छत्तीसगढ़ आदिवासियों के आजीविका के साधन वर्तमान परिदृश्य में

 

डाॅ. किशोर कुमार अग्रवाल1, राजेशवरी2

1प्राध्यापक एवं विभागाध्यक्ष - इतिहास विभाग, डाॅ. खूबचंद बघेल शासकीय स्नातकोत्तर महा. विद्या़. भिलाई - 3 जिला - दुर्ग (..)

2पी-एच.डी. शोध छात्रा, पं. रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय रायपुर (. .) 

 

 

भारत के दुर्गम क्षेत्रों में आज भी ऐसे अनेक मानव समूह है जो हजारों वर्षों से विश्व की सभ्यता से दूर अपनी सामाजिक एवं सांस्कृतिक चेतना एवं पहचान को बनाए हुए उन अंचलों में निवास करते है, जो सामाजिक सभ्यता एवं समाज की मुख्य धारा से दूर है। इन्हे प्राचीन सामाजिक एवं आर्थिक जीवन का प्रतिनिधि भी कहा जा सकता है। इन मानव समूहों का आदिवासी एवं जनजाति जैसे नामों से संबोधित किया जाता है। आदिवासीयों ने अपनी अर्थव्यवस्था का विकास मुख्य धारा से दूर स्वतंत्र रूप से किया। बस्तर, भारत के छत्तीसगढ़ प्रदेश के दक्षिण दिशा में स्थित जिला है। बस्तर जिले एवं बस्तर संभाग का मुख्यालय जगदलपुर शहर है। इसका क्षेत्रफल 4023.98 वर्ग कि.मी. है। बस्तर जिले की जनसंख्या वर्ष 2011 में 14, 11, 644 है। वर्तमान समय में कोंड़ागांव जिले को सम्मिलित किया गया है। बस्तर की जनसंख्या में 70 प्रतिशत् जनजातीय समुदाय है। बस्तर जिले की अर्थव्यवस्था का प्रमुख आधार कृषि और वनोपज संग्रहण है। बस्तर में मुख्यरूप से धान, मक्का, गेहूँ, ज्वार, कोदों, कुटकी, चना, तुअर, उड़द, तिल, राम-तिल, सरसों का उत्पादन किया जाता है किंतु बस्तर क्षेत्र में सिंचाई का अभाव है। यहां कृषि के आलावा पशुपालन, कुक्कुट पालन, मत्स्य पालन भी सहायक भूमिका निभाते है। वनोपज संग्रहण यहाॅ के ग्रामीणों के जीवन उपार्जन के प्रमुख स्त्रोत में से एक है। वनोपज संग्रहण में कोसा (तसर), तेंदू पत्ता, महुआ, लाख, धूप, साल, बीज, इमली, अमचूर, कंद-मूल, हर्रा, औषधियां प्रमुख है। वन सम्पदा में बस्तर का क्षेत्र बहुत धनी है। उच्च श्रेणी के सागौन, साल, बाँस और मिश्रित प्रजाति के बहुमूल्य वन यहाॅ विद्यमान हैं। बस्तर के कोमलनार मंगनार क्षेत्र का गगन चुम्बी साल नेपाल के साल तुल्य है। साल सागौन के भांति बाँस के संदर्भ में भी यह क्षेत्र परिपूर्ण है। बाँस कागज बनाने के लिए आवश्यक है। इसके अतिरिक्त बाँस से बहुत से कुटीर उद्योग जैसे- टोकरी, चटाई, झाडू, टटिया, सुपेलिया, सुपा, पंखा, आदि बनाने में प्रयोग करते है। बाँस का उपयोग आदिवासी लोग ताड़ी उतारने में भी प्रयोग करते है। कृषि एवं वनोपज संग्रहण और इससे जुड़े हुए कुटीर उद्योग आदिवासीयों के जीविका के मुख्य साधन है। यहाॅ आज भी आधुनिकता का अभाव दिखाई पड़ता है। बस्तर के विकास के लिए सरकार द्वारा अनेक योजनाएं चलाई जा रही है किंतु वह पर्याप्त नही है। और अधिकांश बाहर से आये लोग इसका लाभ उठा रहे है। यहा के कुछ गिने चुने लोग ही लाभंावित होते है। सरकारी योजनाओं का लाभ उठाने में स्वयं को असमर्थ पाते है क्योंकि यहाॅ की अधिकांश जनसंख्या अशिक्षित, भोले-भाले, शांत, सरल जीवन व्यतीत करने वाले होते है। बस्तर में विकास के अनेक संभावनाए मौजूद है।

