आतंकवाद का मनोवैज्ञानिक स्वसरूप एवं विश्ले षण
कुसुमलता
शोधार्थीए बरकतुल्लाै विश्वएविद्यालयए भोपालए मण्प्रण्
’ब्वततमेचवदकपदह ।नजीवत म्.उंपसरू ेीपअमदकतंतंरं/हउंपसण्बवउ
शोध सारांश:
प्रस्तुसत शोध आलेख के माध्यंम से वर्तमान संदर्भों में आतंकवाद की स्था0पना करते हुए आतंकवाद का मनोविज्ञानएउसका वैश्विकए राजनीतिक और सामाजिक परिप्रेक्ष्यन में आतंकवाद के उत्सा तक पहुंचने का प्रयास किया गया है। दरअसल विगत शताब्दीस में आतंकवादी घटनाओं.परिघटनाओं की तकनीकी में बहुआयामी परिवर्तन हुआ है। आधुनिक प्रौद्योगिकी उन्नाति व विस्तार ने आंतकवादियों को नई गतिशीलता और मारक क्षमता प्रदान की है। सभी प्रकार के राजनीतिक आंदोलनए चाहे उनका राजनीतिक अभिप्राय कुछ भी होए उन्होंलने पहले पहल इसी प्रकार की रणनीति का प्रयोग करना आरंभ किया। गोयाए महान राजनीतिक चिंतक अडोल्फ हिटलर के अधीन नाजी जर्मनी व स्टा लिन के अधीन सोवियत संघ के सर्वाधिकार शासन ने अपनी राज्यक नीति के रूप में वास्त विक आतंकवाद को ही प्रत्यअक्ष अथवा परोक्ष रूप में अपनाया था। हालांकिए वे इसे सार्वजनिक रूप से कभी स्वीिकार नहीं करते थे।उन राज्योंव में यातनाए प्रताड़ना और प्राणदंड जैसी तकनीकें किसी कानून प्रतिबंधों के बिना अपनाई जाती थीं ताकि लोग भयवश उनकी नीतियों और विचारधाराओं का पालन करेंए निर्वहन करें।उल्लेनखनीय है कि स्टाीलिन की तुलना में माओ ने आतंक का साम्राज्य अधिक व्यानपक रूप से फैलाया। ईरान ने भी खुमैनी के शासन काल के दौरान अधिकतर हिंसक घटनाओं को झेला था जो प्रायरू वामपंथियों व राज्या द्वारा आयोजित की जाती थीं।अधिकांश लोगों का मानना है कि उपेक्षितए उत्पी डि़त और वंचित लोगों द्वारा न्यािय पाने की सामूहिक कार्यवाही ही आतंकवाद है। औरए इस प्रक्रिया में वे हिंसा का आश्रय लेते हैं। परंतु कतिपय संदर्भों में राज्य प्रत्यकक्ष या अप्रत्यहक्ष रूप से आतंकवाद का समर्थन नहीं करता है अपितु प्रोत्सायहन भी देता है। ऐसे में आतंकवादियों का संगठित समूह भी राज्ये त्तरर अभिकर्त्तार के रूप में कार्य करता है। इस आलोक में केग्जैली और विट्टकॉफ जैसे विद्वानों की पूर्ण मान्ययता है कि राज्यय आतंकवाद को किसी भी उद्देश्य के मूल्यां कन में शामिल किया जाना चाहिएए क्योंवकि हिंसात्माक आतंकवाद के कुछ सर्वाधिक निष्ठुूर कार्य राज्यी द्वारा उनके विरूद्ध किए जाते हैं जो उनका विरोध करते हैं।मनोवैज्ञानिक रूप से आतंकवाद का जन्म मानस की शून्याता से होता है। अर्थशास्त्री य रूप से आतंकवाद का जन्मो सापेक्षिक वंचितवाद की अनुभूति से होता है। समाजशास्त्री य दृष्टि से आतंकवाद का जन्म प्रवृत्ति की अनियमित स्थिति के चलते होता है। अस्तुषए आतंकवाद कोई विचारधारा या सिद्धांत नहीं माना जा सकता हैए अपितु यह मूल्यृ आधारित अतिव्यतहृतए दुर्व्यिवह्त तथा अशुद्धि परिवेष्टित अवधारणा है।
