विन्ध्य क्षेत्र के औषधीय पौधे: उपयोग एवं संरक्षण

 

डा. स्कन्द मिश्रा

वनस्पति विभाग, शासकीय नवीन विज्ञान महाविद्यालय, रीवा (.प्र.) 486001

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विन्ध्य क्षेत्र मध्य प्रदेश के उत्तर-पूर्वी भाग में 23ह् 45’ से 25ह् 30’ उत्तरीय अक्षांश एवं 80025’ से 83058’पूर्वीदेशांतर में स्थित है।क्षेत्र में अमरकंटक, बांधवगढ़, चित्रकूट, धारकुण्डी, कुसमी, बगदरा, छुहिया, रगौली आदि ऐसे महत्वपूर्ण स्थान हैं जहां औषधीय पौधे बहुतायत में आज भी विद्यमान है। अर्थात वन संपदा और औषधीय वृक्षों के दृष्टिकोण से यह एक समृद्ध क्षेत्र है।शोधकर्ता ने विगत तीन वर्षों में क्षेत्र में इस विषय पर अध्ययन तथा सर्वे करके क्षेत्र के औषधीय पौधों तथा जनजातियों एवं ग्रामीणो द्वारा बीमारियों के निदान के लिये किये जाने वाले उपयोग की जानकारी एकत्रित की है। महत्वपूर्ण औषधि पौधों के उपयोग एवं संरक्षण के संबंध में प्रापत जानकारियों से स्पष्ट होता है कि क्षेत्र में औषधीय पौधो के संरक्षण के लिए कोई योजना नहीं है। अतः कई पादप प्रजातियां क्षेत्र से समाप्त हो रही है। वर्तमान में कुछ औषधि वनस्पतियां जैसे सर्पगन्धा, बहेरा, हर्रा, कालीमूसली, सफेदमुसली , सतावर, रत्ती, बैचांदी, मालकांगनी, बचनांग, ब्राम्ही, कालमेघ, कलियारी, असगन्ध, चित्रक आदि केवल पहाड़ी क्षेत्रों एवं वनों तक ही सीमित हो गयी है। वनों के उजड़ने के कारण तथा अत्यधिक चराई आदि के कारण अनेक औषधि वनस्पतियां संकटापन श्रेणी में है। जबकि क्षेत्र में पायी जाने वाली इन औषधि वनस्पतियों का उपयोग आयुर्वेद पद्धति में भी किया जाता है। इस हेतु इनका समय रहते संरक्षण किया जाना चाहिये। ष्शोध पत्र में स्थानीय -68 पादप प्रजातियों के  वानस्पतिक नाम, स्थानीय नाम, कुल, उपयोगी अंग एवं विभिन्न बीमारियों हेतु उपयोग का वर्णन किया गया है, तथा  कुछ महत्वपूर्ण औषधीय पौधों की आवास, प्रकृति, संरक्षण स्थिति एवं वर्तमान में संरक्षण हेतु सुझाव दिये गयें हैं।

अतः आवश्यक है कि यहां कि जलवायु एवं वातावरण को देखते हुए क्षेत्र में प्राकृतिक रूप से उत्पन्न होने वाली इन औषधियों का रोपण एवं संरक्षण किया जावें।

 

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प्रस्तावना

मानव प्रकृति की अनमोल रचना है, प्रकृति में जन्म लेकर उसने जीवन के संधर्ष का रहस्य प्रकृति से सीखा है। जल, जंगल, जमीन, वृक्ष एवं उनके अंग उसके प्रथम सहचर हैं। पौधे उसके जीवन के प्रत्येक क्रिया कलापों में सहभागी रहे हैं। पेट की भूख मिटाने से लेकर सभ्यता, संस्कृति, धर्म, औषधि आदि जीवन एवं विकास से जुड़े समस्त पहलुओं मे वह पौधों का उपयोग करता चला रहा है। प्राचीन काल से ही वनस्पतियों का उपयोग औषधि में होता रहा है। वेद, पुराणों आदि में वनस्पति औषधि के उपयोग के दृष्टांत इस बात की पुष्टि करते हैं। नाना वीर्या औषधिया विभीर्त पृथ्वी नः प्रथतां राध्यतां नः .. पृथिवी सूक्तम् ।। 212।।

 

