भारत में निर्वाचन प्रणाली
डाॅ. अनुराग श्रीवास्तव
पं. रविषंकर शुक्ल विश्वविद्यालय रायपुर
’ब्वततमेचवदकपदह ।नजीवत म्.उंपसरू तेनमगंउ/हउंपसण्बवउ
किसी भी समाज का विकास उस देश, राज्य या क्षेत्र के प्रतिनिधित्व करने वाले व्यक्तियों के कुशल नेतृत्व पर निर्भर करता है नेतृत्वकर्ता की बौद्धिक एवं राजनीतिक क्षमता राज्य को प्रगति की ओर ले जा सकती है। उचित नेतृत्व के अभाव में समाज का विकास संभव नहीं है। जनसामान्य की सारी आशाएं एवं उम्मीदें नेतृत्वकर्ता पर होती है। अपना प्रतिनिधि या नेतृत्वकर्ता चूनने का विधि को निर्वाचन कहते हैं जिसमें मतदान कर अपना प्रतिनिधि जनता द्वारा चूना जाता है। अतः यह कहा जा सकता है कि किसी देश या राज्य के कुशल संचालन हेतु एक कर्मठ, बुद्धिमान एवं सहनशील नेतृत्व की आवश्यकता होती है। एक सफल नेतृत्वकर्ता के चुनाव के लिए देश अथवा राज्य में एक बेहतर निर्वाचन व्यवस्था का होना अतिआवश्यक है।
भारत, निर्वाचन प्रणाली
प्रस्तावना:-
स्वतन्त्र भारत में संसदीय प्रणाली को समस्त नागरिकों ने सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय, विचार अभिव्यक्ति, विश्वास धर्म और उपासना की स्वतन्त्रता, प्रतिष्ठा और अवसर की समता प्राप्त करने के लिए तथा उनमें व्यक्ति की गरिमा और राष्ट्र की एकता सुनिश्चित करने वाली बन्धुता बढ़ाने के लिए अपनाया है।
मानव के प्रारम्भिक काल से लेकर अब तक विभिन्न देशों में विभिन्न प्रकार की शासन व्यवस्थाएं विद्यमान रही है। इन शासन व्यवस्थाओं में महत्वपूर्ण रूप से राजतन्त्र अधिनायक तन्त्र और कुलीनतन्त्र आदि है।
लोकतन्त्र की सफलता के लिए यह आवश्यक है कि ऐसी परिस्थितियाँ देश के राजनीतिक पर्यावरण में विद्यमान हों कि लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था सफल हो सके तथा उसके वास्तविक मूल्य स्पष्ट हो।
लोकतांत्रिक शासन में नागरिकों का चरित्र, नैतिक दृष्टि से उच्च एवं ईमानादार होनी चाहिए साथ ही उनमें कर्तव्य बोध की भावना होना चाहिए। प्रजातंत्र के अनिवार्य अंग के रूप में प्रत्यक्ष लोकतंत्र विशाल क्षेत्रफल और लाखों करोड़ों जनसंख्या वाले राज्यों में संभव नहीं है। आज सभी जगह प्रतिनिधियात्मक प्रजातंत्र ही प्रचलित। है लोकतंत्र में सरकार के दो मूल स्वरूप, यथा संसदात्मक शासन व्यवस्था और अध्यक्षात्मक शासन व्यवस्था।
भारत की संसद राष्ट्रीय स्तर पर संवैधानिक रूप से संगठित सभी लोगों के विचारों का प्रतिनिधित्व करती है। इसका देश की राजनीतिक व्यवस्था में महत्वपूर्ण स्थान है इसमें जनता की प्रभुसत्ता का समावेश एवं सार है। निर्वाचन जनतांत्रिक प्रक्रिया की धुरी है और भारत में निर्वाचन पद्धति का अध्ययन विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। लोकतंत्र का निर्माण और संचालन उसके नागरिकों की इच्छा से उनके प्रतिनिधियों के द्वारा किया जाता है। राज्य की प्रभुसत्ता प्रत्येक व्यक्ति में निवास करती है। यह तथ्य प्रत्येक निर्वाचन के बाद हुये परिवर्तन से प्रमाणित हो जाता है।
