भिलाई इस्पात संयंत्र में कार्यरतए ठेका श्रमिकों एवं स्थायी कर्मचारियों की सुरक्षा संबंधी समस्याओं के संदर्भ में
डा सुनीता मिश्रा1 श्रीमती इन्दुबाला2
1सह प्राध्यापक विभागाध्यक्ष . शाण् नवीन महाविद्यालय खुर्सीपारए भिलाई
2षोध छात्रा. पं रविषंकर शुक्ल विष्वविद्यालय रायपुर
2षोध केन्द्र .षासकीय विष्वनाथ यादव तामस्कर स्नाकोत्तर स्वशासी विश्वविद्यालयए दुर्ग
*Corresponding Author E-mail: indubharti28@gmail.com
श्रम समस्याआंे पर विचार करते समय ष्श्रमष् श्रमिक या कर्मचारी शब्द का प्रयोग किया जाता हैए जिसका अर्थ हैए मजदूरी पर काम करने वाला व्यक्तिए जिसे अपनी जीविका चलाने का उनकी श्रमशक्ति एवं मानसिकए शारीरिक योग्यता के अलावा कोई अन्य पर्याप्त स्त्रोत नहीं होता हैए इस श्रम शक्ति के बदले में उन्हे मजदूरी या वेतन मिलता है। श्रमिक किसी भी प्रबंधन की श्रम.उत्पादन प्रणाली का एक प्रमुख अंग है और उसके कार्य की उपेक्षा नहीं की जा सकतीए आज श्रमिक भारतीय समाज का एक महत्वपूर्ण अंग हैए और अब सरकारी संस्थाओए समाज सेवी संगठनो एवं श्रमिक संगठनों द्वारा श्रमिको की आर्थिकए सामाजिक समस्याओं की ओर विशेष ध्यान दिया जा रहा है और उनकी सुरक्षा संबंधी समस्याओं को सुलझाने के लिए प्रयत्नशील।
सयंत्र में ठेका श्रमिक, सयंत्र में श्रमिकों, के स्वास्थ्य की दृष्टि से श्रमिको की स्थिति, आर्थिक दृष्टि से श्रमिको की स्थिति, सुरक्षात्मक दृष्टि से श्रमिको की स्थिति श्रमिक संगठन, विगत वर्षो में होने वाली दुर्घटना, संयंत्र में कार्यरत श्रमिको की समस्यायें।
प्रस्तावना
भारत के छत्तीसगढ़ राज्य के जिला दुर्ग के शहर भिलाई में स्थित इस्पात कारखाना है, यह भारत का पहला इस्पात उत्पादक संयंत्र है, तथा मुख्यतः रेलो का उत्पादन करता है। इस संयंत्र की स्थापना सोवियत संघ की सहायता से 1955 में हुई थी, एवं कारखाने की स्थापना दूसरी पंचवर्षीय योजना (1956-61) के अंतर्गत की गई थी, दस बार देश का
सर्वश्रेष्ठ एकीकृत इस्पात कारखाने के लिए प्रधानमंत्री ट्राॅफी प्राप्त यह कारखाना राष्ट्र में रेल की पटरियों और भारी इस्पात प्लेटो का एकमात्र निर्माता तथा संरचनाओं का प्रमुख उत्पादक है, यह संयंत्र आईएसओ 9001ः2000 गुणवत्ता प्रबंधन प्रणाली से पंजीकृत है। अतः इसके सभी विक्रेय इस्पात आईएसओ की परिधि में आते है, 1 मार्च 2006 की जनगणना के अनुसार इस संयंत्र में 1,31,910 कर्मचारी कार्यरत है, एवं 25000 श्रमिक (1) ;ूूूण्ेंपसण्बवण्पदध्इीपसंप.ेजममस.चसंदजध्ंइवनज.इीपसंप.ेजममस.चसंदजध् ) ठेकेदारी एवं ठेका श्रमिको की है। छत्तीसगढ़़ के भिलाई में स्टील प्लांट बहुत ही बड़े क्षेत्र में फैला हुआ है, तथा देष के लिए काम में आने वाला स्टील यही बनता है। इस प्लांट के अंदर 40 से ज्यादा विभाग (फैक्ट्रियां) है, इनमें आधे से ज्यादा बेहद ही खतरनाक है, क्योंकि इस संयंत्र में कच्चेमाल (आयरन ओर) को पिघला कर लोहा बनाया जाता है। इस प्रक्रिया के लिए बहुत अधिक तापमान लगभग 14000ब् तापमान की आवष्यकता पड़ती है।