ज्ञम्ल्ॅव्त्क्ैरू आतंकवादए मनोविज्ञान
प्रस्तावनाः
आतंकवाद आज विश्वि की बहुत बड़ी एवं गंभीर समस्याक है। विश्वु का कोई भी देशए कोई भी सरकार आतंकवाद से पूरी तरह आश्वशस्तव नहीं है। ऐसे में भारत की संसद पर आतंकवादियों का हमलाए अक्षरधाम मंदिर पर हमला या ताज होटल का हमला या भारत के कश्मीहर या अमेरिका के विश्वआ व्याहपार केंद्र पर हमलाए ये सभी दिल दहलाने वाली आतंकवादी घटनाएं अत्यंकत उल्ले।खनीय हैं। विवेचनार्थएकतिपय विद्वानों ने आतंकवाद की उत्प त्ति का मूल कारण सांप्रदायिकताएगरीबीए असमानताए अशिक्षाए बेरोजगारी आदि को माना है। फिर भी आतंकवाद का मनोवैज्ञानिक अनुशीलन करने पर यह सहज ही अनुभूत है कि आतंकवाद मानव की विक्षिप्त मानसिकता का ही दुष्पजरिणाम है। यह एक प्रकार का मानसिक विचलन है।आलोच्या संदर्भ में प्रोण् अवधेश कुमार ने बहुत सटीक टिप्पजणी की है किष्ष्जिस प्रकार मानसिक रूप से एक विक्षिप्तम व्य क्ति संपूर्ण परिवार के लोगों की चैन उड़ा देता हैए ठीक उसी प्रकार मानसिक रूप से विक्षिप्तरता की निशानी बनकर आतंकवाद ने आज संपूर्ण विश्वर का चैन उड़ा दिया है।सामान्य तरू स्वी कार किया जाता है कि असंतोष को क्रांति की जननी कहा गया है। विश्वच की जितनी भी क्रांतियां हुई हैंए जितने भी आतंकी हमले हुए हैंएउनके पीछे किसी.न.किसी रूप में जन सामान्य़ का असंतोष भी एक मूल कारण रहा है।01
प्रस्तुकति एवं विश्लेकषणरू
मानवीय चिंतन एवं व्य वहार के आलोक में मनोवैज्ञानिक आतंकवाद की बहुत ही सहज एवं सरल वयाख्यान प्रस्तुनत करते हैं।
विद्वानों का मानना है कि शासक वर्ग द्वारा निर्बल वर्ग की उपेक्षाए दमनकारी नीतिए भेदभावपूर्ण व्य वहार आदि सत्तााधारियों के विरूद्ध मनोवैज्ञानिक दृष्टि से एक विद्वेष की भावना पनपने लगती है जो आगे चलकर आतंकवाद को जन्मा देती है। इस परिप्रेक्ष्यट में गोल्डनस्टीीन महोदय के अनुसार इस प्रकार आतंकवाद एक बड़ी आबादी पर अपने मनोवैज्ञानिक प्रभाव से अपनी छोटी शक्ति का विस्ता्र करने लगता है। इसलिए आमतौर पर यह शक्तिहीन साधन बन जाता है।विवेचनार्थएदरअसल आतंक एक मनोवृत्ति का परिचायक है। वैसे तो यह सभी चेतन प्राणियों में पाई जाती है। लेकिन कुछ लोगों में इस प्रवृत्ति की तीव्रता अधिक होती हैए जबकि कुछ में सामान्यर। यदि हम अपने चारों ओर दृष्टिपात करें तो यह सहज ही प्रतीत होता है कि प्रत्येोक चेतन प्राणी कहीं.न.कहींए प्रत्य क्ष अथवा परोक्ष ढंग सेए अपने वर्चस्वि को येन.केन.प्रकारेण अन्य। दूसरों पर थोपने का प्रयास करता नजर आता है।
