बैगा जनजाति की उत्पत्ति सबंधी किवदंतियां
हरिश कुमार साह1ू, डॉ0 (श्रीमती) वेदवती मण्डावी2
1शोधार्थी, पंडित रविशंकर शुक्ल महाविद्यालय, रायपुर छत्तीसगढ़
2सहायक प्राध्यापक एवं विभागाध्यक्ष (राजनीति विज्ञान विभाग),
शास. वि. या. ता. स्नातकोत्तर स्वशासी महाविद्यालय दुर्ग छत्तीसगढ
’ब्वततमेचवदकपदह ।नजीवत म्.उंपसरू ींतपेीेंीन27011992/हउंपस.बवउ
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जनजाति बहुल राज्य छत्तीसगढ़ की 30.6 जनसंख्या जनजातियों की है । राज्य में निवासरत 42 जनजातियों में से 5 जनजातियों को च्टज्ळ या विशेष पिछड़ी जनजातियों की सूची में शामिल किया गया है । बैगा जनजाति भी उन 5 विशेष पिछड़ी जनजातियों में से एक है । छत्तीसगढ़ और मध्यप्रदेश की सीमा पर मैकल पर्वतों के घने वन में बैगा निवास करते हैं । ये वही बैगा जनजाति है जिनके अध्ययन के लिए वैरियर एल्विन महोदय प्रसिद्ध हैं । एल्विन ने सहभागी अवलोकन करके बैगा जनजाति पर गहन शोध कार्य किया और दि बैगा नामक पुस्तक की रचना की ।
जैसा कि विदित है कि प्रत्येक जनजाति की उत्पत्ति संबंधी अनेक कहानियां होती है जिसे वे आनन्द के साथ सुनाते हैं । ये कहानियां स्वयं की सत्यता तो सिद्ध नहीं कर सकती किन्तु इनके माध्यम से उस जनजाति के विषय में अनेक जानकारी प्राप्त होती है । इन कहानियों में बताए गये सिद्धांतों और बातों को जनजातियाँ गम्भीरता से सुनते हैं और जीवन में उतारते हैं ।
इसी प्रकार बैगा जनजाति की उत्पत्ति की भी अनेंक कहानियां हैं जिनसे उनके इतिहास और वर्तमान में उनके जीवन पद्धति के विषय में जानकारी प्राप्त होती ळे । छत्तीसगढ़ में विभिन्न स्थानों में इनकी उत्पात्ति की अलग अलग कहानियां हैं जो एक दूसरे से भिन्न हैं । किसी एक सर्वमान्य कहानी पर एकमत नहीं है । प्रस्तुत शोध पत्र में बैगाओं से साक्षात्कार के माध्यम से उनकी उत्पत्ति की कुछ कहानियों का उल्लेख किया गया है ।
ज्ञम्ल्ॅव्त्क्ैरू करिकाग - कौवा, केकरामल - केकड़ा, गीचनारजा - केंचुआ , भीमसेन - महाभारत कालीन प्रसिद्ध पांच पांडवों में से एक , पवन दसेरी - पवन देव , नागा बैगा - (निर्वस्त्र बैगा एवं बैगाओं के पूर्वज), नागा बैगिन - (निर्वस्त्र बैगा जनजाति की महिला एवं बैगाओं के पूर्वज)
प्रस्तावनाः-
बैगा जनजाति की उत्पत्ति सबंधी किवदंतियां
1 नवम्बर सन 2000 को भारत गणराज्य के 26 वें राज्य के रूप में छत्तीसगढ़ अस्तित्व में आया । यह एक जनजाति बहुल राज्य है जिसकी 30.6: जनसंख्या जनजातियों की है।1 छत्तीसगढ़ में कुल 42 जनजातियाँ निवास करती हैं ।2 जिनमे से पांच जनजातियों अबूझमाड़िया, बैगा, बिरहोर, कमार और पहाड़ी कोरवा को विशेष पिछड़ी जनजाति समूह में रखा गया है ।3
बैगा भारत के आठ राज्यों में निवास करते हैं । ये राज्य हैं मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, पश्चिम बंगाल, ओडिशा, झारखण्ड, उत्तर प्रदेश , बिहार और महाराष्ट्र ।4 इन राज्यों में बैगा जनजाति की सर्वाधिक जनसंख्या मध्य प्रदेश और दूसरी सबसे अधिक जनसंख्या छत्तीसगढ़ में निवासरत हैं ।5
