नोटबंदी के सामाजिक-आर्थिक प्रभावों का मूल्यांकन
डाॅ. धर्मेन्द्र कुमार वर्मा
अतिथि विद्वान (समाजशास्त्र) शा. महाविद्यालय उमरियापान, कटनी (म.प्र.)
पुणे के इंजीनियर एवं (सी.ए.) चार्टर्ड अकाउंटेंट्स की संस्था अर्थ क्रांति संस्थान के सुझाव पर नोटबंदी का फैसला लिया गया। संस्थान ने प्रस्ताव को पेटेन्ट कराया है। मैकनिकल इंजीनियर अनिल वोलिक-प्रमुख थे। संस्था का दावा है कि यह प्रस्ताव कालाधन, मंहगाई, भ्रष्टाचार, बेरोजगारी, रिश्वतखोरी, आतंकियों को फंडिग रोकने में पूरी तरह से कारगर होगा। प्रापर्टी, जमीन, ज्वेलरी और घर खरीदने में ब्लैकमनी के उपयोग में लगाम लगेगी। जाली नोटो के लेने-देन पर रोक लगेगी। नौकरी पेशा लोगों के हाथों में ज्यादा पैसा आयेगा। परिवारों का परिचेजिंग पावर बढ़ेगा। तदानुसार वर्ष नवंबर, 2016 में भारत के मौद्रिक इतिहास में अभूतपूर्व घटना घटित हुई थी जबकि भारतीय रिजर्व बैंक ने सरकारी घोषणा के अनुरूप बड़े नोटों का चलन बंद कर दिया था। तात्कालिक प्रभाव यह पड़ा था कि लगभग 86 प्रतिशत वैधानिक मुद्रा चलन से बाहर हो गई थी तथा नकदी का संकट पैदा हुआ। देश की जनता को पुरानी मुद्रा को नई मुद्रा में बदलने की छूट सीमित आधार पर दी गई तथा नई मुद्रा की आपूर्ति में समय विलंबता के कारण नकदी का संकट गहराया। नोट बंदी के बाद से भारतीय रिजर्व बैंक ने 500 व 2000 रुपये की लगभग 14 लाख करोड़ रुपये की नई मुद्रा जारी की है लेकिन अधिकृत रूप से आरबीआई यह घोषित करने में समर्थ नहीं रहा है कि बैंकों ने देश की जनता से कितनी पुरानी मुद्रा जमा की।
नोटबंदी, कालाधन, आर्थिक स्थिति, मुद्रा।
प्रस्तावना
जब 8 नवम्बर 2016 को प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने 8ः15 बजे नोटबंदी की घोषणा की तो सारे भारत में भूकंप सा आ गया। कुछ लोगों को लगा कि प्रधानमंत्री भारत व पाकिस्तान के कड़वे होते रिश्ते के बारे में बोलेंगे या शायद दोनों देशों के बीच में युद्ध का ऐलान ही ना कर दें। लेकिन यह घोषणा तो कुछ लोगों के लिए युद्ध के ऐलान से भी घातक सिद्ध हुई। उनकी रातों की नींद उड़ गई। कुछ लोग होशोहवास खोते हुए जेवेलर्स के पास दौड़े व् उलटे-सीधे दामों में सोना खरीदने लगे।
अगले दिन से ही बैंक व एटीएम लोगों के स्थाई पते बन गए। लाइनें दिनों दिन भारत की बढ़ती हुई जनसंख्या को दिखानें लगीं। सरकार भी कभी लोगों को राहत देने के लिए व कभी काला धन जमा करने वालों के लिए नए नए कानून बनाती दिखी। कभी बैंक व एटीएम से पैसे निकलवाने की सीमा घटाना व बढ़ाना व कभी पुराने रुपयों को जमा करवानें के बारे में नियम में सख्ती करना या ढील देना।