निर्वाचन प्रक्रिया एक माध्यम है जिससे राष्ट्र के व्यस्क नागरिकों को शासन प्रक्रिया में सक्रिय भाग लेने का अवसर प्राप्त होता है। यह संस्थागत कार्यशाला है, जिसमें आगामी वर्षों के लिए शासकों का निर्धारण होता है। इसके द्वारा भविष्य की नीतियों, आशाओं और अपेक्षाओं को स्वीकृति दी जाती है। नियत कालिन चुनावों के माध्यम से कार्यरत व्यवस्थाओं को स्वीकृति अथवा अस्वीकृति प्राप्त होती है। यह एक लोकतांत्रिक माध्यम है जिसमें विचारों और आदर्श का सम्प्रेषण, प्रभाव और नियंत्रण की प्रक्रिया नीचे से ऊपर की और चलती है।
निर्वाचन को लोकतन्त्र में सबसे महान प्रयोग कहा गया है आम निर्वाचन केवल राष्ट्रीय प्रयास नहीं बल्कि प्रजातन्त्र का प्रयोग भी है। निर्वाचनों का प्रायोजन मात्र दलों की हार जीत या सत्ता परिवर्तन नहीं है बल्कि एक ऐसा अवसर होता है जब एक लोकतन्त्र अपने वास्तविक रूप में सामने आता है और मतदाता के साथ उसका सम्पर्क स्थापित होता है। लोकतन्त्र में महत्व जनता और मतदाता का ही नहीं बल्कि समाज, सामाजिक एवं राजनीतिक संगठन, व्यक्ति संगठन की आस्थाओं एवं विश्वासों का भी है। भारत जैसे बहुभाषी, बहुजातीय और बहुधार्मिक आस्थाओं वाले देश में निर्वाचन एक चुनौतिपूर्ण कार्य है।
निर्वाचन प्रणाली:
संसदीय लोकतंत्र में निर्वाचन का अत्यधिक महत्व है निर्वाचन के माध्यम से ही जन प्रतिनिधियों के द्वारा विधान मंडलो तथा संसद का गठन होता है। विधान मंडल और संसद ही राज्यों तथा केन्द्रों में बैठकर कानुन बनाते है। प्रतिनिधियात्मक या उत्तरदायी शासन व्यवस्था में निर्वाचन समुह अपने कार्य का सम्पादन मतदान की प्रक्रिया द्वारा करता है। जो नागरिक मतदान करते है या मतदान के योग्य होते है, वे निर्वाचक या मतदाता कहलाते है। जिस सम्मेलन में यह कार्य किया जाता है उसे निर्वाचन कहते है।
निर्वाचन जनता और सरकार के बीच संचार के साधन का कार्य करता है। यह वह प्रक्रिया है जिसके माध्यम से किसी राजनीतिक पद के लिए मतदाता द्वारा नेता चुने जाते है। मताधिकार आधुनिक प्रजातंत्र का आधार है, नागरिक इसका प्रयोग चुनाव के माध्यम से करते है। चुनाव वह यंत्र है जिसके माध्यम से नागरिकों में सार्वजनिक कार्य में भाग लेने की इच्छा का सृजन और उसमें वृिद्ध होती है। लोकप्रिय निर्वाचन के लिए ही सरकार की शक्ति को वैधानिकता प्राप्त होती हैै तथा शांतिपुर्ण ढंग से सत्ता का हस्तांतरण होता है। उच्च कोटी की निर्वाचन प्रणाली और निर्वाचन यंत्र स्वस्थ प्रतिनिधियात्मक सरकार के आधार स्तंभ है।1 लोकतंत्र की सफलता निर्वाचन प्राणाली पर निर्भर करती है। साम्यवादी राष्ट्रों सहित कुछ अन्य राज्यों में भी निर्वाचन होते है, परन्तु नागरिकों को अपनी विचारधारा के अनुसार मत बदलने और प्रतिनिधित्व में प्रतिस्पर्धात्मक भावना से चुनाव लड़ने का अवसर नहीं होता है।2
