अनुसूचित जनजाति के नेतृत्व की प्रवृत्ति (रीवा जिले के ग्राम पंचायत बांसा के विशेष संदर्भ में)
गायत्री चैरसिया
शोधार्थी समाजशास्त्र ठाकुर रणमत सिंह महाविद्यालय, रीवा (म.प्र.)
भारत गांवों का देश है। गाॅवों की उन्नति और प्रगति पर ही भारत की उन्नति प्रगति निर्भर करती है। गाॅधी जी ठीक कहा था कि ष्ष्यदि गाॅव नष्ट होते है तो भारत नष्ट हो जाएगा।ष्ष् भारत कें संविधान.निर्माता भी इस तथ्य से भलीभांति परिचित थे। अतः हमारी स्वाधीनता को साकार करने और उसे स्थायी बनाने के लिए ग्रामीण शासन व्यवस्था की ओर पर्याप्त ध्यान दिया गया। हमारे संविधान में यह निदेश दिया गया है कि ष्ष्राज्य ग्राम पंचायतों के निर्माण के लिए कदम उठाएगा और उन्हें इतनी शक्ति और अधिकार प्रदान करेगा जिससे कि वे ;ग्राम पंचायतद्ध स्वशासन की इकाई के रूप में कार्य कर सकें।ष्ष् वस्तुतः हमारा जनतंत्र इस बुनियादी धारणा पर आधारित है कि शासन के प्रत्येक स्तर पर जनता अधिक से अधिक शासन कार्यो में हाथ बंटाए और अपने परए राज करने की जिम्मेदारी स्वयं झेले। भारत में जनतंत्र का भविष्य इस बात पर निर्भर काता है कि ग्रामीण जनों का शासन से कितना अधिक प्रत्यक्ष और सजीव सम्पर्क स्थापित हो जाता हैघ् दूसरे शब्दों मेंए ग्रामीण भारत के लिए पंचायती राज ही एकमात्र उपयुक्त योजना है। पंचायतें ही हमारे राष्ट्रीय जीवन की रीढ़ है। दिल्ली की संसद में कितने ही बड़े आदमी बैठें। लेकिन असल में ष्पंचायतेंष् ही भारत की चाल बनाएंगी। पण्डित जवाहर लाल नेहरू ने ठीक ही कहा था कि ष्ष्यदि हमारी स्वाधीनता को जनता की आवाज की प्रतिध्वनि बनना है तो पंचायतों को जितनी अधिक शक्ति मिलेए जनता के लिए उतनी ही भली है। पंचायतीराज अधिनियम 1993 के संवैधानिक प्रावधानों के कारण अनुसूचित जनजाति वर्ग को ग्राम पचांयतों में प्रतिनिधित्व का अवसर प्राप्त हुआ है। पंचायत राज का क्रियान्वयन एवं अनुसूचित जनजाति नेतृत्व का यह अध्ययन स्पष्ट करता है कि नेतृत्व की सामाजिक आर्थिक स्थिति कमोवेश अनुसूचित जन जाति वर्ग की तरह ही औसतन निम्न स्तर की है। ग्रामीण सामाजिक संरचना में परम्परागत रूप से निम्न स्थिति प्राप्त इस वर्ग की महिलाओं को नेतृत्व करने का यह प्रथम अवसर प्राप्त हुआ है। पंचायत राज की बहुविविध गतिविधियों में ग्राम पंचायत बांसा के अनुसूचित जनजाति के नेतृत्व की स्थिति प्रशिक्षणार्थी के समान रही है। अशिक्षाए कमजोर सामाजिक आर्थिक पृष्ठ भूमि कार्य के औपचारिक अनुभव का अभाव जैसे कारणों से इन नेतृत्व में कई महत्वपूर्ण प्रावधानों के प्रति अनभिज्ञता दिखाई दी। इसके बावजूद ग्रामीण विकास पंचायत की समस्याएॅ अनुसूचित जनजाति वर्ग उत्थान जैसे विषयों पर इस नेतृत्व ने स्पष्ट विचार व्यक्त किए जिसमें ये देखने में आया कि अनुसूचित जनजाति वर्ग में नेतृत्व की अपार संभावनाएं है।
पंचायतीराजए ग्रामीण विकासए अनुसूचित जनजाति नेतृत्व।
प्रस्तावना