विपक्षी दल पूरी एकजुटका से सरकार के निर्णय को असफल व देश को पीछे ले जाने वाला सिद्ध करने में लग गए। उन्हें देख कर ऐसा लग रहा था मानों किसी ने उनकी दुखती रग पर हाथ रख दिया हो। लगभग पूरा विपक्ष सरकार के इस अन्याय के खिलाफ खड़ा हो गया। मोर्चे, प्रदर्शन, रोष प्रकट किये गए। अनेकता में एकता का भाव सार्थक हुआ।
दूसरी तरफ सरकार अपने इस निर्णय को सही साबित करने में लगी रही। कभी प्रधानमंत्री व उनकी टीम लोगों को इस नोटबंदी के फायदे गिनाने में लगे रहे व कभी पचास दिन का समय मांगते नजर आये। लोगों के अंदर भी बहुत भाईचारा देखने को मिला। अमीर दोस्तों को उनके गरीब नाकारा दोस्त याद आये। अमीर रिश्तेदारों को अपने गरीब रिश्तेदारों के महत्व का एहसास होने लगा। अमीर बेटे की गरीब माँ का बैंक अकॉउंट जो की पिता की मौत के बाद मर चुका था अचानक जिन्दा हो गया। ऐसा लगा मानों पूरी मानवता जिन्दा हो गई।
मीडिया वालों का भी बहुत शानदार रोल रहा। कुछ नोटबंदी पर सरकार के फैसलें के पक्ष में खड़े दिखाई दिए व कुछ विपक्ष में। कुछ न्यूज चैनल्स को लोग लाइनों में मजे लेते दिखाई दिए दूसरी तरफ कुछ को मरते। कुछ चैनल्स के अनुसार लगभग सौ लोगों ने लाइनों में खड़े होकर अपनी जान गवाई।
नोटबंदी की वजह से पुराने जमानें में सफल बार्टर पद्धति फिर से कारगर सिद्ध हुई। लोगों ने बिना पैसे के भी दिन गुजारने सीख लिए। सच कहूं हमें तो कोई समस्या का सामना नहीं करना पड़ा। बस थोड़ा समायोजन करना पड़ा। देश के लिए थोड़ी बहुत तकलीफ जरूरी भी है।
नए नए तरीकों का इजाद -
यहाँ कुछ लोगों की बुद्धिमत्ता देखने को मिली। उन्होंने अपने काले धन छिपाने के लिए नए नए तरीके अपनाये जैसे गरीब दोस्तों व् रिश्तेदारों के बैंक एकाउंट्स में पैसे डालना। मजदूरों को तीन सौ-चार सौ रुपयों में हायर करना। 20 से 30 प्रतिशत के लालच पर पुराने नोटों के बदले नए नोट प्राप्त करना। कुछ बैंक व डाक कर्मचारियों की अवैध सेवाएं लेना इत्यादि इत्यादि। सरकार का दावा है कि लगभग चार सौ से साढ़े चार सौ करोड़ रूपये का काला धन बैंक में अपनी जगह बनानें में कामयाब रहा। अब सरकार व् इनकम टैक्स वालों की ऐसे बैंक एकाउंट्स पर पूरी नजर है।
प्रधानमंत्री ने काले धन के खिलाफ नोटबंदी की घोषणा कर सामान्तर आर्थिक व्यवस्था की ध्वस्त करने के लिए सबसे बड़ा दाव खेला। नोटबंदी ऐसा कदम है, जिसमें समूचा भारत व्यापक स्तर पर प्रभावित हुआ है, क्या गरीब, क्या अमीर, क्या छोटा, क्या बड़ा, क्या बुजुर्ग, महिलाएं हर व्यक्ति को नोटबंदी के फैसले ने गहरे तक प्रभावित किया है।
ये हुआ ऐलान
ऽ 8 नवम्बर 2016 की मध्यरात्रि 12 बजे से 500 और 1000 के नोट बंद।
ऽ 9-10 नवम्बर 2016 को देश के सभी बैंक बंद 24 नवम्बर 2016 तक अस्पताल मेडिकल स्टोर, रेल्वें स्टेशन, एयर पोर्ट और बस स्टैण्ड पर नोट चलेगी साथ ही बिजली, पानी, राजस्व जमा में भी स्वीकार किये गये।
