आत्मनिर्भर भारत के लिए आत्मनिर्भर बिहार
प्रो. (डॉ.) संजय कुमार
सहायक प्राध्यापक राजनीति विज्ञान विभाग, कार्तिक उरांव महाविद्यालय, गुमला
रांची विश्वविद्यालय, रांची) झारखंड
*Corresponding Author E-mail: sanjaysingh.shine@gmail.com
ABSTRACT:
सन 2020 विपदा का साल साबित हुआ। पूरी दुनिया ने कोविड-19 नामक महामारी का सामना किया। इस महामारी ने ना सिर्फ लाखों लोगों की जाने ले ली बल्कि दुनिया की अर्थव्यवस्था का भी भट्ठा बैठा दिया। अन्य देशों की भांति भारत भी इस महामारी से अछूता नहीं रहा। भारत सरकार तथा प्रांतीय सरकारों ने मिलजुल कर इस महामारी से निपटने के लिए अनेक उपाय किए। कुछ उपाय लोगों के प्राण बचाने के लिए किए गए और कुछ उपाय लोगों को अपना सामान्य जीवन जीने में मदद के रूप में किए गए। इस संकट ने कई कमजोरियों को भी उजागर कर दिया जिसमें देश की स्वास्थ्य सेवा का कमजोर ढांचा भी शामिल है। लेकिन कोविड-19 महामारी ने भारत में जो सबसे बड़ी कमजोरी उजागर की वह था उत्तर प्रदेश एवं बिहार जैसे राज्यों में स्थानीय उद्योग धंधों एवं रोजगार ओं की कमी जिसके कारण इन प्रदेशों के श्रमिकों को सबसे ज्यादा संकट झेलना पड़ा। प्रस्तुत आलेख कोविड-19 संकट काल के दौरान भारत के प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी द्वारा इस विपदा काल को देश के लिए एक अवसर के रूप में तब्दील करने के अवसर के रूप में लेने का आह्वान और इसके अनुरूप कई प्रकार के विभिन्न योजनाओं की शुरुआत करने तथा किस प्रकार बिहार जैसा राज्य इन योजनाओं के संदर्भ में अपनी किस्मत बदल सकता है, के ऊपर केंद्रित है।
KEYWORDS: कोविड-19, अर्थव्यवस्था, लोकल फॉर वोकल, रोजगार, कृषि विकास, खाद्य प्रसंस्करण, सॉफ्टवेयर निर्माण, सुशासन, कुशासन, उद्योग, प्रतिभा पलायन, सभ्यता एवं संस्कृति, विपणन, पर्यटन, पूंजी निवेश, सृजन, नियोजन, प्रशिक्षण, सत्ता परिवर्तन, रचनात्मक इत्यादि
प्रस्तावना
कोविड-19 वायरस के प्रसार से जनित महामारी कोरोना ने एक बार फिर से भारत के विभिन्न राज्यों में कमजोर अर्थव्यवस्था, गरीबी, रोजगार की कमी और प्रवासी मजदूरों से संबंधित समस्या को उधार दिया है। जो राज्य सबसे ज्यादा इस समस्या का सामना कर रहे हैं उसमें बिहार, झारखंड, उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल शामिल है। इसमें सबसे खराब स्थिति बिहार की है जिसके नेता निम्नलिखित दावे करते नहीं थकते-
१. बिहार देश का राजनीतिक रूप से सबसे जागरूक राज्य हैं। बिहार वासी उड़ती चिड़िया को हल्दी लगाना जानते हैं।
२. बिहार क्रांतियों की धरती एवं सामाजिक न्याय आंदोलन की प्रयोगशाला है।
३. बिहार के लोग धरती पर सबसे ज्यादा परिश्रमी एवं प्रतिभाशाली होते हैं।
४. चांद पर वैकेंसी होगी तो बिहारी वहां पहुंच जाएंगे और सबको पछाड़ कर उस रिक्ति पर अपना अधिकार जमा लेंगे।
५. देश आईएएस और आईपीएस के बिना नहीं चल पाएगा और देश के अधिकांश आईएएस और आईपीएस बिहार के ही लोग हैं।