विन्ध्यांचल पर्वतमाला कि उपत्यकाओं (थ्ववजीपससेद्ध की विस्तृत भूभाग को विन्ध्य भूमि कहा जाता है, विन्ध्य के पूर्वी भाग में यमुना नदी के दक्षिण से लेकर रेवा (नर्मदा) तट की विशाल भूमि बधेलखंड के नाम से जानी जाती है। यह क्षेत्र मध्य प्रदेश के उत्तर-पूर्वी भाग में 23ह् 45’ से 25ह् 30’ उत्तरीय अक्षांश एवं 80025’ से 83058’ पूर्वी देशांतर में स्थित है। बघेलखण्ड मुख्य रूप से पहाडियों, गहरी नदियों एवं प्रपातों क्षेत्र है। पहाड़ी क्षेत्र एवं नदियों के बहने के कारण क्षेत्र के अधिकतर भू-भागों की जलवायु प्रायः नम है जिससे यहां घने वन तथा समृद्ध पादप विभिन्नतायें देखने को मिलती है। क्षेत्र में अमरकंटक, बांधवगढ़, चित्रकूट, धारकुण्डी, कुसमी, बगदरा, छुहिया, रगौली आदि ऐसे महत्वपूर्ण स्थान हैं जहां औषधीय पौधे बहुतायत में आज भी विद्यमान है। अर्थात वन संपदा और औषधीय वृक्षों के दृष्टिकोण से यह एक समृद्ध क्षेत्र है।

 

प्राचीन समय में आयुर्वेद चिकित्सा पद्धति बीमारियों के निदान के लिये भारत में उपयोगी रही है, जिसमें औषधीय पौधों का बहुतायत मात्रा में उपयोग किया जाता रहा है। कालांतर में एलोपैथी के विकास एवं शल्य चिकित्सा में दक्षता प्राप्त होने पर वनस्पति औषधियों का महत्व कम हो गया, लेकिन एलोपैथी औषधियों की विषाक्तता एवं नष्ट हो रही प्रतिरोध क्षमता को देखते हुए औषधीय पौधों का उपयोग पुनः बढ़ता जा रहा है, तथा औषधियों में अधिकांशतया पौधे एवं उनके अंगों का उपयोग ज्यादा से ज्यादा मात्रा में किया जाने लगा है। अनियमित चराई, औषधि दबाव, वनों की कटाई, कृषि हेतु भूमि के उपयोग, बढ़ते औद्योगिकीकरण आदि के कारण देश के अन्य क्षेत्रों की तरह विन्ध्य क्षेत्र में भी औषधि वृक्षों का रहवास उजड़ रहा है। यद्यपि आज भी यह क्षेत्र औषधि वनस्पतियों हेतु एक समृद्ध क्षेत्र है, लेकिन सुनियोजित रूप से उपयोग एवं संरक्षित होने से धीरे-धीरे यह नष्ट हो रहा है। अतः आवश्यक है कि यहां कि जलवायु एवं वातावरण को देखते हुए क्षेत्र में प्राकृतिक रूप से उत्पन्न होने वाली इन औषधियों का रोपण एवं संरक्षण किया जावें।

 

औषधीय पौधों एवं जनजातियों का पारस्परिक संबंध चला रहा है। विन्ध्य क्षेत्र का विषम पहाड़ी धरातल, घने, वन, गहरी नदियां, घाटियां, वन्य प्राणि तथा प्रकृति की खुली गोद, क्षेत्र में विभिन्न पादन प्रजातियों के साथ ही जनजातियों के निवास हेतु सर्वथा उपयुक्त निवास स्थान एवं परिवेश प्रदान करते है। पैराणिक काल से ही यह क्षेत्र जनजातियों के लिये जाना जाता है, मैकल एवं सोन घाटी की लगभग आधी जनसंख्या जनजातीय है। क्षेत्र की जनजातियां औषधि हेतु स्थानीय वनस्पतियों का उपयोग पीढ़ियों से करती चली रही है। आज भी क्षेत्र के अधिकांश गांवों में इसी पद्धति का प्रचलन है। यह जनजातियां केवल इनका उपयोग करती हैं बल्कि इन जीवनदायी औषधियों का संरक्षण भी करती हैं। आधुनिक चिकित्सा पद्धति के आने के कारण जनजातियां पीढ़ियों के अनुभवों से प्राप्त इस ज्ञान को क्रमशः भूलती जा रही है। अतः आवश्यक है कि पौधों के संरक्षण के साथ-साथ इस महत्वपूर्ण औषधीय ज्ञान को क्षेत्र में समाप्त होने के पहले लिपिबद्ध किया जाये। इस हेतु स्थानीय वैज्ञानिकों तथा क्षेत्रीय शोध संस्थानों ने अध्ययन किये हैं, लेकिन अभी तक के अध्ययन अपर्याप्त एवं बहुत ही कम है।