भारत में ग्राम पंचायतों का इतिहास बहुत पुराना है। प्राचीन काल में आपसी झगड़ों का फैसला पंचायतें ही करती थीं। परन्तु अंग्रेजी राज में जमाने में पंचायतें धीरे-धीरे समाप्त हो गयीं और सब काम प्रान्तीय सरकारें करने लगी। स्वाधीनता प्राप्ति के बाद राज्यों की सरकारों ने पंचायतों की स्थापना की ओर विशेष ध्यान दिया। प्रो0 रजनी कोठारी के अनुसार, ‘‘राष्ट्रीय नेतृत्व का एक दूरदर्शितापूर्ण कार्य था पंचायती राज की स्थापना। इसमें भारतीय राज व्यवस्था का विकेन्द्रीकरण हो रहा है और देश में एक सी स्थानीय संस्था के निर्माण से उसकी एकता भी बढ़ रही है।’’1 इसकी शुरूआत का श्रेय श्री जवाहर लाल नेहरू को है। पं. नेहरू का कहना था कि2 ‘‘गाॅवों के लोगों को अधिकार सौंपना चाहिए। उनको काम करने दो चाहें वे हजारों गलतियाॅ करें। इससे घबराने की जरूरत नहीं। पंचायतों को अधिकार दो।’’
वस्तुतः हमारा जनतंत्र इस बुनियादी धारणा पर आधारित है कि शासन के प्रत्येक स्तर पर जनता अधिक से अधिक शासन कार्यो में हाथ बंटाए और अपने पर, राज करनेकी जिम्मेदारी स्वयं झेले। भारत में जनतंत्र का भविष्य इस बात पर निर्भर करता है कि ग्रामीण जनों का शासन से कितना अधिक प्रत्यक्ष और सजीव सम्पर्क स्थापित हो जाता है? दूसरे शब्दों में, ग्रामीण भारत के लिए पंचायती राज ही एकमात्र उपयुक्त योजना है। पंचायतें ही हमारे राष्ट्रीय जीवन की रीढ़ है। दिल्ली की संसद में कितने ही बड़े आदमी बैठें। लेकिन असल में ‘पंचायतें’ ही भारत की चाल बनाएंगी।
पण्डित जवाहर लाल नेहरू ने ठीक ही कहा था कि ‘‘यदि हमारी स्वाधीनता को जनता की आवाज की प्रतिध्वनि बनना है तो पंचायतों को जितनी अधिक शक्ति मिले, जनता के लिए उतनी ही भली है।
ग्रामीण अनुसूचित जनजाति नेतृत्व ने पंयाचत राज क्रियान्वयन में कहीं बहुत प्रभावकारी तो कहीं सामान्य भूमिका निभाई है। परम्परागत रूप से अप्रतिनिधित्व प्राप्त इस वर्ग की कार्य के माध्यम से प्रशिक्षण की प्रक्रिया पिछले चालू वर्षो से सतत् जारी है। क्रियान्वयन को अधिक प्रभावशाली बनाने के लिए इस नेतृत्व के लिये विकेन्द्रीकरण की मूल अवधारणा को समझते हुए गंभीर प्रयास किए जाने की आवश्यकता है।
ग्राम पंचायत त्रिस्तरीय पंचायत राज व्यवस्था की सबसे निम्नतम स्तर की इकाई है। ग्रामीण क्षेत्रों में कार्य करने की सीधी जिम्मेदारी ग्राम पंचायतों की है। ग्राम पंचायत में स्वशासन से जुडे़ सभी महत्वपूर्ण कार्य सम्पादित होते है। ऐसे में सरपंच की ग्राम पंचायत के प्रमुख के नाते केन्द्रीय एवं महत्वपूर्ण भूमिका होती है। मध्य प्रदेश शासन ने पंचायतों को स्थानीय स्व शासन की स्वतंत्र इकाईयाॅं बनाने के उद्देश्य से बहुविविध कार्यो, अधिकारों कर्तव्यों एवं शक्तियों को पंचायतों को प्रदान किया गया है। ग्राम पंचायतों की वैविध्यपूर्ण भूमिका के सन्दर्भ में अनुसूचित जनजाति महिला सरपंचों से जानकारी प्राप्त की गई।
भारत में अनुसूचित जनजाति के वर्ग की स्थिति काफी दयनीय है गरीबी की मार इन पर अधिक सीधी और तीखी है। भारतीय महिलायें परिवार के भरण पोषण के लिये जिम्मेदार ठहराई जाती है। अनुसूचित जनजाति वर्ग में रचनात्मकता होती है साथ ही साथ वे अपनी मदद् स्वंय करने की उत्सुक होते हैं। एक सी पृष्ठभूमि बड़ी से बड़ी समस्या का समाधान करने में समर्थ है, इस भावना को समझ कर सरकार ने पंचायतीराज व्यवस्था का निर्माण किया, इसके अन्तर्गत वर्तमान समय में विभिन्न उत्पादक गति विधियों का संसाधन कर रहा है। इसमें ग्रामीण महिलायें विशेष कर पिछड़ी जाति अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति वर्ग का आर्थिक उत्थान हुआ है ये आज अपने परिवार की जिम्मेदारी को बखूवी से निभाने में सफल हुई है एवं आत्मनिर्भर हुई। सामाजिक, आर्थिक व राजनीतिक दुर्बलताओं का सर्वाधिक प्रभाव महिलाओं पर होता है भारतीय संदर्भ में यदि देखा जाये तो पिछड़े क्षेत्रों के ग्रामीण व श्रमिक बाहुल्य परिदृश्य में अनुसूचित जाति/जनजातीय महिलाओं की स्थिति बहुत ही दयनीय है। अशिक्षा, कुपोषण, काम का बोझ तथा आर्थिक विषमताओं के फलस्वारूप होने की संभावना के विषम में सोचना भी कठिन हो गया है।