मानव समुदाय में प्रत्येक व्यक्ति अपने इतिहास के प्रति गौरव अनुभव करता है । अपनी संस्कृति, उत्पत्ति, संस्कार और परम्पराओं आदि के विषय में बड़ी उत्सुकता के साथ बताता है । इसी प्रकार भारत की प्रत्येक जनजाति की उत्पत्ति संबंधी किवदंतियां होती हैं जिनमें यह बताया जाता है कि उनकी उत्पत्ति कैसे हुई, किससे हुई आदि । ये किवदंतिया या कहानियां एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक स्थानांतरित होती हैं । हालांकि जनजातियों के पास अपनी कहानियों की पुष्टि के लिए कोई ठोस या लिखित साक्ष्य नहीं होते, किन्तु वो इन कहानियों पर अटूट विश्वास करते हैं और कहानियों के अनुसार अपने जीवन के सिद्धांत तय करते हैं ।
बैगा जनजाति कि भी अपने उत्पत्ति के संबंध में अपनी कहानियां हैं । बैगा जनजाति की उत्पत्ति के संबंध में कोई स्पष्ट अभिलेख या लिखित जानकारी प्राप्त नही है । इनकी उत्पत्ति के संबंध में अब तक प्राप्त जानकारियों का आधार बैगाओं से लिया गया साक्षात्कार है ।
बैगा जनजाति की उत्पत्ति की कहानियो के प्रायः दो है भाग होते हैं, प्रथम भाग में धरती की खोज की जानकारी होती है और दूसरे भाग में नंगा बैगा एवं बैगिन की उत्पत्ति की जानकारी होती है ।
बैगा स्वयं को भूमि का स्वामी ‘भूमिया’ मानते हैं, अतः कहानी के दोनों भागों का अलग अलग अध्ययन आवश्यक है ।
धरती की खोज
यहां पर धरती की खोज की तीन किवदंतियों का उल्लेख करेंगे जो इस प्रकार है -
पहली किवदन्ती के अनुसार -
पहले चारो ओर केवल जल ही जल था, भगवान, भूत, चट्टान- पहाड़, जंगल आदि किसी का कोई अस्तित्व नहीं था । उपर केवल आकाश और नीचे केवल जल था । उसी जल के बीचो- बीच एक विशाल कमल पत्र था जिसपर सत भगवान बिलकुल अकेले थे ।
एक दिन उन्होंने अपनी भुजा को रगड़ा, जिससे मैल निकला, उस मैल से उन्होंने एक कौवा बनाया जिसका नाम करिकाग था । वह सत भगवान की पुत्री थी । भगवान ने उससे कहा कि जाओ और पृथ्वी की खोज करो मैं अकेला हूँ और संसार बनाना चाहता हूँ ।
करिकाग उड़ती गई और अंत में वह केकरामल छत्री केकड़ा की पीठ पर गिर गई । केकरामल के पूछने पर करिकाग ने बताया कि वह भगवान की इच्छा से पृथ्वी की खोज में निकली है, कहा कि यदि तुम्हे कोई जानकारी है तो बताओ । केकड़े ने बताया कि समुद्र की तलहटी में गीचनाराजा नामक केंचुआ है जिसने पृथ्वी को निगल लिया है, उसके पास जाओ।
तब केकरामल छत्री करिकाग को लोगुंडी राजा के पास ले गया । लोगुंडी राजा के 3 और भाई थे, लोहासुर, तमेसुर और अगयासुर । चारों ने मिलकर लोहे का विशाल पिंजरा बनाया जिसमे खिड़कियां भी थी । कौआ और केकड़ा उसी पिंजरे में बैठ कर समुद्र की तली तक गए ।
जिस स्थान पर गिचनाराजा सो रहा था वहीँ पर उनका पिंजरा उतरा । पिंजरे से निकल कर दोनो गिचनाराजा को उठाने लगे जिससे वह क्रोधित हो गया । गिचनाराजा और उन दोनों की लड़ाई हुई जिसमें केंचुआ हार गया ।