प्राप्त अभिलेखों से पता चलता है कि विन्ध्य क्षेत्र की जनजातियों द्वारा उपयोगी पौधों के सम्बन्ध में अभी तक विस्तृत रूप से अध्ययन नहीं किया गया है। क्षेत्र के संबन्ध में पाण्डे, एवं दास (1991), द्विवेदी एवं पाण्डेय,(1992), लाल एवं दुबे, (1992),  सिकरवार एवं माहेश्वरी, (1992), मिश्रा, .तिवारी, दुबे एवं चटर्जी (1993),   तिवारी, एव मिश्रा (1994), मिश्रा, .तिवारी, एवं चटर्जी (1994), मिश्रा एवं  तिवारी (1995),  सिंह साहू, मिश्रा एवं सिंह (2014), मिश्रा, (2015),  मिश्रा (2015) ने अध्ययन किया है।

 

 

 

 

विधि

बघेलखण्ड के जनजातियों द्वारा उपयोग किये जाने वाले पौधों के संबन्ध में अध्ययन हेतु क्षेत्र के वन अंचलों के वनस्पति एवं विभिन्न जनजातियों के कुल 25 गांवों का सर्वेक्षण किया गया तथा प्रत्येक गांव के स्त्री, पुरूषों एवं वैद्यों से विभिन्न आवश्यकताओं हेतु उपयोग किये जाने वाले पौधे एवं उनके अंगों तथा उपयोग विधि के संबन्ध में जानकारी प्राप्त की गई। पौधों को एकत्रित करके फ्लोरा द्वारा उक्त पौधों की पहचान की गई। कुछ पौधों की पहचान बी.एस.आई. इलाहाबाद द्वारा कराई गई।

 

शोधकर्ता  ने विगत तीन वर्षों से क्षेत्र में इस विषय पर अध्ययन तथा सर्वे करके क्षेत्र के औषधीय पौधों तथा जनजातियों एवं ग्रामीण द्वारा बीमारियों के निदान के लिये किये जाने वाले उपयोग की जानकारी एकत्रित की है। जो तालिका में दी जा रही है।

 

 

 

 

 

निष्कर्ष एवं सुझावः

इस प्रकार तालिका क्रमांक 1 एवं 2 में विन्ध्य क्षेत्र के महत्वपूर्ण औषधि पौधों के उपयोग एवं संरक्षण के संबंध में प्रापत जानकारियों से स्पष्ट होता है कि क्षेत्र में औषधि संरक्षण के लिए कोई योजना नहीं है। अतः कई पादप प्रजातियां क्षेत्र से समाप्त हो रही है। वर्तमान में कुछ औषधि वनस्पतियां जैसे सर्पगन्धा, बहेरा, हर्रा, कालीमूसली, सफेल मूसली, बैचांदी, मालकांगनी बचनांग, ब्राम्ही, कालमेघ, कलियारी, असगन्ध, चित्रक आदि केवल पहाड़ी क्षेत्रों एवं वनों

 

तक ही सीमित हो गयी है। वनों के उजड़ने के कारण तथा अत्यधिक चराई आदि के कारण अनेक औषधि वनस्पतियां संकटापन श्रेणी में है। जबकि क्षेत्र में पायी जाने वाली इन औषधि वनस्पतियों का उपयोग आयुर्वेद पद्धति में भी किया जाता है। इस हेतु इनका समय रहते संरक्षण किया जाना चाहिये।

 

उपरोक्त अध्ययन के निष्कर्ष एवं सुझाव निम्न है:-

1.            विन्ध्य क्षेत्र औषधि वनस्पतियों के संबंध में समृद्ध क्षेत्र है।

2.            क्ष्ेत्र के औषधि सम्पदा का योजनापूर्ण ढंग से तथा संरक्षण के उद्देश्य अभी तक पर्याप्त अध्ययन नहीं किया गया।

3.            औषधि वनस्पतियों एवं दुर्लभ पौधों के संरक्षण हेतु अभी तक प्रभावी कदम नहीं उठाये गये हैं।

4.            यदि क्षेत्र में औषधि पौधों के उत्पादन एवं संरक्षण का कार्य स्थानीय जनजातियों एवं ग्रामीणों के सहयोग से उचित ढंग से शुरू किया जावे तो क्ष्ेत्र की आर्थिक उन्नति बढ़ेगी।

5.            संरक्षण कार्यक्रमों के द्वारा स्थानीय लोगों में जागरूकता आवेगी जिससे वनों को कटाई में रोक लगेगी। साथ ही साथ पर्यावरण के प्रति भी स्थानीय लोग जागरूक होंगे।

6.            क्ष्ेत्र में अनेक प्रजातियां ऐसी है जिनका अभी तक अध्ययन नहीं किया गया इनकी पहचान एवं अध्ययन आवश्यक है क्योंकि इनमें से अनेक वनस्पतियां महत्वपूर्ण औषधियों के रूप में प्रयोग की जा सकती है। अतः इनका रासायनिक विश्लेषण करके उपयोग के संबंध में जानकारी प्राप्त करना आवश्यक है।