मध्य प्रदेश में त्रि-स्तरीय पंचायत राज व्यवस्था है जिसमेें 48 जिला पंचायतें, 313 जनपद पंचायतें एवं 23051 ग्राम पंचायतें हैं। प्रस्तुत अध्ययन ग्राम पंचायत बांसा के अनुसूचित जनजाति पर केन्द्रित है। वर्तमान में वैश्वीकरण, निजीकरण, मुक्त बाजार व्यवस्था, पूंजी तथा श्रम का पलायन संरचनात्मक, समायोजन, विकेन्द्रीकरण, पुर्नसंरचना विनियमन तथा स्थानीय विकास आदि के युग में जनकल्याणकारी नीतियों का निर्धारण व क्रियान्वन अधिकतर गैर सरकारी संस्थाओं के माध्यम से किया जाता है। अतः प्रशासन के मूलभूत सिद्धांत है-समानता, न्याय, सम्पन्नता, लोकतंत्र तथा इन्हें सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक है सहभागिता, विकेन्द्रीकरण, उत्तरदायित्व एवं पारदर्शिता। पिछले कुछ समय से विश्व बैंक व आर्थिक विकास सहयोग संगठन सुशासन को प्रचारित करने में सबसे आगे हैं। विश्व बैंक ने सुशासन को परिभाषित करते हुए तीन पहलुओं से संबंधित किया।
1. राजनीतिक शासन प्रणाली का रूप।
2. विकास हेतु देश के आर्थिक और सामाजिक संसाधनों के प्रबंधन में प्राधिकार प्रयोग की प्रक्रिया।
3. नीति-प्रारूपण, नीति निर्माण एवं नीति क्रियान्वन में सरकार की योग्यता।
विश्व बैंक की तरह ही आर्थिक सहयोग और विकास संगठन ने भी विकासशील देशों को विकास संबंधी सहायता देने के लिए सुशासन की शर्तें रखी। इन दो संस्थाओं के अलावा वैश्विक सुशासन से संबंधित आयोग, संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम व यूनेस्को जैसी संस्थाओं ने भी सुशासन के तत्वों और लक्षणों को प्रस्तुत किया। 1955 में ‘कमीशन आॅन ग्लोबल गवर्नेंस’ ने सुशासन को प्रबंधन की संपूर्णता से संबंधित किया तथा स्पष्ट किया कि लोकनीति व्यक्तिगत एवं सार्वजनिक नियमों, संस्थाओं तथा घटनाओं को प्रभावित करती हैं। 1999 में दक्षिण एशिया में मानव विकास पर प्रतिवेदन से स्पष्ट होता है कि वैश्विक स्तर पर सुशासन में परिवर्तन तथा 90 के दशक में उदारीकरण और वैश्वीकरण के प्रभाव से वैश्विक आर्थिक व्यवस्थ में व्यापक परिवर्तन हुआ। परिणामतः वैश्विक संगठन संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा नागरिक घोषणा पत्र के माध्यम से प्रशासन को सरल संवेदनशील, जबावदेह और पारदर्शी बनाने का प्रयास शुरू हुआ। आज 21वीं सदी में यह मत व्याप्त है कि सुशासन किसी राष्ट्र एवं क्षेत्र विशेष से जुड़ी अवधारणा नहीं बल्कि एक वैश्विक अवधारणा है जो गतिशील तथा परिवर्तित हो रही वैश्विक परिस्थितियों को सकारात्मकता प्रदान करने से संबंधित है। अतः उदारीकरण और वैश्वीकरण के इस वातावरण में संयुक्त समन्वित मानवीय प्रयास के माध्यम से सुशासन को प्राप्त कर वैश्विक गांव को विकसित करने में सफलता प्राप्त होगी और संपूर्ण मानव समाज का विकास संभव होगा।