ऽ 30 दिसम्बर 2016 तक 500 और 1000 के नोट बैंक और पोस्टआफिस में बदले जा सकते है।
ऽ एक दिन में सिर्फ 10 हजार तक नोट बदले जा सकते हैं। लगातार जमा और बदलने के नियमों में फेर बदल हर दूसरे दिन जारी हुआ 31 मार्च 2017 तक रिजर्व बैंक में पुराने बड़े नोट बदले जा सकते है।
ऽ 10 नवम्बर 2016 से बाजार में 500 एवं 2000 के नये नोट आयेंगे और आर.बी.आई. के अनुसार आजादी के बाद 09.11.2016 शायद पहला दिन जब किसी रिश्वतखोर ने रिश्वत न ली हो...... चोर ने चोरी न की हो...... किसी बहू के दहेज लोभियों के माग पर आत्महत्या के लिये मजबूर न होना पड़ा है ..... अपहरणकर्ताओं ने फिरौती और हत्यारों में सुपारी न मांगी हो .......... पत्थर वाजों ने पत्थर ने फेके हो और आंतकवादियों ने गोली चलाने से मना कर दिया हो।
4ळ लेवल का सिम लेने-माह भर में एक किलों लगने वाला नमक खत्म होने की अफवाह में बाद देर रात्रि और सुबह और सुबह 3 बजे से लाइन में खड़े रहकर ऐसा व्यवहार किये मानों ए.टी.एम. या बैंक के सामने नये नोट लेने या पुराने अमान्य नोट जमा करने के लिए नहीं वरन सीमा पर खड़े हो और सामने से नोट नहीं दुश्मन की गोलियां दागी जा रही है। अव्यवस्था में नित नये नियमों मंे बदलाव लाया गया आर.बी.आई. और केन्द्र सरकार दोनों को मिलाकर 74 से ज्यादा (53$21) किया गया। 9 से 13 तक नोटबंदी के चलते बैंक/ए.टी.एम.त्र पूर्ण रूप से बंद रखे गये। 14 नवम्बर से 24 नवम्बर तक सेवाओं में लिये जानेकी सीमा तय कर दी गई। सप्ताह में रूपया निकासी की लिमिट (सीमा) तय रख दी गयी।
कानूनी रूप में किसी मुद्रा इकाई की स्थिति/मूल्य को अमान्य कर देना ही विमुद्रीकरण है। मोटे तौर पर यह राष्ट्रीय मुद्रा में एक प्रकार का परिवर्तन है। जब भ्रष्टाचार बढ़ जाता है और लोग नोटों को बैकों से दूर जमाखोरी करते है तो क्मउवदमजप्रंजपवद आवश्यक हो जाता है। इससे मुद्रा के पुराने इकाई को सेवानिवृत्त कर एक नई मुद्रा इकाई के साथ प्रतिस्थापित किया जाता है जो पुनः बैंकिगप्रक्रियामंे शामिल होकर सरकार को टैक्स (कर) के रूप में सहायक होती है। इस तरह यह देश की अर्थव्यवस्था में एक प्राणवायु फूँकने का काम करती है।
अब पुराने 500 और 1000 के चलन वाले नोट अब इतिहास हो गये है। पूरा देश पुराने नोटों का महात्मा गाॅधी न्यू सिरीज आफ नोट्स 2016 से बदलने के लिए कतार में लगा है। 1000 का इतिहास 1954 में पहली बार जारी हुआ था जिसे जनवरी 1978 में बन्द कर दिया गया। 2000 में दूसरी बार 1000 रूपये का नोट जारी हुआ था। 