‘‘संविधान के अधीन संसद को यह शक्ति प्राप्त है कि वह संसद के प्रत्येक सदन या किसी भी राज्य विधान मंडल के सदन या प्रत्येक सदन के लिए निर्वाचन के संबध में, निर्वाचन नामावली तैयार करने निर्वाचन क्षेत्रों का परिसीमन करने और ऐसे सदन या सदनों के सम्यक गठन के लिए अन्य सभी आवश्यक विषयों हेतु विधान बना सकती है।’’3
संविधान सभा में निर्वाचन:
जुलाई 1946 में केबिनेट योजना के आधार पर विधानसभा के चुनाव हुए, चुनावों में ब्रिटीश प्रांत के निर्धारित 210 सामान्य स्थानों में से कांग्रेस ने 191 स्थानों पर विजय प्राप्त की शेष 11 स्थानों में से 2 पंजाब की यूनियनिस्ट पार्टी को 1 कम्युनिस्ट को 2 दलित उद्धार संघ को और 6 स्वतंत्र उम्मीदवारों को प्राप्त हुए। मुसलमानों के लिए निर्धारित 78 स्थानों में से लीग को 73 स्थान प्राप्त हुए और शेष 5 स्थानों में से 3 कांग्रेस 1 पंजाब के यूनियनिस्ट पार्टी और एक कृषक प्रजापार्टी को प्राप्त हुआ। इस प्रकार 296 सदस्यों में से कांग्रेस का साथ देने के लिए 212 और लीग का साथ देने के लिए 73 सदस्य थे ।
संविधानसभा में अपनी कमजोर स्थिति देखकर मुस्लिम लीग ने संविधानसभा के बहिष्कार का निश्चय किया। संविधानसभा की प्रथम बैठक 9 दिसम्बर 1946 में हुई जिसमें 210 सदस्य उपस्थित हुए।
स्वतन्त्र भारत में निर्वाचन व्यवस्था:
लोकतंत्र का संचालन उसके नागरिक की इच्छा से उसके प्रतिनिधियों द्वारा किया जाता है। राज्य की सम्प्रभुता प्रत्येक व्यक्ति में निवास करती है। भारत में संसदीय लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था को अंगीकर किया गया है। इसके अनुसार प्रत्येक पांच वर्ष की अवधि या उसके पूर्व जनता निर्वाचन द्वारा अपने जनप्रतिनिधियों का चयन करती है। लोकत्रंत की सफलता एवं सुरक्षा इस तथ्य में निहित है कि जनता द्वारा प्रतिनिधियों के निर्वाचन की व्यवस्था कितनी सक्षम है। निर्वाचन तन्त्र कितना कुशल है एवं निष्पक्ष व स्वतन्त्र है।4
भारतीय संविधान में निर्वाचन व्यवस्था:
भारतीय संविधान के भाग 15 में पृथक रूप से निर्वाचन की व्यवस्थाओं का उल्लेख किया गया है। हमारे संविधान निर्माताओं ने चुनावों के संबध में व्यापक व्यवस्थाओं का उल्लेख संविधान में किया है। इससे यह तथ्य भी प्रमाणित होता है कि भारतीय नागरिकों के मताधिकार के इस राजनीतिक अधिकार को संविधान का अंग बनाने के प्रति वे कितने उत्सुक थे।5 संविधान सभा ने इस अधिकार की महत्ता के प्रति जागरूक रहते हुए ही इस संबध में व्यवस्थाओं का प्रारूप बनाने का दायित्व उसी समिति को दिया था, जो मौलिक अधिकारों के प्रारूप के निर्माण का कार्य कर रही थी।