६. बिहार के मजदूर ही सबसे ज्यादा परिश्रमी होते हैं।
७. बिहार के लोग नहीं होंगे तो दिल्ली और मुंबई जैसे महानगर थम जाएंगे।
८. बिहार ही देश की अर्थव्यवस्था का इंजन है।
९.एक बिहारी सौ पर भारी होता है।
१०.जो काम बिहार आज करता है कल उस काम का अनुसरण शेष भारत और फिर पूरी दुनिया करती है।
समस्या और कारणः
उपरोक्त वर्णित तथ्यों के विपरीत सच्चाई यह है की बिहार राजनीतिक रूप से सबसे जागरूक राज्य ना होकर पहचान की राजनीति में अपनी पहचान खो देने वाला राज्य है। आज की तिथि में सामाजिक न्याय का नारा लगाने वाले लोग ही सामाजिक अन्याय के सबसे बड़े कार्यकर्ता हैं। जहां तक बिहार के लोगों के प्रतिभाशाली होने की बात है तो क्या बिहार प्रदेश के लोग देश के अन्य लोगों से अलग हैं जो वो ज्यादा प्रतिभाशाली होंगे? क्या रेलवे में टीसी की नौकरी या एसएससी के क्लर्क की नौकरी में पताका लहराने वाले व्यक्ति भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संस्थान और परमाणु ऊर्जा आयोग में काम करने वाले व्यक्तियों से ज्यादा प्रतिभाशाली माने जा सकते हैं? जिस आईएएस, आईपीएस में बिहार की प्रतिभाओं का डंका बजने की बात की जाती है उसके कुल सदस्यों की संख्या दोनों सेवाओं को मिलाकर 10000 के करीब या उससे भी कम होगी। अगर सरकार द्वारा जारी आंकड़ों को देखें तो इसमें सबसे अधिक संख्या उत्तर प्रदेश के वासियों की होती है और जनसंख्या प्रतिशत के हिसाब से देखें तो केरल अन्य प्रदेशों के मुकाबले ज्यादा सफल नजर आता है।1 2020 के सत्र तक देश में लगभग 5000 भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी थे जिनमें बिहार की मिट्टी से जुड़े 450 के करीब अधिकारी है। इसके बावजूद बिहार के अर्धशिक्षित नेता और आमलोग दावा करते हैं कि सारा देश बिहार मूल के आईएएस से भरा पड़ा है।
जहां तक आईएएस, आईपीएस द्वारा देश चलाने की बात है तो निश्चित रूप से भारतीय प्रशासनिक सेवा के लोग देश में जिम्मेदार पदों पर बैठे हैं लेकिन यह इसलिए है क्योंकि अंग्रेजो की परंपरा को ढोते हुए इस सेवा के सामान्यज्ञ सदस्यों को विशेषज्ञों के ऊपर वरीयता देते हुए सचिवालय में मुख्य निर्णयकर्ता के पद दिए जाते हैं। प्रशासनिक सेवाओं के गौरव गीत गाने वाले क्या नहीं जानते की भारतीय रेल के बिना हमारे देश की अर्थव्यवस्था तीव्र प्रगति नहीं कर सकती परंतु वहां तो काम करने वाले सारे विशेषज्ञ होते हैं। इसी प्रकार आज दुनिया में भारत की अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी की चर्चा है, क्या वहां पर कोई आईएएस या आईपीएस होता है और इतने सारे आईएएस, आईपीएस का क्या फायदा जब उनका मूल प्रांत गरीबी में हो, वहां के निवासी दूसरे प्रदेशों में छोटे-मोटे रोजगार के लिए अपमानित होते हो, पीटे जाते हो? परिणाम में उत्तर प्रदेश बिहार से बहुत आगे रहता है और बिहार के मुकाबले चैथाई आबादी वाला केरल तो आनुपातिक रूप से इन सेवाओं