-बालिकाएं घुमन्तुपन का जीवन जीने के लिए विवश हैं। इनके माता-पिता द्वारा इन्हें रेल्वे स्टेशनों या कहीं भी काम करने या किसी भी तरह पैसा अर्जित करने के लिए भेज दिये जाते हैं। इसी तरह अनाथ बेघर बच्चे जिनकी अलग-अलग समस्याएं थी जिसके कारण वे उपेक्षित जीवन बिताने तथा रेल्वे स्टेशनों में रोजी-रोटी तलाशने के लिए मजबूर थे। ऐसे बच्चों में से अधिकांश बच्चे विद्यालय या किसी तरह की शैक्षणिक वातावरण से कभी भी नहीं जुड़ पाये थे।

 

इस अध्ययन से प्राप्त परिणामों के प्रकाश में यही कहा जा सकता है कि बच्चों में घुमन्तुपन के लिए उनके माता-पिता की गरीबी, बेरोजगारी तथा अशिक्षा प्रमुख कारण हैं। इसके साथ ही जो बच्चे अनाथ है उनके पास घुमन्तुपन अर्थात् दर-दर भटकते हुए दो वक्त की रोटी की जुगाड़ करने के अलावा कोई और रास्ता नहीं है। बालक जब भीख मांगकर, खेल-तमाशा दिखाकर या ट्रेन की बोगियों में झाडू मारकर रोटी कमाने तक ही सिमित हो तो यह स्थिति एक हद तक गम्भीर नहीं हैं किन्तु जब बात धीरे-धीरे चोरी, लुट, डकैती, मारपीट व हत्या अथवा ऐसे बच्चों के साथ अवैध यौनाचार जैसे घृणित कृत्यों तक पहुंच जाती है तो यह हम सब के लिए एक अतिगंभीर चुनौती बन जाती है। ऐसा सामाजिक वातावरण न केवल ऐसे बच्चों के लिए एक दुःखद एवं खतरनाक परिस्थिति उत्पन्न करता है अपितु एक आम शहरी के लिए भी उतना ही दुःखद एवं खतरनाक स्थिति निर्मित करता है। अतः हम सभी भारत के आम नागरिकों का कत्र्तव्य है कि हमें ऐसे बच्चों का जल्द से जल्द पहचान कर उनके स्थायी एवं व्यवस्थित जीवन के संदर्भ में पुनर्वास प्रक्रिया के विषय में कदम उठाने चाहिए।

 

संदर्भ ग्रंथ सूची

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Received on 08.01.2014       Modified on 15.02.2014

Accepted on 15.03.2014      © A&V Publication all right reserved

Int. J. Rev. & Res. Social Sci. 2(1): Jan. – Mar. 2014; Page 01-06