इस समिति ने यह अनुशंसा की थी कि चुनावों की स्वतन्त्रता और इस प्रक्रिया में कार्यपालिका के हस्तक्षेप से सुरक्षित रखने के दृष्टिकोण को मूल अधिकार माना जाए। इस हेतु आवश्यक व्यवस्थायें की जानी चाहिए। किन्तु संविधानसभा ने इसे अत्यन्त मौलिक महत्व का प्रश्न मानते हुए भी इसको मौलिक अधिकारों के अध्याय में नहीं रखा।6
निर्वाचन आयोग:
निर्वाचन आयोग मुख्य निर्वाचन आयुक्त और ऐसे अन्य निर्वाचन आयुक्तों से बनता है जिनको संसद द्वारा निर्मित विधि के उपबन्धो के अधीन रहते हुए राष्ट्रपति द्वारा नियुक्त किया जाता है। निर्वाचन आयोग उक्त सभी संस्थाओं और पदों के निर्वाचन के लिए निर्वाचन - नामवली तैयार कराने का और उन सभी के संचालन अधीक्षण निर्देशन और नियंत्रण का कार्य करता है।7
प्रत्येक राज्य का एक प्रमुख निर्वाचन अधिकारी होता है। जिसे निर्वाचन आयोग द्वारा निर्वाचक नामावलियाँ तैयार करने, उसका पुनः निरीक्षण करने और उनमें शुद्धियाँ करने के काम के अधीक्षण के लिए और राज्य में सभी निर्वाचनों का संचालन करने के लिए मनोनीत किया जाता है। इसी प्रकार जिले का एक जिला निर्वाचन अधिकारी होता है, जो मुख्य निर्वाचन अधिकारी के निर्देश के अधीन अपने जिले में सारे कार्य का समन्वय तथा अधीक्षण करता है।8 वे मतदान केंद्रों के लिए प्रेजाइडिंग अधिकारी तथा मतदान अधिकारी नियुक्त करते हैं। प्रेजाइडिंग अधिकार निर्वाचन के दिन महत्वपूर्ण भूमिका अदा करते हैं। मतदान केंद्रों में उनका सामान्य कर्तव्य यह देखना है मतदान निर्बाध व निष्पक्ष हो।9 मतदान केंद्रों पर मतदान अधिकारी का यह कर्तव्य होता है कि वह प्रेजाइडिंग अधिकारी को उसके कृत्यों के निर्वहन में सहायता करें।10 रिटर्निंग अधिकारी को ऐसे सब कार्य करने का अधिकार प्राप्त है, जो निर्वाचन विधियों के अनुसार निर्वाचन कराने के लिए आवश्यक है।11
निर्वाचन आयोग के कार्य:
1. संसद, राज्य विधानसभाओं तथा राष्ट्रपति एवं उपराष्ट्रपति के पदो से संबंधित समस्त निर्वाचनो का निर्देशन तथा नियंत्रण करता।
2. निर्वाचन के लिए निर्वाचक सूचियां तैयार करवाना।
3. संसद एवं राज्य विधानसभाओं में निर्वाचन संबंधी सन्देहांे और विवादों के निर्णय के लिए निर्वाचन न्यायधिकरण की नियुक्ति करना।
4. संसद तथा राज्य विधानसभाओ के सदस्यो की अर्हताओं के प्रश्न पर राष्ट्रपति और राज्यपाल को परामर्श देना।
5. निर्वाचन की तिथियों और कार्यक्रमांे की घोषणा करना।
6. राजनीतिक दलों को मान्यता प्रदान करना।
7. राजनीतिक दलों को आरक्षित चुनाव चिन्ह प्रदान करना।
8. राजनीतिक दलों के लिए आचार संहिता का निर्माण करना।