7.            अनेक महत्वपूर्ण संकटापन एवं दुर्लभ प्रजातियों के संरक्षण हेतु लम्बी योजनायें चलाई जानी चाहिये इस हेतु अंतर्राष्ट्रीय सहयोग भी लिया जा सकता है।

8.            अनेक प्रजातियां जो क्षेत्र विशेष में सीमित है उनके जीनपूल के संरक्षण हेतु क्षेत्र में प्रभावी ढंग से योजनायें चलाई जानी चाहिये।

9.            क्षेत्र में जिन पौधों पर औषधि दबाव ज्यादा है उनका संरक्षण एवं उत्पादन किया जाना चाहिये तथा स्थानीय लोगों को उनके बदले में दूसरी वनस्पतियों के बारे में जानकारी दी जानी चाहिये।

10.          क्षेत्र के अमरकंटक, बांधवगढ़, चित्रकूट, धारकुण्डी, बगदरा, कुसमी आदि औषधि वनस्पतियों से समृद्ध क्षेत्र को संरक्षित घोषित कर वनों की कटाई, चराई आदि को तुरंत रोका जाना चाहिये तथा यहां औषधीय पौधों का संरक्षण, रोपण एवं सम्वर्धन की जानकारी स्थानीय लोगों को देकर इन पौधों का उत्पादन व्यापक रूप में किया जाना चाहिये।

 

सन्दर्भ सूची -

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2.            द्विवेदी एस.एन., एण्ड पाण्डेय, . (1992): इथनोबाॅटेनिकल स्टडीज आन वाइल्ड एण्ड इन्डीजीनस स्पीसीज आफ विन्ध्यन प्लेटू - 1 - हरबेरियस फ्लोरा, अर्न. इकोनो. टैक्स. बाॅट. एडि. सीरीज (10) 143-150.

3.            लाल, बी. एण्ड व्ही.पी. दुबे (1992): सर्वे आफ प्लान्ट इथनोमेडिसिन आफ अमरकन्टक प्लेटू इन सेन्ट्रल इण्डिया। एग्रो. बायो. रिसर्च 8(1) 29.37.

4.            सिकरवार आर.एल.एस. एण्ड जे.के. माहेश्वरी (1992): सम अनरिकार्डेड इथनो मेडिसिनल प्लान्ट फ्राम अमरकन्टक प्लेटू आफ मध्यप्रदेश। बुले. आफ ट्राइबल रिसर्च एण्ड डेवे. इन्रस्टी भोपाल 20 (1एण्ड2): 19-22.

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7.            एस.के. मिश्रा, ऊषा तिवारी एवं डी. चटर्जी (1994) कन्जरवेशनल आस्पेक्टस आॅफ सम इथनोमेडिसनल प्लान्ट्स आॅफ बांधवगढ़ रीजन। (चतुर्थ) अंतर्राष्ट्रय इथनोबायलोजी कांग्रेस, एन.बी.आर.आई. लखनऊ (17-21 नवम्बर 1994) पी.283.

8.            एस.के. मिश्रा एण्ड ऊषा तिवारी 1995: इथनोबाॅटेनिकल आसपेक्ट्स आॅफ मेडिसिनल प्लान्ट आफ बघेलखण्ड रीजन आॅफ मध्यप्रदेश। 82 इण्डियन साइंस कांग्रेस कलकत्ता, में प्रस्तुत शोधपत्र।

9.            सिंह प्राची, शेरेन्द्र साहू, मिश्रा स्कन्द कुमार एवं सिंह नीता (2014): पोटेन्शियल आॅफ इथनो मेडिसिनल प्लान्ट्स यूज्ड बाई ट्राइबल्स आॅफ सीधी डिस्ट्रिक आॅफ .प्र. रिसर्च जर्नल आॅफ साइन्स एण्ड टेक्नाॅलाजी, वाल्यूम 6(4) पेज 180-184

10.          मिश्रा,स्कन्द कुमार (2015) लेस नोन यूजेज आॅफ इथनो मेडिसिनल प्लान्ट्स एमंग ट्राइब्स आॅफ विन्ध्यन रीजन आॅफ मध्यप्रदेश रिसर्च जर्नल आॅफ साइन्स एण्ड टेक्नाॅलाजी, वाल्यूम 7(2) पेज 180-184

11.          मिश्रा,स्कन्द कुमार (2015) इथनो मेडिसिनल प्लान्ट्स रिसोर्सेज आॅफ ट्राइब्स आॅफ विन्ध्यन रीजन आॅफ मध्यप्रदेश रिसर्च जर्नल फार्मा. साइन्स, वाल्यूम 5(2) पेज 1-5

 

 

 

Received on 11.05.2017       Modified on 22.05.2017

Accepted on 21.06.2017      © A&V Publication all right reserved

Int. J. Rev. and Res. Social Sci. 2017; 5(2): 86-92 .