केकड़ा केंचुए की गर्दन पर चढ़ जाता है और गर्दन को दबाता है जिससे केकड़ा 21 बार उल्टी करता है जिससे 21 प्रकार की मिट्टी निकलती है
1. धरती माता
2. पीरी धरती (पीली मिट्टी)
3. कारी धरती (काली मिट्टी)
4. पापी धरती (जहां शेर मनुष्य को मार सकता है )
5. महामुण्डी धरती (शुष्क धरती जहां फसल पैदा नहीं कर सकते)
6. मुड़ मैली धरती (जहां महिला मासिक धर्म के दौरान रहेगी)
7. छुताही धरती (अस्पृश्य धरती)
8. दुधिया धरती (सफेद दूध जैसी मिट्टी)
9. धरनी धरती (अछि धरती)
10. चमकन धरती (भूकम्प वाली धरती)
11. बेरी धरती (जहां सभी प्रकार की मिट्टी का मिश्रण होगा )
12. आलो धरती (लाल मिट्टी)
13. नंगी धरती (निर्वस्त्र धरती)
14. गोरी धरती (सफेद धरती)
15. पथरी धरती (चट्टानी मिट्टी)
16. बर्रा धरती (लाल, कंकड़ युक्त मिट्टी)
17. सहरी धरती (सभी फसलों के लिए उपयुक्त मिट्टी)
18. भैरी धरती (बहरी मिट्टी)
19. अन्न कुआंरी धरती ( उपजाऊ मिट्टी)
20. उटकन धरती (ऊसरध्अन उपजाऊ मिट्टी)
21. कुआंरी धरती
इन सब धरतियों को केकड़े ने एक रस्सी की सहायता से कौंए के गले में बांध दिया और वह उड़कर भगवान के पास पहुंची ।
भगवान ने कौंए के गले से धरती को निकालकर अपनी गोद में रखा और एक कुंवारी युवती को बुलाया । उस युवती ने पत्तों का एक पात्र बनाकर सारी धरती को 8 दिन और 9 रात तक लगातार मंथन किया जिससे धरती तैयार हो गई । भगवान ने उस धरती को रोटी जैसे बेल कर जल के सतह पर फैला दिया । धरती जल्द ही पूरे जल पर फैल गई किन्तु वह मजबूत नहीं थी और कीचड़ बन गई । इसे सुखाने के लिए पवन दसेरी (वायु देवता) को बुलाया गया । उन्होंने हवा के द्वारा धरती को सुखाने का प्रयास किया किन्तु असफल रहे ।
इसके बाद भीमसेन को बुलाया गया । उसने भगवान से भूखा होने की बात कही जिसपर भगवान ने उसे 25 बोरी चावल, 12 बोरी मसूर की दाल और 12 बोरी चना दिया । भीमसेन ने भगवान से पीने के लिए कुछ मांगा । भगवान ने कहा कि तुम स्वयं जाओ और अपने लिए मंद (महुए के फूल से निर्मित शराब) खोजो । भीमसेन जंगल गए और मंद की तलाश करने लगे । एक महुआ पेड़ की खोह में उन्हें मंद मिला जिसे पक्षी पी रहे थे । भीमसेन ने बहुत सारा मंद पिया और कुछ मंद वह भगवान के लिए भी ले आए । सबने मंद पिया और उसके बाद भीमसेन पृथ्वी पर चारों ओर चलने लगे ।
पृथ्वी जहां पर पतली थी वहां भीमसेन ने पहाड़ बना दिया , जहां भारी थी वहां घाटी बना दिया, जहां फिसलन थी वहां उसने पेड़ रख दिया । किन्तु इन सब के बाद भी पृथ्वी स्थिर नही हुई ।6
दूसरी किवदन्ती के अनुसार -
बहुत समय पहले चारो ओर जल ही जल था । धरती का कुछ पता नहीं चलता था । जल में एक कमल का फूल था जिसके पत्तों पर सभी देवता बैठा करते थे । एक बार तेज हवा चली जिससे पत्तों पर पानी भर गया । इससे देवता नाराज हो गये । उन्होंने पानी पर धरती बनाने का विचार किया । बहुत खोज करने के बाद भी जब धरती का पता नहीं चला तब देवता नागा बैगा के पास गये । नागा बैगा जम्बू द्वीप में रहता था, यह द्वीप उस विशाल जलराशि के एक छोर पर था । देवताओं ने नागा बैगा से धरती को खोजने का अनुरोध किया जिसे नागा बैगा ने मान लिया ।