9. राष्ट्रपति तथा राज्यपाल को क्रमशः संसद एवं राज्य विधान मंडलो की निरयोग्यताओं के संबद्ध किसी भी प्रश्न पर अपना परामर्श देना।12
10. उम्मीदवारों द्वारा निर्वाचन में किये जाने वाले व्यय की राशि निश्चित कर उसके हिसाब-किताब की जांच करना।
भारत में निर्वाचन आयोग:
संविधान के अनुच्छेद 324 के अन्तर्गत निर्वाचन का निरीक्षण, निर्देशन और नियंत्रण करने के लिए निर्वाचन आयोग की स्थापना की गई है।13 निर्वाचन आयोग में एक मुख्य निर्वाचन आयुक्त तथा अन्य उतने निर्वाचन आयुक्त होगे जितने कि राष्ट्रपति समय-समय पर मनोनित करे। मुख्य निर्वाचन आयुक्तों की नियुक्ति संसद द्वारा निर्मित विधि के अधीन रहते हुए राष्ट्रपति द्वारा की जाती है। राष्ट्रपति निर्वाचन आयोग से परामर्श करके आयोग की सहायता के लिए ऐसे प्रादेशिक आयुक्तांे की नियुक्ति कर सकता है।14
निर्वाचन प्रक्रिया:
निर्वाचन प्रक्रिया का आरंभ राष्ट्रपति द्वारा जारी की गयी अधिसूचना से होता है। यह अधिसूचना जन प्रतिनिधित्व अधिनियम 1951 की 14 वीं धारा के अंर्तगत जारी की जाती है।15 इस घोषणा के बाद निर्वाचन की तिथियाँ तय करने के लिए चुनाव अधिसूचना जारी की जाती है। जिससे प्रत्याशियों द्वारा मनोनयन, नामांकन पत्र भरने उन्हे जाँचने, नाम वापस लेने तथा मतदान की तिथि आदि तय की जाती है।
निर्वाचन प्रक्रिया का प्रथम सोपन मनोनयन भरने से प्रारंभ होता है। आयोग द्वारा घोषित कार्यक्रम के अनुसार नामांकन पत्र भरने की अंतिम तारीख़ के निश्चित समय तक भारत कोई भी नागरिक जिसकी आयु 25 वर्ष है, जिसका नाम मतदाता सूची में हो अपनी उम्मीदवारी का आवेदन दाखिल कर सकता है। मनोनयन पत्र पीठासीन अधिकारी के कार्यालय में दिये जा सकते है। जिसके साथ जनप्रतिनिधि अधिनियम 1950 एवं 1951 के प्रावधानों के अनुसार आवश्यक सूचनायें एवं र्पुिर्तया करनी होती है। आवश्यक सुचनाओं की पूर्ति अथवा किसी भी अर्हता के अभाव में मनोनयन पत्र रद्द किया जा सकता है।
निर्वाचन अधिकारीगण नामंकन पत्रों के जाँच के पश्चात् निर्वाचन प्रक्रिया का दूसरा चरण प्रत्याशियों द्वारा निश्चित तिथि तक नाम वापस लेने तक होता है। इस चरण के बाद जो भी नांमाकन पत्र शेष रह जाते है उनके नाम की घोषणा कर दी जाती है जो अंतिम रूप से प्रत्याशी होते है। अगला चरण निर्वाचन तिथि आने तक निर्वाचन अभियान का माना जाता है। इस अवधि में सभी राजनीति दल तथा स्वतंत्र प्रत्याशी अपनी नीतियों और कार्यक्रमों का प्रचार करते हैं। सार्वजनिक सभाओं एवं भाषाणों के माध्यम से मतदाताओं को अपने पक्ष में लेने का प्रयास करते हैं।
निर्वाचन प्रक्रिया का अगला चरण मतदान का होता है। मतदान का समय समाप्त होने के बाद मतगणना की व्यवस्था की जाती है। और निश्चित तिथि को मतपत्रों की गणना के पश्चात् परिणाम की घोषणा की जाती है। मतगणना में जो उम्मीद्वार अधिक वोट पाता वह विजय घोषित किया जाता है।