में सिरमौर है लेकिन उनके लिए यह सेवाएं सिर्फ वहां के वासियों को मिली एक प्रतिष्ठित नौकरी भर है। जहां बिहार के कम पढ़े लिखे लोग खुद को यह कहकर सांत्वना देते हैं या कहें कि अपने मुंह मियां मिट्ठू बनते हैं एक बिहारी सौ पर भारी होता है, दूसरी ओर अन्य प्रांतों के लोग एक बिहारी सौ बीमारी कहकर उनका तिरस्कार करते हैं। चांद पर वैकेंसी होगी तो बिहार के लोग वहां पहुंच जाएंगे कहने वाले नेता बिहार में ही रोजगार को जन्म देने का प्रयास क्यों नहीं करते वह निर्जन, उजाड़, जलहीन, वायु-हीन चांद पर बिहार के गरीब मां के बेटे-बेटियों को क्यों भेज देना चाहते हैं, यह सवाल भी पूछा जाना चाहिए। लोग कहते हैं बिहार के मजदूर सबसे ज्यादा परिश्रमी होते हैं तो क्या दिल्ली का मजदूर, उत्तर प्रदेश का मजदूर, झारखंड का मजदूर, उड़ीसा का मजदूर, तमिलनाडु का मजदूर काम नहीं करता, क्या उसे कम काम करके ही बिहार के मजदूर से ज्यादा पैसा दे दिया जाता हैघ् सच्चाई यह है कि कहीं भी मजदूर, चाहे वह किसी प्रांत का क्यों ना हो अपने कठोर परिश्रम से ही दो पैसे अर्जित करता है लेकिन मजदूर को अपने घर के आस-पास अपने श्रम के बदले उचित मुआवजा मिले तो वह खुशी-खुशी काम भी करेगा, अपने परिवार को भी गरीबी के दलदल से निकालेगा और राष्ट्र की प्रगति में योगदान देगा। यह भी एक मिथक है कि बिहार के लोग नहीं होंगे तो मुंबई और दिल्ली ठप हो जाएगी। हम कह सकते हैं कि बिहार के मजदूर बड़ी संख्या में उपयोगी सेवाओं में लगे हुए हैं लेकिन अगर वह इन शहरों को छोड़ देते हैं तो दूसरे स्थान के मजदूर उनकी जगह भर देंगे। अगर और मजदूरों की कमी होगी तो आज की तारीख में ऐसी ऐसी मशीनें उपलब्ध है जो 1 दिन में सैकड़ों मजदूरों के बराबर का काम कर देती हैं। हम खेती में ऐसा देख चुके हैं। एक हार्वेस्टर 1 दिन में कई एकड़ खेत की फसल काट देता है जिसके लिए सैकड़ों मजदूरों की जरूरत होती है। आज चाहे नाले की सफाई करनी हो या बोझ उठाना, अधिकांश क्षेत्रों में मनुष्य का स्थान मशीनों ने ले लिया है और इस बात को समझने की आवश्यकता है कि हम मजदूरों को उस काम के लिए दक्ष बनाएं जो समय की मांग है ना कि उन्हें सिर पर मैला ढोने या, फावड़ा कुदाल चलाने तक सीमित रखें।
बिहार निश्चित रूप से देश की अर्थव्यवस्था में योगदान देता है लेकिन बिहार आज की तिथि में स्वयं विनिर्माण का केंद्र नहीं है, बिहार के लोग देश के औद्योगिक राज्यों के लिए एक बाजार मात्र बनकर रह गए हैं। अगर व्यापार में असंतुलन हो तो कोई बात नहीं लेकिन यह तो दिखाई पड़ना चाहिए कि बिहार भी अपने प्रोडक्ट को बड़े पैमाने पर दूसरे प्रांतों में और राष्ट्रों में भेज रहा है और धीरे-धीरे आयात और निर्यात के बीच के अंतर को कम कर रहा है लेकिन दुखद बात यह है कि ऐसा दूर-दूर तक दिखाई नहीं देता। यह बात भी एक मिथक ही है कि जो काम आज बिहार करता है वही पूरा देश आगे चलकर अपनाता है। सच बात तो यह है कि देश के अधिकांश प्रांत विकास की गति में बिहार से बहुत आगे निकल चुके हैं। बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की बहुचर्चित सात निश्चय योजना को ही लें।