डॉण् दयानंद शर्मा कहते हैं कि ष्ष्वन प्रांगण में मुक्तस विचरण करते जंगली जानवर या फिर आबादी वाले क्षेत्रों मंू सहम.सहम कर रहने वाले आवारा जावनर भी अपने वर्चस्व को दूसरे वन्य् जीव.जंतुओं पर थोपने का प्रयास करते देखे जा सकते हैं। मानव समाज में यह प्रवृत्ति परिवारए समाजए गांवए कस्बें और शहर तक अपने तेवर दिखाती नजर आती है जिसे ष्दबंगईष् कहा जाता है। दबंगई का प्रतिनिधि यानी कि अगुआ दबंग कहलाता है। जब इस दबंगई का विकराल स्व रूपए राष्ट्री य या अंतरराष्ट्री य स्तदर पर उभरता हैए तब यह आतंकवाद के नाम से जाना जाता है। मनोवैज्ञानिक स्तदर पर दूसरों पर वर्चस्वा स्थािपित करने की भावना अथवा दूसरों में भय पैदा करना ही आतंकवाद का मूल कारण है। सही मायने में दूसरों को भयभीत करनाए क्षति पहुंचाना ही आतंकवाद का उद्देश्यद होता है। इस मनोदशा में व्येक्ति व समाज क्रूरतापूर्वक दूसरों में भय व आतंक पैदा करके अपने विनिर्दिष्टं व संकुचित स्वाैर्थों को पूरा करने का घृणित प्रयास करते हैं।02
ध्याचतव्यम है कि दबंग और आतंकवादी का उद्देश्ये एक ही होता है। दोनों की अपनी संकीर्ण इच्छा्ओं व महत्वात कांक्षाओं को पूरा करने के लिए हिंसा और बल का सहारा लेते हैं। दोनों ही चाहते हैं कि आम लोग उनके अपने विचारों के अनुरूप स्वकयं को ढालें। हालांकिए दोनों में दो महत्व्ै पूर्ण अंतर भी हैं। दबंगई असंगठित भी हो सकती है तथा उसका दायरा और लक्ष्यव सीमित हो सकता है। किंतु आतंकवाद का दायरा सीमाओं से परे है और वह एक राष्ट्रस से लेकर संपूर्ण विश्वि को अपनी चपेट में ले सकता है। आतंकवाद का लक्ष्यऔ सीमित या असीमित किंतु दूरगामी परिणामों पर टिके होते हैं। मनोविज्ञान की दृष्टि में आतंकवाद संगठित हिंसा का रूप है। यह एक सापेक्षिक अवधारणा है। एक दृष्टि में यह क्रांति हैए जबकि दूसरी दृष्टि में आतंकवाद।
डॉण् सुरेन्द्रद वर्मा कहते हैं कि ष्ष्आतंकवाद असहज मनोदशा का सूचक है। यह पाशविकता का दर्पण और सह.अस्तित्वण्.शून्यटता का द्योतक है। आतंकवाद के समर्थित व्यिक्ति व व्य वस्थास को छोड़ए समय को भी अपने विचारों का गुलाम बना लेना चाहते हैं। वह हथेली पर सरसों उगा लेना चाहते हैं।विचार करने पर हमें यह सहज ही ज्ञात होता है कि आतंकवाद के मूल में कहीं.न.कहीं ष्औग्रयष् मनरूसंवेग और ष्हिंसाष् मनोवृत्ति व्यायप्ते रहती है। इसलिए शोकए क्रोधए विजुगुप्सारए हासए उत्सानहए विस्मिय आदि की भांति मनोभावों की श्रेणी में ही रखा जा सकता है। जिस प्रकार विभावए अनुभाव और संचारी भाव के बिना कोई स्था यी भाव रस नहीं बन सकता हैए ठीक उसी प्रकार प्रचलित वैचारिक आधारोंएतार्किक प्रतिपादनोंए सुनिश्चित.परिसीमाओंए संचालित.मान्यसताओं आदि के अभाव में व्यचक्तिगत अथवा सामूहिक हिंसक प्रतिक्रियायें कोई ष्वादष् अथवा ष्सिद्धांतष् नहीं बन सकती हैं।03