इसी प्रकार पंचायती राज संस्थानों और स्थानीय नौकरशाही के बीच सम्बन्धसूत्रता के बारे में भी अधिनियम चुप्पी साधे हुए है। एक महत्वपूर्ण कमी पंचों एवं सरपंचोें के लिए ‘साक्षरता’ का निर्बन्धन हटा देने की है। पुराने पंचायती राज कानून में सरपंच के प्रत्याशी के लिए साक्षर होना आवश्क था। यह व्यवस्था तर्कसंगत थी। वर्तमान कानून में इेस स्थान नहीं देने के कारण शयद यह हो सकता है कि इसमें अनुसुचित जाति एवं जनजाति के लोगों के लिए स्थान आरक्षित किए गए है और गांवो मे आज भी यह वर्ग सामान्यतः अशिक्षित या निरक्षर है, लेकिन यह व्यवस्था तो की हो जा सकती है कि एक बार कोई व्यक्ति पंच या सरपंच निवंचित हो जाने पर वह दुबारा इस पद के लिए तभी पात्र होगा जब वह पांच वर्षो मे साक्षर हो जाएगा। नये पंचायती राज कानून मे एक महत्वपूर्ण कमी यह है कि इसमें ‘न्याय पंचायतों’ की व्यवस्था नहीं की गई है। लेखक की मान्यता है कि 73 वां संविधान संशोधन अधिनियम बन जाने के बावजूद पंचायती रा सम्बन्धों की सफलता राज्य सरकारों की इच्छा पर निर्भर करती है।
साहित्य की समीक्षा:-
पंचायती राज संस्थाओं का ग्रामीण विकास में योगदान जिन-जिन लेखकों का रहा है उसका कुछ स्वरूप निम्न प्रकार है:
जसप्रीत कौर सोनी (2006)1, ग्लोबलइजेशन: ब्रिजिंग डिवाइड विटवीन सिविल सोसाइटी एण्ड गुड गवर्नेंस प्रस्तुत लेख में लेखक ने सुशासन की महत्ता को स्वीकारा है। सुशासन और नागरिकों के मांगों के संबंध में प्रस्तुत लेख वैश्वीकरण और लोकतंत्र के बीच संबंध को समझने की कोशिश करता है। लेखक के अनुसार लोकतंत्र के तीन मुख्य आधार है, सरकार व्यवसायिक समुदाय और समाज। समाज के उद्देश्यों की पूर्ति व नागरिकों के दैनिक जीवन में आने वाली सामान्य जरूरतों की पूर्ति में स्थानीय नेतृत्व की अहम् भूमिका होती है साथ ही इसमें लेखक ने पंचायतीराज व्यवस्था की महत्ता को भी स्पष्ट किया है।
बी.एम. शर्मा, रूप सिंह बारेठ (2004)2, गुड गवर्नेंस, ग्लोब्लाइजेशन एण्ड सिविल सोसाइटी प्रस्तुत पुस्तक राष्ट्रीय सेमीनार में प्रस्तुत शोधपत्रों का संकलन है। यह पुस्तक सुशासन वैश्वीकरण और नागरिक समाज इन तीनों अवधारणाओं का भारतीय राजनीतिक परिदृश्य में नवोदित वैश्विक व्यवस्था के संदर्भ में विश्लेषण करने का प्रयास करती है। इस पुस्तक में सुशासन वैश्वीकरण तथा नागरिक समाज की संकल्पनाओं को परिभाषित, परीक्षण व परिष्कृत करने का प्रयत्न किया गया है। विशेष रूप से भारत जैसे विकासशील देश पर इनका प्रभाव तथा इक्कीसवीं शताब्दी की चुनौतियों का इस पुस्तक में विस्तार से वर्णन किया गया है। पुस्तक में इस बात पर विशेष जोर दिया गया है कि किस प्रकार शासन विशेष रूप से शासन में सुधार तथा इसके समाज के संबंध में बात करना आजकल परिपाटी हो गया है। इस पुस्तक में सुशासन के विभिन्न आयामों जैसे-विकास, संगठनात्मक प्रभाव, आमजनता के जीवन स्तर को सुधारने की वचनबद्धता, पारदर्शिता, सहभागिता, सामाजिक न्याय व प्रशासनिक सुधार को बहुत प्रभावशाली व सुरूचिपूर्ण ढ़ंग से प्रस्तुत किया गया है।
सी.पी. बर्थवाल (2003)3, गुड गवर्नेंस इन इण्डिया प्रस्तुत पुस्तक में लेखक ने ‘सुशासन’ की अवधारणा पर अत्यधिक बल दिया है। पुस्तक में लेखक ने सुशासन का अर्थ परिभाषित करते हुए उसकी प्रशासन व समाज में उसकी भूमिका को भी स्पष्ट किया है। साथ ही भारत में सुशासन, पंचायतीराज व सुशासन व वैश्वीकरण, सुशासन व लोकतंत्र, सुशासन व मानवाधिकार आदि विषयों को प्रस्तुत किया है।