स्थान रिक्त हो जाना:
यदि एक सदन का कोई सदस्य दूसरे के लिये भी निर्वाचित को जाता है तो पहले सदन में उसका स्थान उस तिथि से रिक्त हो जाता है जब वह अन्य सदन के लिये निर्वाचित हुआ हो।16 इसी प्रकार यदि वह किसी राज्य विधान मंडल के सदस्य के रूप में चुन लिया जाता है, तो विधान मंडल में अपने स्थान से राज्य के राजपत्र में घोषणा के प्रकाशन से 14 दिनों के भीतर त्यागपत्र नहीं देता है तो संसद का सदस्य नहीं रहता। कोई सदस्य राज्यसभा के सभापति को या लोक सभा के अध्यक्ष को त्याग पत्र देकर अपना स्थान रिक्त कर सकता है। यदि कोई सदस्य सदन की अनुमति के बिना 60 दिन की अवधि तक सदन की किसी बैठक में उपस्थित नहीं होता तो वह सदन उसके स्थान को रिक्त घोषित कर सकता है।17
इसके अतिरिक्त निम्नलिखित कारणों से उसे सदन में अपना स्थान रिक्त करना पड़ सकता है। (1) वह लाभ का पद धारण करता है (2) उसे विकृत चित्त वाला व्यक्ति घोषित कर दिया जाता है या दिवालिया घोषित कर दिया जाता है (3) वह स्वेच्छा से किसी विदेश राज्य की नागरिकता प्राप्त कर ले (4) उसका निर्वाचन न्यायालय द्वारा शुन्य घोषित कर दिया जाये (5) उसे सदन द्वारा निष्कासन प्रस्ताव स्वीकृत किये जाने पर निष्काषित कर दिया जाये। (6) उसे राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति या किसी राज्य का राज्यपाल नियुक्त किया जाये।18 यदि किसी सदस्य को संविधान की दशम अनुसूची में उपबंधों के अंतर्गत दल बदल के आधार पर अनर्ह कर दिया गया हो तो उस स्थिति में उसकी सदस्यता समाप्त हो सकती है।19
निर्वाचन-विवाद:
लोकसभा के तथा राज्य-विधानमंडलों के निर्वाचन-सम्बन्धी विवादों का निपटारा निर्वाचन आयोग द्वारा नियुक्त न्यायाधिकारियों द्वारा होता है। इन न्यायाधिकारियों के निर्णय अन्तिम होते है। इन निर्णयों की अपील उच्चतम न्यायाल के अतिरिक्त कहीं नहीं की जा सकती। उच्चतम न्यायाल में भी उसकी विशेष अनुमति द्वारा ही ऐसी अपील संभव है। अनुच्छेद 136(1) के अंतर्गत उच्चतम न्यायालय को यह शक्ति है कि वह भारत के किसी भी न्यायाधिकरण के निर्णय या आदेश की अपने समक्ष अपील करने की विशेष अनुमति दे सकता है।20 इस व्यवस्था के अंतर्गत निर्वाचन-न्यायाधिकरण भी आ जाते हैं। इस अपवाद के अतिरिक्त निर्वाचनों के मामलों में न्यायालयों का हस्तक्षेप निषेध है।
संसद के या किसी राज्य विधान मंडल के किसी सदन के लिये हुए किसी निर्वाचन को चुनौती उच्च न्यायालय में पेश की जाने वाली निर्वाचन याचिका के द्वारा दी जाती है।21 ऐसी याचिका निर्वाचन में किसी उम्मीद्वार द्वारा या किसी मतदाता द्वारा पेश की जा सकती है। याचिका ऐसे स्थान भरने के लिए या किसी मतदाता द्वारा पेश की जा सकती है। याचिका ऐसे स्थान भने के लिए या निर्वाचन के दौरान कोई भ्रष्ट प्रक्रिया अपनाये जाने के कारण जिस पर विधि द्वारा रोक हो अनहर्ता के आधार पर पेश की जाती है। यदि सिद्ध हो जाये तो उच्चतम न्यायालय को यह शक्ति प्राप्त है कि वह उपरोक्त किसी एक आधार पर सफल उम्मीद्वार का निर्वाचन शुन्य घोषित कर सकती है।22