सुप्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक प्रोण् आनंदप्रकाश के अनुसारमनोवृत्तिएमनरूसंवेग व मनोभावों को हमेशा.हमेशा के लिए एकबार में समाप्तज नहीं किया जा सकता है। दरअसल किसी भी व्यरक्तित्वए में मनरूसंवेगए मनोवृत्ति व मनोभावों की दशा सागर में लहरों की भांति रहती हैं जो सागर में से ही उठती हैं और सागर में ही विलीन होती रहती हैं। ष्ष्आतंक अथवा भय की मनोदशा का विवेचन भी हमें इसी आधार पर करना चाहिएए क्यों कि आतंकवादी का सदैव के लिए विनाश तो संभव हैए लेकिन आतंकवाद का नहीं। इस तरह आतंकवाद अथवा आतंक एक मनोभाव है जिसका उन्मूशलन संभव नहीं है। इसका नियंत्रण और शमन ही संभव है।04 इस आलोक में भारतीय ष्मनोवैज्ञानिक.दार्शनिक.समीक्षणष् यह मत स्थारपित करते हैं कि व्य4क्ति में समय.समय पर उठते.विलीन होते रहते मनोभाव व्य्क्ति के सामने उपस्थित हो रहीं परिस्थितियों.घटनाओं के स्वातरू महत्व् उ अपेक्षा व्यनक्तिकी अपनी प्रकृति.स्व्भाव की विशिष्टउता से अधिक आच्छाोदित नियंत्रित होते रहते हैं। एक व्याक्ति अपने समक्ष उपस्थित घटना को अपनी प्रकृति के कारण उसे दूसरे प्रकार से ग्रहण करता है।ष्ष्स्व्भावों की भिन्न्तायें किसी.न.किसी रूप में कहीं.न.कहीं घटित घटना.परिघटना के संबंध में व्यरक्तियों की प्रतिक्रियाओं को आमूल.चूल रूप में बदल देती हैं।ष्ष्05 सही मायने में आतंकवाद एक मानसिक विचलन है जिसके मूल में दो सभ्य्ताओं का टकराव सहज ही परिलक्षित होता है। एक ओर आधुनिकता और लोकतंत्रात्महक स्व तंत्रता का हामी सभ्यट समाज है तो दूसरी ओर अतिशय दमनशीलता तथा हठधर्मी रूढि़वादिता के आखिरी अवशेष हैं।
निष्कलर्ष एवं सुझावरू
मनोवैज्ञानिक स्वीएकार करते हैं कि आतंकवादी गतिविधियों के रूप में आतंकवादमानसिक.सामाजिक विकार का एक प्रतिरूप माना जा सकता हैजिसमें सामान्यतरू एक हिंसक समूह द्वारा दूसरे समूह के लोगों के शारीरिक क्षति पहुंचनेए उनकी सम्पत्ति को नष्ट करनेए उस समूह में भय पैदा करने की निरंतरकोशिश की जाती है।इसके साथ.साथ यह हिंसक समूह प्रशासन या लोगों के खिलाफ सार्वजनिक अशांति का माहौल भी पैदा करता है।इसलिए आतंकवाद के मूल में आमतौर पर बर्बरताए हिंसाए क्रूरता और सार्वजनिक या निजी सम्पत्ति का विनाश भी देखने को मिलता है। इन हिंसात्मपक गतिविधियों के पीछे सांप्रदायिक विचारधारा भी कभी.कभी काम करती है।अगर हम अपने देश में देखे तो एक और जहां अपना देश मंगल पर सैटेलाईट भेजने के लिए अपनी पीठ थपथपा रहा हैएवहीं दूसरी ओर भारत मेंए विशेषकर कश्मीनर ;घाटीद्ध में लगभग रोजाना हिंसक घटनाएंवहां के सामाजिक ताने बाने का गला घोट रहे हैं।सुप्रसिद्ध पत्रकार आलोक मेहता कहते हैं कि ष्ष्आतंकवादी परिदृश्या में हिंसात्मलक घटनाएं होती हैं अथवा करवायी जाती हैंएयह विमर्श तो काफी पुराना है।06