(2) ( परिक्रमा-जनवरी-फरवरी- 2010-पृष्ठ क्रं. 14 भिलाई इस्पात संयंत्र द्वारा प्रकाषित पत्रिका )
जब लोहा पिघलना शुरू होता है। तब उसके साथ कुछ जहरीली गैसे भी बाहर निकलती हैं जो कि अत्यंत विषैली होती है, और उस माहौल में हजारो श्रमिक कार्य करते है। जो कि श्रमिको के स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है। कभी-कभी इन विषाक्त गैसो के अधिक रिसाव हो जाने से कई श्रमिक की जान भी चली गई है।
इस संयंत्र में अधिकाष कार्य ठेकेश्रमिक एवं स्थायी श्रमिक (कर्मचारी) के द्वारा पूर्ण किया जाता है। अतः संयंत्र के ठेके श्रमिको की स्थिति का विष्लेषण इन रूपों में किया जा सकता है।
1) संयंत्र में ठेके श्रमिको की स्थिति का पता लगाने के लिए श्रमिक संघठनो के द्वारा लगातार प्रयास किया जाता रहा है। एवं कई श्रमिको के द्वारा संगठनो के समक्ष संयंत्र के खिलाफ कई प्रकरण सामने आते रहे है, एवं भिलाई इस्पात संयंत्र के 6500 ठेका श्रमिक आधे दिन 20 जून 2018 को काम पर नहीं गये, क्योंकि वे (3)(भिलाई इस्पात प्लांट-विकिपिडिया ीजजचेरूध्ध्मदण्उण्ूपापचमकपंण्वतहद्ध न्यूनतम वेतन मांग की षिकायत कर रहे थे। श्रमिक संगठन एक्टू के महासचिव ष्यामलाल साहू के अनुसार केन्द्र सरकार व प्रबंधन की श्रमिक-विरोधी नीतियों के कारण ठेका श्रमिको का लगातार षोषण हो रहा है, एवं श्रमिको की कमाई का पूरा हिस्सा भी उन्हे नहीं दिया जाता है, उन्होने कहा कि ठेकेदारो एवं प्रबंधन के द्वारा ठेका श्रमिको को 30 दिन के काम करने के बाद भी 26 दिन का ही वेतन थमा दिया जाता है। और इसके खिलाफ आवाज उठाने पर काम से बाहर करने की धमकी दे दी जाती है।
2) सयंत्र में कर्मचारियों की स्वास्थ्य की दृष्टि से श्रमिको की स्थिति के बारे में सीटू के कार्यालय सचिव अनिल षेखर के अनुसार संयंत्र के कई विभाग बेहद ही खतरनाक एवं संवेदनषीनल है जैसे:- धमन भट्टी विभाग, रेलमिल आदि यहां के कर्मचारियों को षिफ्ट ड्यूटी के द्वारा काम में लिया जाता है, और 6 दिन की षिफ्ट बाटी जाती है, 6 दिन सुबह, 6 दिन दोपहर और 6 दिन रात षिफ्ट होती है।
जैविक घड़ी के अनुसार नींद आना एक स्वाभाविक प्रक्रिया है। और संयंत्र में तीन पालियों में काम होता है। इसमें रात्रि पाली में षरीर की जैविक घड़ी के अनुसार नींद आना एक स्वाभाविक प्रक्रिया है, ऐसी स्थिति में लगातार छह दिन तक नाइट षिफ्ट बेहद मुष्किल एवं थका देने वाला है, एवं स्वास्थ्य की दृष्टि से ये कर्मचारियों के लिए बीमारियाँ पैदा करने वाला है। क्योंकि अंनिद्रा के कारण श्रमिको को उच्च रक्तचाप, डायबिटिज, तनाव, चिड़चिडापन एवं अधिक धूल एवं आवाज के कारण अस्थमा, ष्वास लने में तकलीफ, कान से कम सुनाई पड़ना, कैंसर आदि बीमारियों का सामना करना पड़ता है।