 

 

सयंत्र में ठेका श्रमिक, सयंत्र में श्रमिकों, के स्वास्थ्य की दृष्टि से श्रमिको की स्थिति, आर्थिक दृष्टि से श्रमिको की स्थिति, सुरक्षात्मक दृष्टि से श्रमिको की स्थिति श्रमिक संगठन, विगत वर्षो में होने वाली दुर्घटना, संयंत्र में कार्यरत श्रमिको की समस्यायें।

 

 

 

 

 

 

प्रस्तावना

बस्तर अपनी विशिष्टताओं के कारण चर्चित रहा है सधन वनों से आच्छादित यह विशाल क्षेत्र आदिवासी बहुल्य क्षेत्र है। बस्तर छत्तीसगढ़ का एक महत्वपूर्ण जिला हैै। बस्तर जिला राज्य में आय का प्रमुख स्त्रोत है। बस्तर की अर्थव्यवस्था का मुख्य साधन कृषि एवं वनोंपज संग्रहण है। छत्तीसगढ़ के अंतर्गत आने वाले जिले दुर्ग, रायपुर, राजनाँदगाँव, बिलासपुर, रायगढ़, सरगुजा, बस्तर जिला में धान विपुल मात्रा में उत्पादन के कारण इसे छत्तीसगढ़ कोधान का कटोराकहा गया है1 बस्तर में कृषि अधिकांश लोगों के जीविकोपार्जन का मुख्य साधन है फिर भी यह अत्यंत पिछड़ा हुआहै जिसका प्रमुख कारण जिले की कृषि व्यवस्था का पूर्णतः प्रकृति पर निर्भरता, परम्परागत कृषि तकनीक का प्रयोग, कृषि विकास के आधारभूत संसाधनों का अभाव, अशिक्षा, जोतों का आकार छोटा होना, भूमि का दोषपूर्ण बटवारा, पहाड़ी क्षेत्र, उचित सिंचाई सुविधा का अभाव, लोगों में आगे बढ़ने का अभाव, संतुष्टि प्रवित्ती, आदि हैं। बस्तर में कृषि व्यवस्था के विकास के लिए सरकार द्वारा अनेक योजनाए चलाए जा रहे है। किन्तु अब तक उनके आशातीत परिणाम प्राप्त नहीं हुए है तथा बस्तर जिले के कृषि व्यवस्था में अब भी विकास की संभावनाएं विधमान है2

 

बस्तर जिले में शुद्ध बोया गया क्षेत्रफल सन् 2014 में 1, 73, 295 हेक्टेयर था जो कि 2017 में 1, 69, 732 हेक्टेयर हो गया है।3 बस्तर में कृषि भूमि का मात्र 14 प्रतिशत् क्षेत्र ही सिंचित है। बस्तर में कृषि भगवान भरोसे ही होती है।

 