2 क्या आज की तिथि में महाराष्ट्र, गुजरात, तेलंगाना, केरल, पंजाब और हरियाणा जैसे विकसित राज्यों को ऐसी योजना बनाने की आवश्यकता है? हो सकता है कि 7 योजनाओं की शुरुआत बिहार ने पहले की लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि बाकी देश सोया हुआ हैा अन्य प्रांतों की भी अनेकों योजनाएं होती है जिसे बिहार समेत दूसरे अन्य प्रांत अपनाते हैं। एक और बात यह है कि हम भले ही एक योजना आज शुरू कर दें लेकिन उसे कितनी इमानदारी से धरातल तक उतारा है, उसका लोगों के जीवन-स्तर में सकारात्मक बदलाव लाने में कितना योगदान है, यह बात ज्यादा मायने रखती है। शायद बिहार के नेता इन चीजों के बारे में सोचना पसंद नहीं करते और सबसे दुखद बात यह है कि बिहार की घनघोर जातिवादी जनता चुनाव के वक्त अपना सारा दुख दर्द भूल जाती है और उसे एक ही बात याद रहती है. अपनी जाति के व्यक्ति को ही जिताना है भले ही वह चोर हो, डाकू हो, लुटेरा हो, हत्यारा, बलात्कारी हो, अब्बल दर्जे का भ्रष्ट व्यक्ति ही क्यों ना हो।
उपरोक्त वर्णित बड़बोले नेताओं के बयानों को दरकार कर दें तो वर्तमान में बिहार की स्थिति अच्छी नहीं कही जा सकती है। कांग्रेस के राज में मुख्यमंत्री हर डेढ़-दो वर्ष मे बदल जाते थे।उसके बाद लालू यादव के परिवार का 15 साल तक कुशासन चला। नीतीश कुमार ने भारतीय जनता पार्टी के साथ मिलकर शुरुआत में उम्मीदें जगाई लेकिन अपने दूसरे कार्यकाल से वह अपनी चमक खो बैठे और तीसरे कार्यकाल में पूरी तरीके से प्रभावहीन है। अब उनका इकलौता उद्देश्य किसी भी प्रकार से खुद को सत्ता में बनाए रखना प्रतीत होता है। अब तो भारतीय जनता पार्टी की कृपा से उन्हें चैथा कार्यकाल भी मिल गया है।
बिहार में अर्थव्यवस्था को गति देने और रोजगार बढाने के लिए सुगंठन-
बिहार निश्चित रूप से रोजगार उत्पन्न हो सकता है और वह भी उस पैमाने पर कि राज्य के सामान्य लोगों को दूसरे प्रांतों में ना जाना पड़े। इसके लिए वहां की सरकार को भारत सरकार के साथ मिलकर बहु-स्तरीय रणनीति बनानी होगी। 12 मई 2020 को भारतीय प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने देश की अर्थव्यवस्था में जान डालने के लिए 20 लाख करोड़ रुपए के पैकेज की घोषणा की जिसमें कृषि विकास लघु एवं मध्यम उद्योग से जुड़े क्षेत्र तथा आधारभूत संरचना के विकास पर जोर डालना शामिल है।3 प्रधानमंत्री के इस ऐलान के पश्चात देश की वित्त मंत्री श्रीमती निर्मला सीतारमण ने कृषि क्षेत्र में कई सुधारों की घोषणा की। सभी राज्यों के साथ-साथ बिहार के लिए भी अवसर है कि वह इन योजनाओं में अपने लिए अवसर ढूंढे और अपने राज्य की आर्थिक चुनौतियों का समाधान कर सके। मेरे विचार में बिहार में निम्नलिखित क्षेत्रों में रोजगार उत्पन्न किया जा सकता है-