नागा बैगा स्वयं धरती के विषय में कुछ नही जानता था इसलिए उसने कौवा कुंवर (कौवा) को बुलाया और उसे धरती की खोज करने का आदेश दिया । कौवा कुंवर ने अपने आकार को विशाल किया और उड़ने लगा । वह इतना विशाल हो गया कि आकाश में छा गया जिससे समस्त जल में उसकी छाया बन गई । कौवा निरंतर कई वर्षों तक उड़ता रहा और थक कर एक मीनार जैसे आकार वाले वस्तु पर बैठ गया । वास्तव में वह मीनार नहीं एक केकड़े की डाढ (ठुड्डी) थी । केकड़ा उस समय सूर्य की आराधना कर रहा था । कौवे के बैठने से उसकी ठुड्डी टूट गई । इससे क्रोधित होकर केकड़े ने कौवे की गर्दन दबा दी । कौवे ने केकड़े को सारी बात बताई, जिससे केकड़ा उसकी सहायता करने के लिए तैयार हो गया । केकड़ा कौवे की पीठ पर सवार हो गया और दोनों आगे बढ़ गये ।
चलते चलते वो हाड़न राजा (हड्डियों का राजा) के पास पहुंचे । वहां एक तालाब था जिसके पास हड्डियों का पहाड़ था । उस तालाब में एक नाग कन्या स्नान करने आई । वो बहुत सुंदर थी । दोनों ने उसे धरती समझा । केकड़ा बात करने में कुशल था उसने उस नागकन्या को अपने साथ चलने के लिए मना लिया । जब तीनो वहां से चलने लगे तो उन्हें केंचुआ दानव मिला । उसने अपनी माया से कन्या को निगल लिया । केकड़ा और कौवा कन्या को न पाकर चिंतित हो गये, तभी गिलहरी मौसी ने इशारे से बताया कि कन्या को केंचुआ निगल गया है । केकड़े ने अपना जबड़ा केंचुए के पेट में चुभा दिया जिससे केंचुए ने कन्या को छोड़ दिया ।
केकड़ा और कौवा नागकन्या को लेकर देवताओं के पास पहुंचे जिससे देवता बहुत प्रसन्न हुए और उनका भव्य स्वागत किया ।
देवताओं ने जलराशि के ऊपर ही उस कन्या का स्वयंवर आयोजित किया किन्तु उस कन्या ने किसी भी देवता का वरण नहीं किया । देवता चिंतित हो गये । तब उन्हें नागा बैगा की याद आई । नागा बैगा को ससम्मान बुलाया गया । वो साधू थे, तन पर भभूत लगाये हुए थे । नागकन्या ने नागा बैगा का वरण किया और वरमाला उनके गले में डाल दी । लेकिन इससे नागा बैगा क्रोधित हो गये । उन्होंने कहा कि मैं इस कन्या को पुत्री मान चूका हूँ ऐसे में इसने ऐसा क्यों किया और नागा बैगा ने उस कन्या का सर फरसे के काट दिया ।
कन्या का खून सारे जल में फैल गया । फैले हुए खून को देवताओं और नागा बैगा ने थपथपाया जिससे वह जम गया । वही पृथ्वी की सतह बनी । ऊँचे स्थान पहाड़ तथा नीचे स्थान समुद्र और झील बन गये । नागा बैगा ने पृथ्वी को बनाया इसलिए वह भूमिया कहलाया । पृथ्वी को उसने बेटी माना इसलिए वह उसकी छाती पर हल नहीं चलाता ।
अब देवताओं को पृथ्वी के विवाह की चिंता हुई । उसके लिए बादल को वर चुना गया । बादल बारात लेकर आया । किन्तु उसी समय घूघू (उल्लू) ने सर हिला दिया जिससे बादल हवा में उड़ गया । इससे क्रोधित होकर पृथ्वी ने घूघू को श्राप दिया । नागा बैगा ने पृथ्वी को धीरज बंधाया और पहाड़ों से बादल को रोकने को कहा । तब से पहाड़ों के रोकने से बादल पृथ्वी पर वर्षा करते हैं जिससे पृथ्वी फलती फूलती है ।