कृषि विभाग के अनुसार बस्तर जिले में कृषि 2003 से पहले 41 लघु सिंचाई योजनाए थी जिससे मात्र 11, 965 हेक्टेयर क्षेत्र में सिंचाई कार्य किया गया3 फिर भी बस्तर मेें कृषि की स्थिति अन्य जिलों के अपेक्षा बहुत दयनीय है। क्योंकि बस्तर के आदिवासी अशिक्षित और आधुनिकता से दूर रहने की कोशिश करते है। सरकार की योजनाओं का लाभ उठाने में असक्षम है। सरकार के द्वारा दी जाने वाली आर्थिक सहायता में उर्वरक, सिंचाई, खाद, बीज कृषि यंत्र एवं उपकरण, विद्युत, और फसल बीमा आदि है। लेकिन चिंता की बात यह है कि इन योजनाओं से कृषि क्षेत्र का विकास नहीं हो रहा है बल्कि इसका दुरपयोग अधिक हो रहा है। इन योजनाओं का लाभ बाहर से कर बसे हुए लोग इसका उठा रहे है। बस्तर के मूल निवासी अभी भी पिछड़े हुए है4 बस्तर जिले में कृषि शिक्षा का अभाव है और जो कृषि विश्वविद्यालय और महाविद्यालय है। वो नाम मात्र के है उनमें भी गुणवत्ता परख शिक्षा का अभाव है। और ये आदिवासीयों के पहुँच के बाहर है5 बस्तर के आदिवासी कृषक परिवार के सदस्य निजी कृषि भूमि पर खेती करने के अतिरिक्त सुनिश्चित एवं सुखमय जीवन यापन करने तथा जीवन स्तर में अपेक्षित सुधार करने के लिए पशुपालन, कुक्कुट पालन, मत्स्य पालन, लधु एवं कुटीर उद्योग, हस्तशिल्प आदि कार्यो में संलग्न होते है। इससे अपनी पारिवारिक आय में वृद्वि करने का प्रयास करते है।

 

वनोपज उत्पादन का सीधा संबध वनों से है। बस्तरके वन केवल भारत में बल्कि पूरे विश्व में प्रसिद्व है। वन बस्तर का सौंदर्य है। बस्तर का जीवन है। वस्तुतः वन बस्तर का प्राणतंत्र है। बस्तर के वनवासी अपने जन्म से मृत्यु तक इन वनों पर समर्पित रहते6 बस्तर में मैदानी भाग कम पहाडी और पथरीले भाग अधिक है जिले के लगभग 57 प्रतिशत भाग वनों से आच्छादित है। इन्ही वनों में यहाँ के आदिवासियों निवास करते है। अधिकंाश आदिवासी सूर्योदय से सूर्यास्त तक वनों से अपने आवश्यकताओ का साधन जुटाने में ही लगे रहते है7

 

दोना पत्तल का उपयोग सामाजिक आयोजनों, शादी आदि के अवसर पर उपयोग में लाया जाता है। लाख का सग्रह कर लाख की चूड़ियाॅ बनाई जाती है। मधुमक्खियों के छत्तों से शहद प्राप्त करने के उपरान्त मोंम का उपयोग मोमबत्ती बनाने के लिए किया जाता है। बस्तर की जनजातियों तथा अन्य लोगो में भी नशापन करने की परम्परा रही है। लांदा माड़िया गोड़ लोगो का पसंदीदा पेय पदार्थ है जो चाँवल और मड़िया को सड़ाकर बनाया जाता है महिलाएँ तथा बच्चें भी इसे शौक से पीते है लांदा कुछ हद तक भोजन की कमी को भी पूर्ति करता है8 लांदा के आलावा सल्फी, छिंद रस, ताड़ी, महुआ से शराब, भी बस्तर वासियों का प्रिय पेंय पदार्थ है। आदिवासियों के लिए सल्फी और महुआ के वृक्ष कल्पवृक्ष के समान है क्योंकि दोनों ही वृक्ष उनकी आर्थिक संरचनाओं को मजबूती प्रदान करते है। मान्यता यह भी है कि जिस व्य़िक्त के पास जितने ज्यादा सल्फी के वृक्ष है वह उतना ही आर्थिक दृष्टिकोण से समपन्न है। सल्फी के वृक्ष समपन्नता का प्रतीक हैं9