१. कृषि २.कृषि आधारित उद्योग ३. डेयरी, पोल्ट्री फार्मिंग एवं मत्स्य उद्योगय ४. पर्यटन ५. नवीकरणीय ऊर्जा ६. वस्त्र य ७. इलेक्ट्रॉनिक्स८. सॉफ्टवेयर ९. हस्तशिल्प एवं खिलौना और १०. शिक्षा उद्योग विशेष रुप से शिक्षक एवं चिकित्सक।
आइए देखते हैं उपरोक्त क्षेत्र किस प्रकार से रोजगार निर्मित कर सकते हैं।
१. कृषिः-
बिहार की सबसे बड़ी प्राकृतिक संपदा बिहार की मिट्टी है। बिहार की मिट्टी धान, गेहूं, मक्का, जौ, जई, ज्वार बाजरा रागी जैसे खाद्यान्न फसलों के लिए अत्यंत उपयुक्त है।
बिहार की मिट्टी अरहर, मूंग, मशूर, उड़द, कुर्थी, चना, खेसारी, ग्वार फली, सोया, राजमा एवं हरी एवं पीली मटर, जैसी दलहनी फसलों के लिए अत्यंत उपयुक्त है।
बिहार की मिट्टी सरसों, राई या तोरी, तीसी या अलसी, तिल, सोया, सूरजमुखी जैसे तिलहनी फसल के लिए अत्यंत उपयुक्त है। बिहार में बड़े पैमाने पर अरंडी का उत्पादन होता है जोकि एक प्रमुख औषधीय तेल है। बिहार में करंज एवं जटरोपा के पौधे पाए जाते हैं जिनके तेल का उपयोग बड़े पैमाने पर औषधीय उत्पादों के निर्माण में होता है। बिहार में हर इलाके में तार एवं खजूर के पेड़ पाए जाते हैं जिनके फल से पाम आयल तैयार किया जा सकता है। जट्रोफा के तेल से बायोडीजल भी बनाया जाता है।
बिहार में फसलों के तीन मौसम होते हैं जिन्हें रबी, जायद और खरीफ कहते हैं। शीत ऋतु में रबी फसल, ग्रीष्म एवं वर्षा ऋतु में खरीफ फसल तथा वसंत ऋतु जो रबी और खरीफ फसलों के बीच की अवधि में पड़ता है उसमें जायद फसल ऋतु आती है। इस फसल ऋतु में मुख्यतः सरसों की कटाई से खाली खेत में (अगात गेहूं की कटाई से खाली खेत में भी) मूंग, मसूर, चना, ग्वार, तीसी, जैसे दलहनी फसलों के अतिरिक्त बड़े पैमाने पर तरबूज, खरबूज, खीरा, ककरी, फुंट जैसे रसदार फल उगाए जाते हैं।
बिहार की मिट्टी में सालों भर आलू, फूलगोभी, पत्ता गोभी, सेम, बैंगन, परवल, शलजम, लौकी, कद्दू, कच्चू, बीन, फ्रेंच बीन, करेला, भिंडी, कंटोला या चट्ठैला, ओल, अरबी, झींगा, नेनुआ, कुंदरी, कच्चू, मूली, गाजर, शलजम, शिमला मिर्च जैसी हरी सब्जियां एवं पालक, खेसारी, चना पत्ता, विभिन्न रंगों वाली लाल एवं हरी गेनधारी साग, बथुआ, कुसुम, पोय एवं सनई जैसे साग बड़े पैमाने पर उपजाई जाती है जिनका उत्पादन और बढ़ाया जा सकता है तथा खेतों तक मिनी ट्रक वाले रेफ्रिजरेटेड वैन के माध्यम से ट्रेनों में रेफ्रिजरेटेड कोच की व्यवस्था करके पूरे देश में इनको पहुंचाया जा सकता है। इस पूरी प्रक्रिया में उत्पादन, परिवहन और वितरण का एक चेन तैयार होगा जो बहुत बड़े पैमाने पर रोजगार का सृजन करेगा और बिहार के लोगों को बेहतरीन आय होगी।
बिहार की मिट्टी में बड़े पैमाने पर प्याज, लहसुन, शकरकंद, चुकंदर, सुथनी, गाजर और मूली जैसे सदाबहार कंद उपजाए जा सकते हैं। यहां पर कुद्रुम या ठेपा भी बड़े पैमाने पर उगता है जिसकी बड़ी शानदार चटनी बनती है।