सुरक्षात्मक दृष्टि से श्रमिको की स्थिति:- भिलाई इस्पात संयंत्र के तहखाना में मौजूद पंप हाउस में कर्मचारी तीनो षिफ्ट में अकेले ही ड्यूटी करते है, पंप हाउस नंबर-2 में गैस का प्रेषर बढ़ने से 12 जून 2014 को हुए गैस हादसे के दौरान 6 लोगों की जान जा चुकी है, ऐसी ही 9 अक्टूबर 2018 की संयत्र के अंदर सुबह 11 बजे कोक ओवन के करीब 25 से (4) (आज तक इन.टूडे.इन, संपादक-मोहित ग्रोवर भिलाई, छत्तीसगढ़, 9 अक्टूबर -2018) अधिक कर्मचारी काम कर रहे थे, यह नियमित रखरखाव का काम चल रहा था तभी अचानक पाईप लाइन में विस्फोट हो गया, जिससे 14 लोग बुरी तरह से घायल हो गये और 9 लोगों की मौत हो गई अतः कह सकते है। कि सुरक्षा की दृष्टि से श्रमिको का जीवन तलवार की नोक पर है। (5) ; ीजजचेरूध्ध्ंरजंाण्पद जवकंल ण्पद.9 व्बज 2018द्ध
आर्थिक दृष्टि से श्रमिको की स्थिति:- एच.एस.एल.टी ठेका श्रमिको के लोगो का कहना है कि वे लोग भिलाई निवासी है ंऔर पिछले 30-35 वर्षों से संयंत्र में लगातार ठेका श्रमिको के रूप में काम करते आ रहे है, उनकी आर्थिक स्थिति काफी खराब है। इसलिए उन ठेका श्रमिको ने भी नियमित श्रमिको जैसी नियमित वेतन की मांग की है और जिसे वे प्रबंधन तक पहुचाने के लिए लगातार प्रयास कर रहे है। ठेकेदारो के द्वारा ठेके श्रमिको की लगातार कमीषन खोरो के चलते ठेके श्रमिको की आर्थिक स्थिति काफी दयनीय हो गयी है। कभी -कभी तो हालात् इतने बिगड़ जाते है कि श्रमिको को अपने घर के बर्तन तक बेचकर अपना घर चलाना पड़ता है। और भूखे मरने की नौबत आ गई है।
श्रमिक संगठन, वर्तमान में भिलाई इस्पात संयंत्र के लगभग 12 से अधिक श्रमिक संगठन है, जो सक्रिय रूप से अपनी भूमिका निभा रहे है। विगत वर्षो से हिंदुस्तान स्टील इम्पलाज यूनियन के सदस्यो की संख्या दूसरे यूनयिन के सदस्यो की अपेक्षा अधिक है, और भिलाई-दुर्ग में इस्पात श्रमिक मंच, भिलाई इस्पात मजदूर संघ, बी.एस.पी. वर्कस यूनियन; नाम और अन्य श्रमिक संगठन भी है जो कि श्रमिको की समस्याओं को लेकर प्रबंधन के खिलाफ हड़ताल, धरना, नारेबाजी, सामूहिक सौदा प्रणाली आदि माध्यमो के द्वारा समस्याओं को सुलझाने का प्रयास करते आ रहे है।
विगत वर्षों में भिलाई इस्पात संयंत्र अपने हादसो के लिए प्रसिद्ध हो रहा है; घटना 9 अक्टूबर 2018 के दिन मौके पर उपस्थित लोगो के अनुसार मंगलवार 9 अक्टूबर को सुबह 11 बजे संयंत्र में कोक ओवन में 1800 एम.एम.की गैस जो पाइप लाइन में सुधार का काम ;6द्ध ;ूूूण्सपअमभ्पदकनेजंदण्बवउण्ज्नमेण्वबज 10ण्2018द्ध चल रहा था उसी समय उसमे आग लगी और भंयकर विस्फोट होने लगा, कर्मचारी नेता उज्जवल दत्ता के अनुसार लगभग 45 मिनट तक विस्फोट होता रहा और काम करने वाले उसकी चपेट में आते चले गये, यहां तक कि पाइप लाइन की सुधार प्रक्रिया में षामिल फायर ब्रिगेड के लोग भी इसकी चपेट में आए और वो भी मारे गए।
इस हादसे में मारे गए कई लोगों के षव इस कदर जल चुके थे कि उन्हे सिर्फ डी.एन.ए. परीक्षण के द्वारा ही पहचाना जा सका। इसी तरह का जून 2014 में एक अन्य सुधार कार्य के दौरान गैस पाईपलाइन फुट गई, जिसके कारण उस पूरे इलाके में मिथेन और कार्बन मोनो आक्साइड का रिसाव षुरू हो गया और इसकी चपेट में आ कर 6 लोगो की मौत हो गई थी।