500 रूपये के नोट का इतिहास पहली बार अक्टूबर 1987 में जारी हुआ 2005 में सुरक्षा की दृष्ट से मशीन द्वारा पढ़े जाने वाले सुरक्षा धागे इलेक्ट्रो टापइ बाटर मार्क नोट जारी होने का साल आदि के साथ सुरक्षा प्रबंधों व आकार के छापा गया है। बजार की कुल नगदी में 1000-500 के नोट की हिस्सेदारी 84 फीसदी 1000 के नौट की हिस्सेदारी 39 फीसदी और 500 के नोट की हिस्सेदारी 45 फीसदी है। सन् 1900 में 100 नोट आया। सन् 1905 में 50 रूपये का सन् 1907 में 5 रूपये और सन् 1909 में 1000 रूपये का नोट जारी हुआ जोकि पूरे भारत में 8 नवम्बर की रात 500 और 2000 के नोट का चलन सरकार की तरफ से बन्द कर दिया गया।
उद्देश्य -
ऽ नशे के कारोबार तथा तस्करी अवैध लेन-देन को ध्वस्त करना।
ऽ आतंकवाद और उग्रवाद की गतिविधियों के लिए अवैध लेन-देन को ध्वस्त करना।
ऽ बैंकिंग सुविधा से वंचित या कम बैंकिंग सुविधाओं वाले भारतीय को वित्तीय सेवाओं के दायरे में लाना।
ऽ किसान का नगदी की कमी के कारण रबी फसल कि बुआई में हुई कठिनाई से बाहर निकलना।
नोटबंदी के बाद नगदी की कमी वजह से खपत के मोर्चे पर जो अस्थाई झटका लगा है। उसके मद्येनजर वृद्धि दर के अनुमान को कम कराना।
नोटबंदी के फायदे -
ऽ काले धन की समाप्ती
ऽ गरीबों को लाभ-चेक से वेतन का भुगतान/आतंकवाद समाप्त होगा।
ऽ नकली नोट का चलन बंद होगा।
ऽ मंहगाई कम होगी।
ऽ प्लास्टिक मनी का चलन होगा।
ऽ हवाला करोबार बद होगा।
ऽ रिश्वतखोरी/घूसखोरी में कमी या फिर पूरी तरह से बन्द होगा।
ऽ जमीनों के भाव (कीमतों में कमी) होगी।
ऽ शिक्षा सस्ती होगी। क्वदंजपवद कम होगा। सोने के दामों में कमी आयेगी।
ऽ समाज में स्थायित्व आयेगा।
ऽ लोगों में समानता व एकता का भाव आयेगा।
ऽ काला धन का उपयोग न कर पायेगें।
ऽ देश का तरक्की विकास होगा।
ऽ व्याज दरों की कमी लोगों के बीच बैंकों द्वारा कम ब्याज पर लोन उपलब्ध रहेगी।
ऽ राजनीति और चुनाव प्रक्रिया बनेगी पारदर्शी।
नुकसान
ऽ छोटे व्यापारी जिनका व्यवसाय नगद कैश पर चलता है। सबसे ज्यादा प्रभावित होंगे।
ऽ दूध वाला
ऽ किराना व्यापारी
ऽ लेखन-समग्री
ऽ मिठाई-वाला
ऽ अखबार वाले
ऽ दैनिक मजदूरी करने वाले श्रमिक
ऽ बूट पालिस करने वाले श्रमिक
ऽ सब्जी वाले इत्यादि नोट बंदी से सबसेअधिक प्रभावित हुए और आगे भी होते रहेंगे।
1921 से 1927 के बीच जब मुसोलिनों ने इटली की करंसी लीरा को बन्द करके अपना प्रभाव जमाने का प्रयास किया इसका दुष्परिणाम ये हुआ कि बांकी देशों ने इटली की करंसी पर विश्वास करना बन्द कर दिया। कुछ ही वर्षो में इटली आर्थिक रूप से कंगाल हो गया। जर्मनी में हिटलर ने करंसी बन्द की तों एक वेलियन मार्क से भी दिन भर की रोटी नहीं खरीद पा रहे थे। हिटलर ने ये स्टालिन को नीचा दिखाने के लिए किया, लेकिन इसका गम्भीर परिणाम निकला ये तकब तक जारी रहा जब तक 1933 में नेशनल शोसलिस्ट सत्ता में नहीं आ गये।