पूजा शर्मा (2015) 4 इन्होने अपने लघुशोध प्रबंध ‘‘ग्रामीण विकास पंचायतीराज की भूमिका-महमूदपुर विकासखण्ड के विशेष संदर्भ में’’ में पंचायती राज से संबंधित पिछले कुछ वर्षो के शासन आदेशों पर अगर गौर किया जाये तो यह स्पष्ट होता है कि कई ऐसे मामलों में सरकार खुद कोई पहल नहीं करना चाहती है और कई मामलों में यदि वह पहल की इच्छुक होती है तो कई बार ऐसा लगता है कि विभिन्न शासनादेश जारी करके सरकार ऐसा दिखाना चाहती है कि वह पंचायतों की उनके अधिकार और विभाग देने के मामले में ज्यादा गंभीर है। इसी लिए जो योजना पंचायत में चलाई जाती है उसका ज्यादा से ज्यादा बी.पी.एल. वालों को लाभ समय से दिया जाना चाहिए। अतः यह कहा जा सकता है कि भारत जैसे देश में जहाॅं पंचायती राज व्यवस्था लागू होती है, यदि पंचायती स्तर पर हमारा विकास होगा तो हम अवश्य ही राष्ट्रीय स्तर पर विकास करेगें क्योकि पंचायती स्तर सबसे छोटा स्तर या विकास की पहली सीढ़ी होती है, यदि पंचायती स्तर पर विकास होगा तो राष्ट्रीय आय, प्रति व्यक्ति आय, इत्यादि में वृद्धि होगी जिससे भारत के विकास में वृद्धि होगी। पंचायती व्यवस्था के अंतगर्त मिलने वाली सेवाओं या योजनाओं का लोगों तक सही से पहॅंुचने एवं उसका सही तरह से प्रयोग करने से अवश्य ही पंचायती व्यवस्था विकास करेगी, जिससे भारत विकास करेगा।
बिन्दु सिंह (2014)5 इन्होने ‘‘भारत में लोकतांत्रिक विकेन्द्रीकरण एवं पंचायती राज’’ पंचायती राज संस्थाओं के भारतीय संविधान का हिस्सा बन जाने से अब कोई भी पचायतों को दिए गए अधिकरों, दायित्वों और वित्तीय साधनों को उनसे छीन नहीं सकेगा। 73वां संविधान संशोधन न केवल पंचायती राज संस्थाओं मे संरचनात्मक एकरुपता लाने का प्रयास है बल्कि यह सुनिश्चित भी करता है कि इसमें एक ऐसा भी प्रावधान रखा गया है जिसके अन्तर्गत राज्य विधानमण्डल, यदि उचित समझें तो पिछड़ी जातियों के नागरिकों के लिए आरक्षण का प्रावधान रख सकते हैं। अब तक पंचायती राज संस्थाओं की विफलता का कारण उनके चुनाव समय पर न कराना और उन्हे बार-बार भंग या स्थागित किया जाना रहा है वर्तमान अधिनियम में इस समस्या पर समुचित ध्यान दिया गया है और उम्मीद है कि पंचायती राज संस्थान निचले स्तर पर लोकतन्त्र के कारगर उपकरण साबित होंगे क्योंकि उनके निर्वाचनों की निश्चित अवधि पर समयबद्ध व्यवस्था की गई है। इन संस्थानों को अब छह महीने से अधिक समय के लिए भंग या स्थागित नहीं किया जा सकता।
बी. मुखर्जी(1962)6, ‘‘कम्युनिटी डवलपमंेट एण्ड पंचायती राज, दी इण्डियन जर्नल आॅफ पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन’’ वाल्यूम 8 नं. 4 अक्टूबर-दिसम्बर 1962, पृ. 579-80 में बताया गया है कि पंचायती राज को वर्तमान भारत में लोकतंत्र के विकास के लिए आवश्यक प्रक्रिया के रूप में अपनाया जाना है।
जयप्रकाश नारायण(1961)7, ‘‘स्वराज फाॅर दी पीपुल’’ वाराणसी, अखिल भारत सर्व सेवा संघ, 1961, पृ. 7-8 में कहा गया है कि पंचायती राज प्रशिक्षण देकर नेतृत्व तैयार करने तक ही नहीं माना जा सकता ना ही सामुदायिक रूप में इसे सर्वोदय कार्यक्रम के रूप में अपनाया गया।
शोध का उद्देश्य -
1. ग्रामीण अनुसूचित जनजाति नेतृत्व की सामाजिक-आर्थिक पृष्ठभूमि का अध्ययन करना।