भारत सरकार के सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम स्टील अथाॅरिटी आॅफ इंडिया लिमिटेड की इस इकाई में पिछले 60 वर्षों में कई हादसे हुए है और इन हादसों को लेकर प्रबंधन पर गंभीर आरोप लगते रहे है, लेकिन आरोप है कि सुरक्षा व्यवस्था को लेकर प्रबंधन ने कभी भी गंभीरता नहीं जताई।
श्रमिको की समस्यायें:- भिलाई इस्पात संयंत्र में कार्यरत ठेका श्रमिको का षोषण लगातार बढ़ रहा है सीटू के महासचिव योगेष सेानी ने बताया कि सीईडी विभाग के ठेका श्रमिको को 6 माह से वेतन नहीं मिला है, जिससे ठेका श्रमिक बहुत परेषान है, तब वे यूनियन कार्यालय में आकर षिकायत की, इस मामले में संयंत्र प्रबंधन को षिकायत करने के बाद भी अब तक ठोस पहल नहीं कि गयी।
श्रमिको को दि जाने वाली आवास सुविधा में कमी के चलते श्रमिक काफी परेषान है, क्योंकि प्लांट के आस-पास सेक्टर एरिया में श्रमिको के रहने के लिए आवास सुविधा के तहत उन्हे क्वाॅटर आबंटन किया जाता था, परंतु 50-60 वर्षो में क्वाॅटरो की हालत बद-से बदतर हो गयी है। वे पूर्ण रूप से जर्जर हो गये है। फिर भी प्रबंधन द्वारा नये आवासो का निर्माण नहीं कराया जा रहा है, और श्रमिक उन जर्जर भवनो में रहने के लिए मजबूर है।
रेस्ट रूम, षौचालयः- श्रमिको की लगातार प्रबंधन द्वारा मांग रही है कि कार्य के दौरान उन्हे आराम करेन हेतु सुविधा जनक-साफ सुथरा रेस्ट रूम मिलना चाहिए, क्योंकि कार्य के दौरान साफ-सुथरा वातावरण हर श्रमिक का मानवअधिकार है। षौचालय के लिए महिला श्रमिको द्वारा लगातार प्रबंधन को मांग रखी जा रही है। लेकिन प्रबंधन की उदासीनता के कारण महिला संयंत्र कर्मी परेषान है। महिला श्रमिको का मानना है कि पुरूष कर्मी षौचालय न होने पर भी बाहर जाकर अपनी व्यवस्था कर लेते है परंतु महिलाओ के लिए यह संभव नहीं है। और महिला के सम्मान के लिए षौचालय उनका हक है।
केन्टीन:- इस्पात संयंत्र के श्रमिको, एवं यूनियनो के नेताओं द्वारा लगातार साफ, सुथरा उचित मूल्य का केन्टीन की मांग प्रबंधन से की जाती रही है। क्योंकि संयंत्र को बने 50-60 वर्षों पूर्ण हो चुके है, और पुराने केन्टीनो की दषा एवं दिषा बेहद चिंता जनक है जहां श्रमिक रोज बैठकर अपना खाना खाते है। इसलिए श्रमिको को साफ सुथरा केन्टीन की मांग उचित है।
भारत सरकार द्वारा श्रमिको के षोषण को रोकने हेतु विषेष प्रावधान है, जिनमे मुख्य है:-
1. 1901 खादान अधिनियम
2. 1948 कारखाना अधिनियम
3. 1911 फैक्ट्री अधिनियम एवं 1954 फैक्ट्ररी अधिनियम
4. 1926 फैक्ट्री संषोधन अधिनियम
5. 1961 मोटर ट्रांसपोर्ट मजदूर अधिनियम
6. घातक दुर्घटना अधिनियम, 1855
7. ठेका श्रमिक विनियमन और उत्पादन अधिनियम 1970 ;7द्ध ;डाॅ. आर.एस.विजय वर्गीय, श्रमिक विधियाँ-2007 पृष्ठ क्रमांक 108, 109)
इन अधिनियम के होने के बावजूद भी आज भी श्रमिको का षोषण हो रहा है।
श्रमिको का षोषण रोकने के लिए हम कुछ सकारात्मक सुझावो का प्रयोग कर सकते है। जो इस प्रकार है:-