1991 में राष्ट्रपति मिखाइल गोर्बाचोव ने काले धन पर काबू पाने के लिए 50 और 100 रूबल को बन्द कर जो कुल करंेसी का एक तिहाई हिस्सा हुआ करते है। 500 और 1000 के नोटो को चलन से बाहर करने का निर्णय लिया किन्तु यह नहीं सोचा कि साइड इफैक्ट कितने भयानक हो सकते हे। नोटबंन्दी ने ना आम जनता का जीना मुहाल कर दिया बल्कि व्यापार एवं दूसरे धंधें पर भी बुरा प्रभाव डाला है।
नोट बंदी के व्यापक प्रभाव हुए है जिनका समय-समय पर आंकलन करना अति आवश्यक है। नोट बंदी का मुख्य उद्देश्य कालेधन की अर्थ व्यवस्था पर करारी चोट मारना था तथा देश में कर आधार व जीडीपी कर अनुपात में वृद्धि करना था। देश की ऐसी जनता को कर के दायरे में लाना था जो कि आय तो अर्जित करती है लेकिन छुपाती है तथा कर के दायरे से बाहर रहती है। 5 अगस्त, 2017 तक भारतीय कर विभाग का मानना है कि गत वर्ष की तुलना में 25 प्रतिशत कर विवरणिका अधिक जमा हुई है। जो कि कर आधार को विस्तृत करने का प्रबल आधार है तथा आय कर से राजस्व में भी तेजी से वृद्धि करेगी। गत वर्ष में कुल 2.27 करोड़ टैक्स रिटर्न जमा हुई थी जो कि बढ़कर 2.79 करोड़ हो गई। वृद्धि दर 10 प्रतिशत से बढ़कर 25 प्रतिशत हो गई। नोटबंदी ने ऐसे करदाताओं को टैक्स रिटर्न भरने के लिए बाध्य कर दिया जिन्होंने अपने व अन्य के खाते में जितने नोट जमा करवाए, उतनी आय या तो दर्शायी नहीं या कम दर्शाई। भारतीय आय कर विभाग में लगभग 18 लाख ऐसे मामले सर्च किए हैं जिन्होंने 2 लाख से अधिक की नकदी जमा करवाई। लगभग आधे करधारकों ने नोटिस का जवाब नहीं दिया है तथा यह मानना है कि लगभग एक लाख व्यक्ति संदेह के घेरे में है जिन्होंने लगभग 1.72 लाख करोड़ रुपये से अधिक की नकदी जमा करवाई है। नोट बंदी का सकारात्मक प्रभाव यह भी पड़ा है कि निवेश परम्परागत जगह के स्थान पर वित्तीय उत्पादों की तरफ प्रवृत्त हुआ है। परम्परागत रूप से निवेश रियल एस्टेट, जेम्स एवं ज्वैलरी, सोना-चांदी आदि धातुओं में किया जाता है लेकिन म्युचअल फण्ड में निवेश में व्यापक वृद्धि हुई है। वर्ष 2015-16 में म्युचअल फण्ड में निवेश 1.34 लाख करोड़ हुआ है जो कि वर्ष 2016-17 में बढ़कर 3.43 लाख करोड़ हो गया है। मात्र तीन महीनों में अप्रैल से जून, 2017 में लगभग 93 हजार करोड़ रुपये की वृद्धि हुई है। रियल एस्टेट, जमीन जायदाद, सोना-चांदी, जेम्स एवं ज्वैलरी में कालेधन का उपयोग अधिक किया जाता है। नकदी के माध्यम से लेन-देन अधिक किए जाते हैं जो कि कर के दायरे में नहीं आते थे लेकिन वित्तीय उत्पादों जैसे म्युचुअल फण्ड, जीवन बीमा पॉलिसी, अंश बाजार, बैंक एफडी, ऋण पत्रों में निवेश से समस्त लेन-देन बैंक खातों के माध्यम से होगा तथा कालेधन पर रोक लगेगी। आय स्रोत बताना होगा तो कर राजस्व में वृद्धि होगी।