बैगा जंगलो को काटकर उन्हें जलाकर अन्न उगाते हैं, गोंड बीज बुआई प्रारम्भ करने से पहले बैगाओं से पृथ्वी की पूजा करवाते हैं ।
गोंड बैगा को भूमि संबंधी पुरोहित मानते हैं तथा बैगा और बैगिन को क्रमशः देवार और देवारिन कहते हैं । बैगा भी इन नामो को स्वयं के लिए आदरसूचक शब्द मानते हैं ।7
तीसरी किवदन्ती के अनुसार
एक दिन ब्रह्मा को धरती बनाने की इच्छा हुई उसी समय दो साधू निकले । पहला साधू ब्राह्मण था और दूसरा नागा बैगा था । ब्रह्मा ने ब्राह्मण को पढने लिखने का आदेश दिया और नागा बैगा को कुल्हाड़ी दी और जंगल में कोदो कुटकी बोने की सलाह दी ।8
नंगा बैगा अथवा बैगा का जन्म
नंगा बैगा और बैगिन के जन्म से संबंधित अनेक दंत कथाएं सुनी जाती हैं । इन कथाओं में आपस में काफी मतभेद हैं । किन्तु लगभग सभी कथाओं में एक बात पर सब राजी हैं कि बैगा का जन्म कजली बन पहाड़ में हुआ है । ‘कजली बन’ का शाब्दिक अर्थ होता है केले का जंगल, भारत के आसाम राज्य के जंगल के एक हिस्से का नाम भी कजली बन है, जो अच्छे हाथियों के लिए प्रसिद्ध है ।
कुछ बैगा अपनी उत्पत्ति को वशिष्ठ मुनि के साथ जोड़ते हैं । वशिष्ठ मुनि दस प्रजापतियों और सप्त ऋषियों में से एक थे । यह मुनि इक्ष्वाकु वंश के वंशज और तुलसीदास कृत रामचरितमानस महाकाव्य के नायक भगवान श्रीराम के कुलगुरु थे ।
प्रथम दंत कथा के अनुसार वशिष्ठ मुनि कजली बन पहाड़ में तपस्या कर रहे थे । जिस स्थान पर वो तपस्या कर रहे थे वहां एक कुण्ड था । एक दिन वह कुण्ड टूट गया, जिसमे से नंगा बैगा रोते हुए बाहर आया । उसे रोता हुआ देख वशिष्ठ नाराज हुए और गुस्से से नंगा बैगा को जंगल में फेंक दिया । एक काली नागिन ने बैगा को अपने पास रखा और उसे दूध पिलाया और उसे बांबी में सुरक्षित छिपा दिया । इसके बाद नागिन ने नंगा बैगिन को जन्म दिया और उसे भी उसी बांबी में रखा । बांबी के दो हिस्से थे दोनों हिस्सों में नंगा बैगा और बैगिन को अलग अलग रखा गया । 9
द्वितीय कथा के अनुसार भगवान को भूख लगी, वो भोजन की तलाश में नागा पहाड़ गए, वहां उन्होंने खुदाई की और खुदाई से प्राप्त जड़ में से दो छोटे छोटे स्त्री पुरुष बाहर आए । दोनों निर्वस्त्र थे । उन्हें देखकर देवता हँसे, और बाद में उनका नाम नंगा बैगा और नंगा बैगिन हो गया ।10
अपनी उत्पत्ति के संबंध में बैगा जनजाति के लोग नंगा बैगा को अपने पूर्वज के रूप में मानते हैं । कुछ बैगा नंगा बैगा का वर्णन करते हुए कहते हैं कि उनका शरीर बहुत विशाल था, उनके कान इतने बड़े थे कि वो एक कान पर सोते थे और दूसरे को ओढ़ते थे । वह काफी गरीब थे और कंद मूल खाते थे ।11
इस प्रकार यदि सभी कथाओं का विश्लेषण करें तो बात सामने आती है कि सभी कथाएं मिलती जुलती हैं, केवल एक कथा, वशिष्ठ मुनि की कथा अलग नजर आती है ।