1. प्रबंधन द्वारा श्रमिको को उचित ट्रेनिंग देनी जाने चाहिए जिससे की संयंत्र में कार्य के दौरान दुर्घटना कम हो।
2. संयंत्र में श्रम कानूनो का कड़ाई से पालन हो एवं यूनियनों के द्वारा श्रमिको को उनके अधिकारो के बारे में बताया जाये ताकि किसी भी प्रबंधन द्वारा श्रमिको के मानव अधिकारो का उल्लंघन न हो।
3. संयंत्र में 2 दिन षिफ्ट प्रणाली की प्रक्रिया को जल्द षुरू करना चाहिए क्योंकि लगातार 6 दिनो तक रात्रिपाली की ड्यूटी से श्रमिक की मानसिक एवं षारीरिक स्वास्थ्य समस्याओं पर काबू पाया जा सके।
4. प्रबंधन द्वारा श्रमिको को उचित रेस्ट रूम, साफ सुथरा केन्टीन एवं सुलभ षौचालय प्रदाय होना चाहिए क्योंकि साफ सुथरा वातावरण हर श्रमिक का अधिकार है।
5. प्रबंधन द्वारा श्रमिको के समय-समय पर स्वास्थ्य परीक्षण कराया जाना चाहिए और उनका रिकार्ड भी रखना चाहिए। जिससे श्रमिको की स्वास्थ्य संबंधी परेषानियों से प्रबंधन अवगत हो।
6. प्रबंधन द्वारा कार्य के दौरान सुरक्षात्मक उपकरणो के प्रयोग पर कड़ाई बरती जाये एवं श्रमिको की सुरक्षात्मक उपकरणों के उपयोग, एवं सावधानीयों के बारे में उचित जानकारी दी जानी चाहिये।
7. श्रमिको की कार्य के दौरान दुर्घटना या मुत्यु हो जाने पर परिवारजनो को आसानी से अनुकंपा नियुक्ति मिल जानी चाहिए, क्योंकि कोई भी श्रमिक जो काम करता है। वह अपने परिवार का पालन हार होता है। और मृत्यु हो जाने पर, परिवारजनो को छोटी, बड़ी नियमों मे उलझााकर प्रबंधन द्वारा अनुकंपा नियुक्ति नहीं दी जाती हैं जो की पिड़ित परिवार के लिए सबसे बड़ी समस्या बन जाती है।
8. अनुकंपा नियुक्ति से संबंधित लंबित प्रकरणो को जल्द से जल्द सुलझाया जाये एवं समय-समय पर प्रबंधन द्वारा श्रमिको से मिटिंग कर उनकी समस्याओं को समझने एवं सुलझाना का प्रयत्न करना चाहिए ताकि श्रमिक सही ढंग से सही उर्जा के साथ अपना तन-मन लगाकर प्रबंधन को अपना पूर्ण योगदान कर सके।
9. श्रमिक किसी भी संयंत्र के आर्थिक विकास का अहम हिस्सा है। उनकी उपेक्षा नहीं करनी चाहिए, और समय-समय पर श्रमिको को उनके कार्यो के लिए सराहनीय योगदान हेतु पारितोषिक दिया जाना चाहिए।
संदर्भित ग्रंथ
(1) ूूूण्ेंपसण्बवण्पदध्इीपसंप.ेजममस.चसंदजध्ंइवनज.इीपसंप. ेजममस.चसंदजध्
(2) परिक्रमा-जनवरी-फरवरी-2010-पृष्ठ क्रं. 14
भिलाई इस्पात संयंत्र द्वारा प्रकाषित पत्रिका
(3) भिलाई इस्पात प्लांट-विकिपिडिया ीजजचेरूध्ध्मदण्उण्ूपापचमकपंण्वतह
(4) आज तक इन.टूडे.इन, संपादक-मोहित ग्रोवर भिलाई, छत्तीसगढ़, 9 अक्टूबर -2018
(5) ीजजचेरूध्ध्ंरजंाण्पद जवकंल ण्पद.9 व्बज 2018
;6द्ध ूूूण्सपअम भ्पदकनेजंदण्बवउण्ज्नमेण्वबज 10ण्2018
;7द्ध डाॅ. आर.एस.विजय वर्गीय, श्रमिक विधियाँ-2007 पृष्ठ क्रमांक 108, 109
Received on 12.04.2019 Modified on 08.05.2019
Accepted on 10.06.2019 © A&V Publications All right reserved
Int. J. Rev. and Res. Social Sci. 2019; 7(2):395-398.