बिहार की मिट्टी में बड़े पैमाने पर हल्दी, अदरक, अजवाइन, मेथी, जीरा, मंगरैला, लाल मिर्च, बड़ी इलायची, छोटी इलायची, धनिया जैसे मसालों का उत्पादन हो सकता है। बिहार की मिट्टी तेजपत्ता, दालचीनी के वृक्षों के लिए बेहद उपयुक्त है। हाल के प्रयोगों से सिद्ध हुआ है कि यहां केसर की भरपूर उपज ली जा सकती है।
बिहार भारत का पटसन (जुट) प्रदेश भी माना जाता है। आज के पर्यावरण चुनौती के दौर में जुट, सिंथेटिक रेसे से बनने वाले वस्त्र, बैग, रस्सियां, ब्रश और पैकिंग उत्पादों के विकल्प के रूप में पुनः लोकप्रिय हो सकता है। बिहार के किशनगंज इलाके में लगभग 20000 हेक्टर में चाय के बागान है जहां उत्पादित चाय को दार्जिलिंग चाय से भी बेहतर माना गया है और इसके क्षेत्र का विस्तार पड़ोस के पूर्णिया, कटिहार और अररिया जिला जहां की मिट्टी और आबोहवा समान है, में किया जा सकता है।
बिहार में सालों भर फलने वाले अमरूद, आंवला, नींबू, नारंगी, गागर नींबू, माल्टा, कटहल, बरहर, नाशपाती, अनानास, सतालू, पपीता, कीनू, स्ट्रॉबेरी एवं वनीला के लिए उपयुक्त मिट्टी है। यहां पर विभिन्न किस्मों की बेल, बेर, नारियल एवं कसैली, खैरा (कत्था) का भी उत्पादन होता है। बिहार में लोग शौकिया तौर पर काजू एव पिस्ता बादाम के पेड़ लगाते हैं जिसे व्यावसायिक तौर पर भी लगाया जा सकता है। बिहार में जगह-जगह पर बेर एवं शहतूत के पेड़ पाए जाते हैं जिनके ऊपर आसानी से रेशम के कीड़े पाले जा सकते हैं। बिहार का मगही पान बनारसी पान के जितना ही मशहूर है।
यहां आम, कटहल एवं लीची जैसे फलों का भी का भरपूर उत्पादन होता है। बिहार का मालदह, सीपियां, एवं जेठू आम स्वाद में महाराष्ट्र के विश्व प्रसिद्ध अल्फांसो आम से बहुत बेहतर है लेकिन देश के पूर्वी इलाकों के बाहर इनको शायद ही कोई जानता है। इसके अतिरिक्त यहां पर सुकुल, सिंदुरिया, बरहरी, आम्रपाली, फजुली जैसे कच्चे में बेहद खट्टे और पकने पर बेहद मीठे हो जाने वाले आम भी पाए जाते हैं। लंगड़ा एवं कृष्णभोग भी अद्वितीय स्वाद वाले आम है। बिहार में पाया जाने वाला भोटवा एवं लड़ुई आम लगभग 1 किलोग्राम के आकार का एवं बेहद मीठा होता है। कच्चे में इसकी सुखावटी तथा आमचूर पाउडर बेहद आसानी से बनाए जा सकते हैं तथा पकने पर इनसे आमरस बनाया जा सकता है। बिहार के तिरहुत क्षेत्र की शाही लीची पूरे विश्व में सर्वश्रेष्ठ है। तिरहुत में ही विश्व प्रसिद्ध मालभोग, चीनीया, अलपान, बरसाइन, बतीसा, छतीसा, हरि छाल जैसे अत्यंत स्वादिष्ट केलों का उत्पादन होता है।
बिहार कुछ दशक पहले तक गन्ने के सबसे बड़े उत्पादकों में से एक था। आज यहां गन्ना मुख्यतः गर्मी के मौसम में रस निकालने के लिए उपजाया जाता है। पहले गन्ने की कटाई के पश्चात उसका जड़ खेत में छोड़ दिया जाता था और कुदाल की सहायता से आसपास की मिट्टी को कोड़ कर उड़द मूंग एवं मसूर की खेती की जाती थी। 3 महीने के पश्चात गन्ने की जड़ों से फिर नए पौधे आ जाते थे तब तक दलहन की फसल ले ली जाती थी और उनके पौधे हरे चारे के रूप में भी काम आते थे और खेतों के लिए हरी खाद एवं नाइट्रोजन का भी काम कर देते थे।4 इन खेतों में बड़े पैमाने पर बगेरी एवं बटेर जैसे पक्षी ठिकाना बनाते थे जिनका शिकार करके स्वादिष्ट मांस खाया जाता था।