यदि किसी याचिका में, याचिकादाता द्वारा इस बात का दावा किया जाता है कि वैध मतों से अधिकांश मत उसे मिले हैं। और सफल उम्मीद्वार ऐसी भ्रष्ट प्रक्रिया न अपनाये जो उसने अपनाई तो वह निर्वाचन जीत नहीं सकता था तो न्यायालय निर्वाचित उम्मीद्वार का निर्वाचन शुन्य घोषित कर सकता है और याचिकादाता को विधिवत निर्वाचित घोषित कर सकता है।23
सन् 1950 के जनप्रतिनिधित्व अधिनियम की व्यवस्थाओं के अनुसार, निर्वाचन आयोग को प्रत्येक निर्वाचन-विवाद-सम्बन्धी प्रार्थनापत्र के लिए अलग न्यायाधिकारियों की नियुक्ति करनी पड़ती है। प्रत्येक निर्वाचन-न्यायाधिकरण में सभापति और दो अन्य सदस्य होते हैं। इन तीनों की नियुक्ति निर्वाचन आयोग करता है। लेकिन निर्वाचन आयोग चाहे जिस व्यक्ति की नियुक्ति नहीं कर सकता। संबंधित राज्य का उच्च न्यायालय ऐसे व्यक्तियों की जो या तो राज्य में पहले जिला जज रह चुके हैं या अब हो अथवा जो कम से कम दस वर्षों तक एडवोकेट रह चुके हों, एक नामावली स्वीकृत करके भेजता है और न्यायाधिकरण के सदस्य इसी सूची में से नियुक्त किये जाते हैं। न्यायाधिकरण का सभापति या तो उच्च न्यायालय का कोई भूतपूर्व या वर्तमान न्यायाधीश या कोई भूतपूर्व अथवा वर्तमान जिला-जज भी हो सकता है।24
निष्कर्ष:
निर्वाचन जनतांत्रिक प्रक्रिया की धुरी है और भारत जैसे देश में जहाँ की शासन पद्धति जनतांत्रिक मूल्यों पर आधारित है। निर्वाचन का अध्ययन विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। लोकतंत्र का निर्माण और संचालन उसके नागरिकों की इच्छा से उनके प्रतिनिधियों के द्वारा किया जाता है। संवैधानिक संसदीय लोकतंत्र में राज्य की प्रभुसत्ता उसके नागरिकों में निवास करती है। यह तथ्य प्रत्येक निर्वाचन के बाद हुए सहस्त्र परिवर्तनों से प्रमाणित है निर्वाचन प्रक्रिया एक माध्यम है जिससे राष्ट्र के व्यस्क नागरिकों को शासन प्रक्रिया में सक्रिय भाग लेने का अवसर प्राप्त होता है। यह एक संस्थागत कार्यशाला है जिसमें निश्चित आशाओं और उपेक्षाओं को स्वीकृति दी जाती है। यह एक लोकतांत्रिक माध्यम है जिसमें विचारों और आदर्शों का सम्प्रेषण प्रभाव और नियंत्रण की प्रक्रिया नीचे से ऊपर की ओर चलती है आम निर्वाचन केवल राष्ट्रय प्रयास नहीं बल्कि प्रजातन्त्र का प्रयोग भी है निर्वाचनों का प्रायोजन मात्र दलों की हार जीत या सत्ता परिवर्तन नहीं है बल्कि यह एक ऐसा अवसर है जब लोकतन्त्र अपने वास्तविक रूप में सामने आता है और मतदाता से उसका सम्पर्क स्थापित होता है।