आतंकवाद के अनेक स्वीरूप और आयाम हैं। क्षेत्रीयए राष्ट्री य और अंतरराष्ट्री य स्तिर पर आतंकवाद की व्याटपकता ही उसके पक्ष और विपक्ष के कारण गहरी हुई है। ष्ष्आतंकवाद का अंतरूअनुशासनिक अनुशीलन करने के उपरांत यह कहा जा सकता है कि आतंकवाद एक प्रवृत्ति है जिसके माध्यआम से कतिपय असामाजिक व अवांछित तत्व्करन अपनी सभी प्रकार की मांगे मनवाने के लिए अनेकानेक प्रकार से घोर हिंसात्मकक उपायों एवं जघन्यक अमानवीय साधनों तथा शस्त्रा स्त्रोंल का प्रयोग करते हैं। आतंकवादी किसी प्रजातंत्र का विरोध प्रदर्शित करने के लिए प्रभावशाली व शांतिपूर्ण विकल्पोंं के होते हुए भी हिंसा का अनुचित प्रयोग करते हैं।07 आतंकवादियों की पद्धति निश्चवयतरू असंवैधानिक एवं अवांछनीय मानी जा सकती है। फिर भी इस बात की कल्पचना अत्यं त कठिन है कि भारत जैसे विराट आकार वाले संसाधन संपन्नज व संप्रभु राष्ट्रक को आतंकवाद के जरिए कमजोर किया जा सकता हैए परास्तच किया जा सकता है।
संदर्भ सूची
01ण् वर्माए आर्यनए आतंकवाद भारत की सुरक्षा एवं विश्वद की समस्यायए पृण्संण् 67ण्
02ण् दीक्षितए प्रदीप कुमारए आतंकवाद का वैश्विक आयामए चुनौतियां एवं निदानए पृण्संण् 89.90ण्
03ण् फाडि़याए बीण् एलण्ए भारतीय शासन एवं राजनीतिए पृण्संण् 115ण्
04ण् त्रिपाठीए प्रोण् मधुसुदनए राष्ट्री य एकता और आतंकवादए पृण्संण् 57ण्
05ण् भट्टए एसण् केण्ए आतंकवाद का मनोविज्ञानए पृण्संण् 25.26ण्
06ण् राठौड़ए मधुए भारतीय राजनीतिक व्यकवस्थाञए पृण्संण् 31ण्
07ण् दीक्षितए प्रदीप कुमारए आतंकवाद का वैश्विक आयामए चुनौतियां एवं निदानए पृण्संण् 11.12ण्
सहायक संदर्भ ग्रंथ सूची
01ण् एसण् केण् सिन्हारए मिशन कश्मीञरए 2010ए प्रभात प्रकाशनए नई दिल्लीपण्
02ण् दीक्षितए डॉण् प्रदीप कुमारए आतंकवाद का वैश्विक आयामए चुनौतियां एवं निदानए 2012ए अर्पिता प्रकाशनए नई दिल्लीरण्
03ण् पनेरूए डॉण् बीण् आरण्ए भारत विभाजनए 2005ए देवभूमि प्रकाशनए हल्द्वाानीए नैनीताल
04ण् राजेशए सुशीलए आतंकवाद या छाया.युद्धए 2010ए सत्य2 साहित्ये प्रकाशनए नई दिल्ली्ण्
05ण् राजकिशोरए कश्मी र का भविष्ययए 2000ए राजकमल प्रकाशनए दिल्लीिण्
06ण् राठौड़ए मधुए भारतीय राजनीतिक व्यववस्थारए 2007ए जयपुर अविष्काीर पब्लिशर्सए जयपुरण्
07ण् वर्माए आर्यनए आतंकवाद भारत की सुरक्षा एवं विश्वथ की समस्यापए 2013ए जीण् बीण् बुक्सीए नई दिल्लीीण्
08ण् शिवनाथए गए दिनों की धूप.छांवए 2013ए साहित्यस अकादमीए नई दिल्लीाण्
09ण् त्रिपाठीए प्रोण् मधुसुदनए राष्ट्री य एकता और आतंकवादए 2011ए ओमेगा पब्लिकेशंसए नई दिल्लीयण्
Received on 28.10.2018 Modified on 18.11.2018
Accepted on 05.12.2018 © A&V Publications All right reserved
Int. J. Rev. and Res. Social Sci. 2018; 6(4):547-550.