2. पंचायत राज व्यवस्था के क्रियान्वयन के सन्दर्भ मे अनुसूचित जनजाति नेतृत्व के दृष्टिकोण का पता लगना।
3. पंचायती राज के माध्यम् से अनुसूचित जनजाति की सामाजिक, आर्थिक स्थिति का तुलनात्मक अध्ययन करना।
4. पंचायती राज के माध्यम् से अनुसूचित जनजाति के नेतृत्व की राजनीतिक व प्रशासनिक स्थिति का तुलनात्मक अध्ययन करना।
5. पंचायती राज व्यवस्था में अनुसूचित जनजाति के राजनैतिक विकास को प्रभावित करने वाले सकारात्मक एवं नकारात्मक कारकों का अध्ययन करना।
6. इसके प्रति भ्रान्त धारणा को स्पष्ट करना एवं जनसहभागिता को बढ़ाने का प्रयास करना
7. पंचायतीराज संस्थाओं के बीच समन्वयक स्थापित करते का प्रयास करना एवं उनके बीच पाये जाने वाले अन्य सम्बन्धों के बारे में जानना।
8. ग्राम पंचायत बांसा के अनुसूचित जनजाति की राजनीतिक सजगता एवं अभिरूचि का मूल्यांकन करना।
उपकल्पना -
शोध क्षेत्र में जनजातीय महिलाओं में शिक्षा रोजगार आर्थिक व्यवसायिक परिवर्तन में नगर पंचायत तथा जनपद पंचायत में प्रारंभिक योजनाओं के साधनों के लाभो पर नामांकन दर में कोई सार्थक अन्तर नहीं है।
ऽ ग्राम पंचायत की बैठकों में नियमित भाग लेने के मामले मे अनुसूचित जनजाति वर्ग का नेतृत्व का बहुत बड़ा प्रतिशत जागरूक है।
ऽ ग्रामीण अनुसूचित जनजाति नेतृत्व में पंचायती राज क्रियान्वयन में कही बहुत प्रभावकारी तो कही सामान्य भूमिका निभाई है। क्रियान्वयन को अधिक प्रभावशाली बनाने में लिए इस नेतृत्व के लिए विकेन्द्रीकरण की मूल अवधारणा को समझते हुए गंभीर प्रयास किये जाने की आवश्यकता है।
ऽ ग्रामीण अनुसूचित जनजाति नेतृत्व की पंचायतों ने प्रथम औपचारिक भागीदारी आने वाले समय में ज्यादा सजग एंव जागरूक नेतृत्व देने में सक्षम होगी।
शेाध का क्षेत्र -
प्रस्तुत शोध पत्र ‘‘अनुसूचित जनजाति के नेतृत्व की प्रवृत्ति‘‘ (रीवा जिले के ग्राम पंचायत बांसा के विशेष संदर्भ में) पर आधारित है। अपनी भौगोलिक स्थिति के कारण मध्य प्रदेश में रीवा जिले का एक विशेष स्थान है। ग्राम पंचायत बांसा का क्षेत्रफल 1994.376 हेक्टठेयर है ग्राम पंचायत बांसा की कुल जनसंख्या 5617 है जिसमें 2732 महिलाए (48.6ः) तथा 2885 पुरूष (51.4ःद्ध है। इसकी कुल साक्षरता दर 57.9ः है जिसमें 3255 लोग साक्षर है, जिसमें महिला साक्षरता 24.61ः ;1380द्ध है। ग्राम की कुल जनसंख्या की 28.9ः ;1625द्ध आबादी अनुसूचित जनजाति एवं 4.2ः ;235द्ध अनुसूचित जाति के लोग निवासरत है।
शोध प्रविधि -
ज्ञान के क्षेत्र में शोध कार्य अपरिहार्य है। शोध कार्यो द्वारा उन प्रश्नों का उत्तर जानने का प्रयास किया जाता है, जिनका उत्तर उपलब्ध नही है। उन समस्याओं का समाधान करने का प्रयास किया जाता है जिनका समाधान उनलब्ध नही है। वर्तमान युग में शोध या अनुसंधान का अत्यधिक महत्व है, क्योंकि किसी भी क्षेत्र से संबंधित तथ्यों का प्रमाणीकरण, नवीनीकरण, एवं सत्यापन अनुसंधान के द्वारा ही किया जा सकता है।
शोध कार्य में अनुसूचित जनजाति केनेतृत्व की प्रवृत्ति से सम्बन्धित वास्तविक एवं विश्वसनीय आकड़ो को प्राप्त करने के लिये प्राथमिक एवं द्वितीयक दोनों प्रकार के आकड़ों को एकत्र कर पूर्ण किया गया है। प्राथमिक आकड़े स्वयं कार्य स्थल पर जाकर मूल स्त्रोतो एवं साक्षात्कार अनुसूची द्वारा एकत्र किये गये हैं। जबकि द्वितीयक स्त्रोत में विषय से संबंधित पूर्व शोध अध्ययन, शोध आलेख, निबंध, अवसरिक पत्र, जर्नल, शासकीय प्रकाशन, आदेश परिपत्र, अध्यादेश, अधिनियम इत्यादि से तथ्यों का संकलन किया गया है।