भारत में चनावों की राजनीति ने उसके राजनीतिक दलों मंे कुछ ऐसी कमजोरियाँ पैदा कर दी है जिनसे छूटकारा निकट भविष्य में सम्भव नही ंहै राजनीति दलों में ये प्रवृत्ति या कमजोरी है लहर पर चुनाव लड़ने की भावना, इसमें लहर पैदा करना या लहर का इंतजार करना सम्मिलित है इस मनोवैज्ञानिक प्रयास के लिए तरह-तरह के नारे बनाकर जन-उन्माद पैदा करने का प्रयास किया जाता है। यह कमजोरी देश के राजनीतिक वातावरण को इस हद तक प्रभावित करती है कि राजनीतिक दल अराजनीतिक हो जाते हैं और निर्वाचन में प्रचार और प्रबन्ध के लिए व्यवसायिक विशेषज्ञों की सेवाएं लेना अनिवार्य हो जाता है राजनीतिक दलों में यह व्यवहार निर्वाचकीय राजनीति को दूषित बनाता है। निर्वाचन में लहर का परिणाम यह होता है कि तमाम तरह के अराजनैतिक और असमाजिक तत्व राजनीति में प्रवेश कर जाते है और स्थान बना लेते हैं।
संदर्भ सूची:
1ण् सुभाष कश्यप, राजनीतिक कोष, पृष्ठ- 111
2ण् अंतिमा बाजपेयी, भारतीय निर्वाचन पद्धति एक समीक्षात्मक अध्ययन, नार्दन बुक सेन्टर, नई दिल्ली, 1992, पृष्ठ 2
3ण् सुभाष कश्यप, हमारी संसद- भारत की संसद एक परिचय, पृष्ठ- 53
4ण् कांस्टीट्यूशन डिवेटस, वाल्यूम 8, पृष्ठ 923
5ण् एम.वी. पायली, इंडियन कांस्टीट्यूशन, एशिया पब्लिशर्स, बम्बई, 1974, पृष्ठ- 378
6ण् लोकतंत्र समीक्षा वर्ष, 12 अंक, जुलाई सितम्बर, 1980 पृष्ठ- 397
7ण् सुभाष कश्यप, संसदीय प्रक्रिया, पृष्ठ क्रमांक 35, 36
8ण् लोक प्रतिनिधित्व, अधिनियम 1950, धारा-13 व 13(क)
9ण् वही, धारा-27
10ण् लोक प्रतिनिधित्व, अधिनियम 1951, धारा-21 व 24
11ण् वही, धारा-28
12ण् भारत का संविधान, अनुच्छेद 103 के अनुसार
13ण् भारत का संविधान, अनुच्छेद 324 के अन्तर्गत
14ण् लोकतंत्र समीक्षा वर्ष, 12 अंक, जुलाई सितम्बर, 1980, पृष्ठ- 398
15ण् जनप्रतिनिधि अधिनियम की धारा-14
16ण् लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम 1951 धारा-69
17ण् भारत का संविधान, अनुच्छेद 101(3)(4)
18ण् भारत का संविधान, अनुच्छेद 59 (1), 66(1), 102(1), 158(1) और लोकप्रतिनिधित्व अधिनियम 1951 की धारा-100(1)
19ण् भारत का संविधान, 52वाँ संशोधन अधिनियम 1985 एवं लोकसभा (दलबदल के आधार पर, अनर्हता नियम 1985)
20ण् भारत का संविधान, अनुच्छेद 136(1)
21ण् लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम 1951 धारा-80 और 80(क)
22ण् वही, धारा-100
23ण् वही, धारा-101
24ण् महादेव शर्मा, भारतीय गणतंत्र का संविधान अनुच्छेद 324(1), पृष्ठ- 174
Received on 16.12.2018 Modified on 10.01.2019
Accepted on 25.02.2019 © A&V Publications All right reserved
Int. J. Rev. and Res. Social Sci. 2019; 7(1):193-198.