आॅपरेशन क्लीन मनी पर कार्य करना होगा तथा यह संदेश जनता को देना होगा कि यदि उनकी आय है, तो कर तो देना ही होगा चाहे वह कितना ही बड़ा व प्रभावशाली व्यक्ति, उद्योगपति, व्यापारी क्यों न हो। लगभग 322 शैल कम्पनियों के अंशों के लेन-देन पर सेबी ने रोक लगा दी है। यह वे कम्पनियां हैं जो कि कृत्रिम कम्पनियां हैं जो कि कागज पर कार्य कर रही है तथा भौतिक अस्तित्व नहीं है। जो यह कार्य करते हैं उन पर यह करारी चोट है। मोदी सरकार ने नोट बंदी के अलावा बेनामी लेन-देन व दिवालिया कानून बनाया है जिसका क्रियान्वयन यदि प्रभावी तरीके से होगा तो कालेधन के सृजन एवं परिमाण पर प्रभावी अंकुश लगेगा।
लेकिन आरबीआई द्वारा भारत सरकार को देय लाभांश में व्यापक कमी आई है। वर्ष 2016 में यह लाभांश लगभग 65 हजार करोड़ रुपये था जो कि वर्ष, 2017 में घटकर लगभग 30 हजार करोड़ हो गया है। इसका कारण यह रहा है कि नोट बंदी के कारण बैंकों के पास अतिरिक्त जमा में तेजी से वृद्धि हुई है जिस पर जमा धारकों को ब्याज देना पड़ रहा है लेकिन बैंकों ने यह पैसा भारतीय रिजर्व बैंक में जमा करवा दिया। जिस पर आरबीआई को ब्याज देना पड़ रहा है। इसके अतिरिक्त नई मुद्रा के प्रकाशन व निर्गमन की लागत लगभग 13 हजार करोड़ आई है जो कि चार गुना अधिक है। नोटबंदी का निर्णय तभी सफल माना जाएगा जबकि इसके उद्देश्य प्राप्त किए जाए तथा बड़ी मुद्दा के लेन-देन पर नजर रखी जाए। देश की आम जन पर कर का बोझ घटे तो नोट बंदी सफल मानी जाएगी लेकिन प्रभावों पर कड़ी नजर रखना आवश्यक है।
आज देश के चंद 7 उद्योगपतियों को छोड कर शेष बडे-बडे औद्योगिक घराने भी मोदी के फैसले की निंदा कर रहे है। क्योकि मिलों में काम करने वाली लेबर यानि सबसे गरीब तबके फैसले की मार सबसे अधिक पडी हे जहां उद्योगों निर्यातकों को अपने सप्लाई आर्डर कैंसल कर भारी घाटा उठाने के लिए मजबूर होना पड रहा है। वही दिल्ली से यूपी या बिहार जाने वाली ट्रेनों की भीड यह बात चीख-चीख कर कह रही है कि लोग कई सालों तो कई महीनों कडी मेहनत कर कमाए गये पैसो के कागज बन जाने के कारण शहर छोड कारण शहर छोड खाली हाथ गांवों को लौटने को मजबूर है। आलम यह है कि ठेकेदारों दुकानदारों व छोटे उद्योगपतियों ने अपने कर्मचारियों व मजदूरों का भुगतान करने से मना कर दिया है। नजीजतन उन्हे भूखें रहने की नौबत आ गई है। जिन लोगों के खाते में पैसे भी है वे सहजता से उसे निकाल पा रहे है। मोदी जी के निर्णय से अपने ही कमाये पैसों से गरीब तबके का जैसे भरोसा सा उठ गया है। नोट बंदी का यह दौर हमें कहा ले जायेगा यह कोई नहीं जानता।