अध्ययन क्षेत्र के रूप में ग्राम पंचायत बांसा में निवास करने वाले 50 उत्तर दाताओं का चयन कर पंचायती राज में शोधार्थी द्वारा साक्षात्कार के दौरान ग्रामीण अनुसूचित जनजाति नेतृत्व के सन्दर्भ में उत्तरदाताओं द्वारा प्राप्त जानकारी निम्ननुसार हैः-
उपयुक्त तालिका से यह स्पष्ट होता है कि अनुसूचित जनजाति के राजनैतिक के लागों से पंचायतीराज के विषय में पूछने मंे पता चला कि इस बारे में लोग की 85 प्रतिशत हाॅ में और 15 प्रतिशत नहीं में थी।
उपर्युक्त तालिका में पंचायतीराज का गठन होने के बाद गांव का विकास हो रहा इस बारे में लोगो का 90 प्रतिशत हाॅ में जबाब मिला और 10 प्रतिशत नहीं में जबाव प्राप्त हुआ।
उपर्युक्त निष्कर्ष से यह स्पष्ट होता है, कि पंचायती राज के द्वारा प्रदत्त ग्राम पंचायतो के कार्यो के बारे में 65 प्रतिशत लोगो का मत हाँ है और 35 प्रतिशत लोगो का मत नही है।
उपर्युक्त स्पष्ट होता है कि ग्राम पंचायतो को ही गई शक्त्यिों के बारे में 85 प्रतिशत लोगो का मत है और 15 प्रतिशत लोगो का मत नही है।
उपर्युक्त स्पष्ट है कि ग्राम विकास के लिये बनने वाली योजना में ग्रामीणो से विचार विमर्श करते है, जिसमें 65 प्रतिशत लोगो का मत हाँ है और 35 प्रतिशत मत नही है।
उपरोक्त सारणी से स्पष्ट है कि अभी तक ग्राम विकास के लिये जो योजनाऐं तैयार कर विकासखण्ड अधिकारी या जिला अधिकारी को भेजा है जिसमें 40प्रतिशत मत हाॅ है और 60 प्रतिशत मत नहीं है।
उपरोक्त सारणी से स्पष्ट है कि ग्राम पंचायत में मौजूद माध्यम से या प्राथमिक विद्यालय का निरीक्षण या भ्रमण करने जाते है जिसमें 65 प्रतिशत मत हाॅ है और 35 प्रतिशत मत नहीं है।
विश्लेषण - उपर्युक्त आंकड़ो के विश्लेषण से निम्न महत्वपूर्ण तथ्य प्राप्त हुये-
ऽ प्रदर्शित ग्रामीणों में 90 प्रतिशत ग्रामीणों के घर में शौचलाय निर्मित है जबकि 10 प्रतिशत ग्रामीणों के घर पर नहीं। चयनित प्रतिदर्शित व्यक्तिक ग्राम पंचायत देवरा में सर्वाधिक 95 प्रतिशत खटखरी-90 प्रतिशत तथा धरमपुरा में 75 प्रतिशत ग्रामीणों के घर घरेलू शौचालय है। इसी कारण देवरा ग्राम पंचायत को निर्मल ग्राम घोषित किया गया है।
ऽ 75 प्रतिशत प्रतिदर्शित ग्रामीण घरेलू शौचालय का उपयोग प्रतिदिन करते हैं जबकि 15 प्रतिशत कभी-कभी तथा 10 प्रतिशत ग्रामीणों ने घरेलू शौचालय का उपयोग कभी नहीं किया। शौचालय उपयोग न करने वालों में सर्वाधिक 40 वर्ष से अधिक आयु वर्ग के है जिसका प्रमुख कारण जन्म से खुले मैदान में शौचालय जाना बताया गया। शौचालय उपयोग करने वालों मे सर्वाधिक देवरा ग्राम पंचायत के प्रतिदर्शित ग्रामीण है जिसका प्रमुख कारण जागरुकता है।
ऽ घरेलू शौचालय निर्माण के प्रेरक कारक के संबंध में सर्वाधिक 62 प्रतिशत प्रतिदर्शित ग्रामीणों ने सी.डी. या पिक्चर से प्रेरित हुये और सबसे कम 13 प्रतिशत ग्रामीणों ने कला जत्था से प्रेरित होकर शौचालय निर्माण करवाया। लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी विभाग द्वारा उपर्युक्त प्रेरक कारकों का उपयोग ग्रामीणों को प्रेरित करने हेतु समय समय पर किया जाता है।