 

बस्तर जिला वन सम्पदा के दृष्टि से परिपूर्ण हैै। बस्तर जिले में विभिन्न प्रकार के वृक्ष पाये जाते है, जैसे सागौन, साल, साजा, धौरा, कर्रा, बीजा, आँवला, तेंदू, खेर, हलदू, कुसुम, चार, गोंद, धौरा, कर्रा, सरई, बीजा, अर्जून, महुआ, बबूल, आँवला, तेंदू, खैर, हल्दू, कुसुम, चार, कौहा आदि। इस जिले में उच्च श्रेणी के सागौन, साल, बीजा के वृक्ष है। साथ ही बाँस का प्रयोग कागज बनाने में किया जाता है। इसके अतिरिक्त बाँस का उपयोग ग्रामीण क्षेत्रों के कुटीर उद्योग टोकरी, चटाई, झाडू, टटिआ, सूपा सुपेलिया, पंखा, आदि उद्योग में किया जाता है जिसका पिछड़े आदिवासी ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार उपलब्ध कराने का अत्यंत महत्वपूर्ण साधन है10

 

निष्कर्ष:

उपरोक्त विवेचनाओं से स्पष्ट है कि बस्तर जिले में आदिवासीयों के आर्थिक विकास के लिए पर्याप्त संसाधन उपलब्ध है। आवश्यकता है उपयुक्त योजनाओं की जिनके द्वारा बस्तर में उपलब्ध विपुल संसाधनों एवं अवसरों का उचित उपयोग करते हुए विकास के उच्चतम लक्ष्यों को प्राप्त किया जा सके।बस्तर के चहुंमुखी विकास के लिए योजना तैयार करते समय बस्तर के आदिवासीयो और उनकी समस्याओं को केन्द्र बिंदु मानकर चलना चाहिए। और इन योजनाओं का सही क्रियान्वयन हो सके। योजनाओं का लाभ बस्तर के आदिवासी उठा सके।

 

संदर्भ सूची:

1.  गुप्त, मदनलाल, छत्तीसगढ़ दिग्दर्शन, श्री प्रकाशन कसारीड़ीह दुर्ग (. ) प्रथम संस्करण 1996 पृष्ठ - 75

2.  शुक्ल, राजेश, पाण्डेय, ऋषिराज, छत्तीसगढ़ समाज एवं संस्कृति, शताक्षी प्रकाशन, प्रथम संस्करण 2007 पृष्ठ - 117-118

3.  छत्तीसगढ़ शासन, आर्थिक संचनालय, आर्थिक सर्वेक्षण, वर्ष 2017-18, पृष्ठ - 109

4.  शोध पत्रिका, छत्तीसगढ, विवेक, अंक - 58, पृष्ठ - 45

5.  कुरूक्षेत्र, दिसम्बर 2011 पृष्ठ - 56

6.  नायडू, पी. आर, भारत के आदिवासी की समस्याए, पृष्ठ - 426

7.  ठाकुर, केदार नाथ, बस्तर - भूषण (बस्तर राज्य का वर्णन) नक्कार प्रकाशन कांकेर 2005, पृष्ठ - 18

8.  झा, के, के, काकतीय युगीन बस्तर, पृष्ठ -253

9.  सहसी, वासुदेव, बस्तर का सामाजिक आर्थिक इतिहास: एक ऐतिहासिक अनुशीलन, अप्रकाशित शोध प्रबंध, पृष्ठ - 14

10. शुक्ला, शांता, छत्तीसगढ़ का सामाजिक आर्थिक इतिहास, नेशनल पब्लिशिंग हाउस, नई दिल्ली पृष्ठ - 116

 

 

 

Received on 10.04.2019            Modified on 05.05.2019

Accepted on 27.05.2019      © A&V Publications All right reserved

Int. J. Rev. and Res. Social Sci. 2019; 7(2):544-546.