लगता है मोदी जी ने इने तमाम पहलुओं को पूरी तरह अनदेखा किया या फिर मोदी एनपीए का बोझ झेल रहे बैकों व दिवालिया होने की कगार पर पहुंच चुके व दिवालिया हो चुके अपने दोस्तों को बचाने के चक्कर में इतने दबाव में आ गये कि उन्होेने अपने एक निर्णय के निलए पूरे देश को ही दांव पर लगा दिया। 100 से अधिक लोग अब तक काल के गाल में समा चुके है। क्या यह उदाहरण कम है मोदी जी को ये बताने के लिए कि ऐसे फैसलों से सिर्फ आर्थिक असंतुलन बढता है। हासिल कुछ नहीं होता। हमारे देश में नोट बंदी के बाद जनार्दन रेड्डी के घर में हुई 500 करोड की एक शादी हो या सरकार के मंत्री के पास पकडी गई नए नोटों की भारी खेप। देश में भारी आर्थिक असंतुलन के एक बडे खेल की ओर इशारा कर रही है। लगता है कि चंद उद्योगपतियों ने सत्ता के साथ मिल कर देश को तबाह करने का एक भयानक खेल खेला है। 500 और 1000 के चलन में नोटबंदी के चलते आम लोगों की भारी परेशानी को मद्देनजर सरकार ने पुराने नोटों को जरूरी सेवाओं के लिए इस्तेमाल किए जाने की सीमा 14 नवम्बर से बढाकर 24 नवम्बर की मध्य रात्रि तक कर दी है। बैकों को कम से कम 50 हजार रूपये तक कैश लिमिट बढाने की सलाह दी, वहीं 14 नवम्बर से एटीएम से एक बार धन निकासी की सीमा 2000 से बढाकर 2500 की गई है। कैश एक्सचेंज की लिमिट को 4000 से बढाकर 4500 कर दी गई है। बेक से साप्ताहिक धन निकासी की सीमा मंत्रालय के विश्लेषण के मुताबिक पहले चार दिनों (नवम्बर 10 से नवम्बर 13 शाम 5 बजे तक) बैंक सिस्टम में 3 लाख करोड रूपये के 500 और 1000 के नोट्स जमा किये गये है।
निष्कर्ष:-
इस नोटबंदी की वजह से जैसे की कुछ अर्थशास्त्रियों और राष्ट्रीय व् अंतर्राष्ट्रीय अर्थ सम्बंधित संगठनों ने दावा भी किया है कि भारत की आर्थिक वृद्धि दर कुछ समय के लिए प्रभावित हो सकती है लेकिन इसके दूरगामी सकारात्मक परिणाम निकलेंगे। कुछ और जानकारों के अनुसार नोटबंदी की वजह से नकली नोट छापने का कारोबार खत्म हो गया जिसकी वजह से देश में से बहुत मात्रा में नकली नोट व् उनसे सम्बंधित अवैध कारोबार भी खत्म हो गए।
संदर्भः-
1. डाॅ. गंगवाल सुभाष, भारत में नोटबंदी के प्रभाव, दैनिक नवज्योतिडाॅट इन 21.08.2017
2. नोटबंदी समीक्षा, समाचार पत्र, दैनिक भास्कर, स्टार समाचार, पत्रिका और दैनिक जागरण
3. जोशी नवीन-(09 नवम्बर 2016 पेज 9) रंहंतंदण्बवउण् नोटबंदी के नफा नुकसान
4. सिंह जावाहरलालः नोटबंदी की सफलता पर मोदी।
5. दिसंबर 04.2016 रंलअपरंलण्बवउण् 14/11/21016
6. हिन्दुस्तानी सुरेन्द्र (नवम्बर 27.2016) भ्रष्टाचार को बढावा देगा भारत बंद।
7. ूूूण्चंजतपांण्बवउण्ध्छवजम.वद.उवनजपदह.जीम ेजमचण्वइण्जीम बंचवजपअम हतवूजी पदकपंण्
Received on 02.06.2019 Modified on 13.06.2019
Accepted on 22.06.2019 © A&V Publications All right reserved
Int. J. Rev. and Res. Social Sci. 2019; 7(2): 565-570.