ऽ अध्ययन के सर्वाधिक महत्वपूर्ण प्रश्न के प्रतिउŸार में 57 प्रतिशत प्रतिदर्शित ग्रामीणों ने शौचालय का आकार (जो 1 वर्ग मीटर निर्धारित है) छोटा होने के कारण ग्राम में अधिकाधिक लोगों ने घरेलू शौचालय का निर्माण नहीं कराना बताया, जबकि 28 प्रतिशत ग्रामीणों ने छत का ना होना (जो हितग्राही द्वारा स्वयं बनाने का प्रावधान है।) तथा 15 प्रतिशत ग्रामीणों ने घर गंदा होने के भय या दुर्गन्ध को घरेलू शौचालय निर्माण न कराने का प्रमुख कारण माना गया। उपर्युक्त तीनों कारकों में कुछ ग्रामीणों के दृष्टिकोण में परिवर्तन स्पष्ट परिलक्षित हुआ। जो शासन की इस महत्वाकांक्षी योजना की सार्थकता इंगित करता है।
ऽ 77 प्रतिशत प्रतिदर्शित ग्रामीण मानते है कि घर के बच्चों में घरेलू शौचालय उपयोग की प्रवृŸिा में वृद्धि हुयी है जबकि 14 प्रतिशत ग्रामीण, बच्चों के शौचालय उपयोग की प्रवृŸिा को यथावत मानते है। ग्रामीण परिवेश के नई पीढ़ी में यह परिवर्तन घरेलू शौचालय की उपयोगिता सिद्ध करता है।
निष्कर्ष:-
अनुसूचित जनजाति नेतृत्व पंचायतों में कम प्रतिस्पर्धा से आया है। उनकी ग्रामीण विकास एवं सामाजिक सुधार की बात उत्साहवर्धक मानी जा सकती है। संचार माध्यमों के प्रति उनकी जागरूकता, अशिक्षा एवं कमजोर सामाजिक आर्थिक स्थिति से जुड़ विषय है। महत्वाकांक्षा का अभाव भी इस सन्दर्भ में अन्तर्सम्बधी प्रतीत होता है। यदि अनुसूचित जन जाति के इन नेताओं/सरपंचों के उत्तरों को समग्र रूप में देखा जाए। ग्रामीण स्तर पर महिलाओं का एक ऐसा नेतृत्व उभर रहा है। जिससे इस आशा का संचार होता है कि अनुसूचित जन जाति अनुसूचित जनजाति नेतृत्व की पंचायतों में प्रथम औपचारिक भागीदारी आने वाले समय में ज्यादा सजग एवं जागरूक नेतृत्व देने में सक्षम होगी। मध्य प्रदेश की पंचायतों के लिये यह एक आशापूर्ण संकेत है।
सुझाव:-
ग्राम पंचायत बांरग एस.सी., एस.टी. नेतृत्व प्रकृति का अध्ययन करने पर उनके कार्य कुशल बनाने या जागरूक करने के लिए निम्न सुझाव है।
1. एस.सी./एस.टी. में व्यापक शिक्षा का प्रचार-प्रसार किया जाना चाहिए। जिससे वे अपने अधिकार के प्रति जागरूक हो सकें।
2. निर्वाचित प्रतिनिधियों का समय-समय पर उनके कार्य अधिकार के लिए ग्राम पंचायत स्तर पर प्रशिक्षण की व्यवस्था की जानी चाहिए।
3. ग्राम के समस्त एस.सी., एस.टी. के लोंगों को ग्राम सभा में आवश्यक रूप से भाग लेना चाहिए।
4. पंचायत राज्य अधिनियम में प्रतिनिधियों के लिये नियमित शैक्षणिक आहर्ता अनिवार्य की जानी चाहिए। जिससे दूसरे लोंग उनके अधिकारों का गलत उपयोग या फायदा न उठा सके।
5. एस.सी./एस.टी. जनप्रतिनिधियों का उनके प्रशिक्षण के लिये टूर प्रोग्राम रखा जाना चाहिए जिससे वो बढ़-चढ़ कर भाग ले सकें व नई जगह की जानकारी प्राप्त कर सकें।
सन्दर्भ ग्रन्थ सूची:-
1. सोनी, जसप्रीत कौर सोनी, ग्लोबलाइजेशन: ब्रिजिंग डिवाइड बिटवीन सिविल सोसाइटी एण्ड गुड गवर्नेंस, दी इण्डियन जनरल आॅफ पाॅलिटिकल साइंस दी इण्डियन पाॅलिटिकल साइंस एसोसिएशन, मेरठ, वाॅल्यूम-स्ग्टप्प्ए नं.-2, अपै्रल-जून, पृ.सं. 279-283, 2006
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Received on 02.06.2019 Modified on 14.06.2019
Accepted on 24.06.2019 © A&V Publications All right reserved
Int. J. Rev. and Res. Social Sci. 2019; 7(2): 502-510.