उपरोक्त कहानियों से हमें बैगा जनजाति से संबंधित कुछ संकेत मिलते हैं जो निम्न हैं
उपरोक्त कहानियो के अनुसार धरती के निर्माण से पहले सर्वत्र जल ही जल होने वाली बात से सनातन मान्यता के महाप्रलय जैसी स्थिति का आभास होता है ।
पृथ्वी के निर्माण में ब्रह्मा, अन्य देवताओं, भीमसेन तथा वशिष्ठ ऋषि का योगदान होने की बात से यह आभास होता है कि बैगा जनजाति हिन्दू मान्यताओं से प्रभावित रहे हैं और अपने पूर्वजों को इनसे जोड़कर अपने अस्तित्व को अत्यधिक प्राचीन सिद्ध करने का प्रयास किया है ।
इनकी उत्पत्ति से संबंधित अधिकांश कहानियों में धरती को कुंवारी अर्थात अविवाहित माना गया है।
धरती की खोज या निर्माण कार्य में केंचुआ, केकड़ा, कौवा आदि जीवों के योगदान की भी मान्यता सामने आती है, इससे यह प्रतीत होता है कि बैगा मनुष्य एवं अन्य प्राणियों के मध्य परस्पर सहयोग की भावना को मानते हैं ।
अलग अलग कहानियों में बैगा स्वयं को धरती का पुत्र या उसका खोजकर्ता मानते हैं, इसीलिए वो धरती पर हल नहीं चलाना चाहते ।
वृद्ध बैगा बताते हैं कि पहले वो हल नहीं चलाते थे, किन्तु अवलोकन से ज्ञात होता है कि बैगा अब हल चलाते हैं ।
इस प्रकार पृथ्वी की खोज और बैगा जनजाति की उत्पत्ति की सभी कहानियों के विश्लेष्ण से इस निष्कर्ष पर पंहुचा जा सकता है कि बैगा का जन्म धरती माता (पृथ्वी) के गर्भ से हुआ है । जंगल, जड़, बांस, और बांबी आदि सब पृथ्वी से ही संबंधित है ।
सन्दर्भ सूची
1. स्टेटीस्टीकल प्रोफाइल ऑफ शेड्यूल्ड ट्राइब्स इन इण्डिया 2013, मिनिस्ट्री ऑफ ट्राइबल अफेयर्स स्टेटीस्टीकल डिपार्टमेंट, गवर्नमेंट ऑफ इण्डिया, पृष्ठ 121.
2. डेमोग्राफिक स्टेटस ऑफ शेड्यूल्ड ट्राइब्स इन इण्डिया, मिनिस्ट्री ऑफ ट्राइबल अफेयर्स गवर्नमेंट ऑफ इण्डिया,(2011 जनगणना के आधार पर).
3. च्प्ठण्छप्ब्ण्त्म्ज्त्प्टम्क् 2016.2017ण्
4. स्टेटीस्टीकल प्रोफाइल ऑफ शेड्यूल्ड ट्राइब्स इन इण्डिया 2013, मिनिस्ट्री ऑफ ट्राइबल अफेयर्स स्टेटीस्टीकल डिपार्टमेंट, गवर्नमेंट ऑफ इण्डिया, पृष्ठ 143.
5ण् स्टेटीस्टीकल प्रोफाइल ऑफ शेड्यूल्ड ट्राइब्स इन इण्डिया 2013, मिनिस्ट्री ऑफ ट्राइबल अफेयर्स स्टेटीस्टीकल डिपार्टमेंट, गवर्नमेंट ऑफ इण्डिया, पृष्ठ 158.
6. ग्राम लूप (कवर्धा, छत्तीसगढ़) के रामसुख बैगा से प्राप्त जानकारी के आधार पर
7. ग्राम तरेगांव जंगल (कवर्धा, छत्तीसगढ़) के मोहन बैगा से प्राप्त जानकारी के आधार पर
8. ग्राम धवईपानी (कवर्धा, छत्तीसगढ़) के चरकी बाई बैगा से प्राप्त जानकारी के आधार पर
9. ग्राम बदना (पंडरिया, छत्तीसगढ़) के तिकतीन बाई बैगा से प्राप्त जानकारी के आधार पर
10. ग्राम छपरी (भोरमदेव छत्तीसगढ़) के अर्जुन बैगा से प्राप्त जानकारी के आधार पर
11. वही
Received on 03.08.2018 Modified on 21.08.2018
Accepted on 10.10.2018 © A&V Publications All right reserved
Int. J. Rev. and Res. Social Sci. 2018; 6(4):557-561.