उत्तर बिहार के तिरहुत, दरभंगा एवं कोशी प्रमंडल के विभिन्न जिलों के पोखरों की बहुतायत वाले इलाकों में रामदाना एवं मखाने की बड़े पैमाने पर खेती की जाती है जो अपने पौष्टिक गुणों के कारण पूरे विश्व में लोकप्रिय खाद स्रोत के रूप में उभर रहे हैं। जलजमाव वाले क्षेत्रों में सिंघाड़ा या पानीफल की भी बड़े पैमाने पर खेती होती है। 12 मई 2020 को प्रधानमंत्री ने जिस पैकेज की घोषणा की थी उसमें वित्त मंत्री श्रीमती निर्मला सीतारमण ने बताया है कि बिहार में मखाना के कलस्टर का निर्माण भी होगा।5
बिहार में धान की लगभग 200 किस्म पाई जाती है जिसमें बासमती की लगभग दो दर्जन किस्में काफी प्रसिद्ध है। भागलपुर का कतरनी धान भी पूरी दुनिया में अपने स्वाद एवं सुगंध के लिए जाना जाता है।6 बिहार शेष भारत एवं विश्व को इसका निर्यात कर सकता है।
बिहार एवं पूर्वी उत्तर प्रदेश में उपजाया जाने वाला गेहूं स्वाद में पंजाब एवं मध्य प्रदेश के गेहूं से बहुत बेहतर है। इसका कारण यह है कि इस इलाके में इनकी खेती हर वर्ष आने वाली नदियों की बाढ़ के दौरान बिछाई गई नई जलोढ़ मिट्टी में होता है जो बेहद उपजाऊ होती है और उसमें रासायनिक खाद और कीटनाशक पदार्थों की कोई खास जरूरत नहीं होती। इसके विपरीत पंजाब, हरियाणा और अन्य प्रांतों में रासायनिक खादों और कीटनाशकों पदार्थों का बड़े पैमाने पर उपयोग होता है जो अंश रूप में फसल उत्पाद तक पहुंच जाता है और मानव तथा पशु स्वास्थ्य के लिए हानिकारक बन जाता है।
बिहार में मक्के की साल में 5 फसलें ली जा सकती है। सामान्य मक्का पशु चारा के रूप में इस्तेमाल होने के साथ-साथ मनुष्यों के खाद में भी एक महत्वपूर्ण स्थान रखता है। आज शहरों में प्रचलित रेस्त्रां संस्कृति में जो विविध प्रकार के पकवान या डिशेज परोसे जाते हैं उनमें बहुधा उपयोग किया जाने वाला कॉर्न पाउडर कच्चे मक्के से ही तैयार होता है। आइसक्रीम में भी कॉर्न पाउडर का बड़े पैमाने पर उपयोग होता है। एक खास किस्म का मक्का कॉर्न फ्लेक्स के रूप में सारी दुनिया में मशहूर फास्ट फूड बन चुका है। मक्के से एथेनॉल एवं पेट्रोल भी बनाने की शुरुआत हो चुकी है।
भारत के मध्यम एवं उच्च वर्ग में जिस ओट की भोजन के विशिष्ट रूप में शुरुआत हो चुकी है वह मुख्यतः जई नामक फसल से प्राप्त होता है जिसे बिहार में हरे चारे के रूप में गाय भैंस एवं बकरी जैसे दुधारू पशुओं को खिलाया जाता है ताकि वह ज्यादा दूध दे। ऐसा ही मरुवा एवं रागी के साथ है। बिहार के मैदानी इलाके में सड़क के दोनों ओर चैड़े नाले होते हैं जिसमें अक्सर हल्दी की तरह का एक पौधा उग आता है जिसे स्थानीय लोग केरवा फूल कहते हैं यह वास्तव में आरारोट का पौधा है जो विभिन्न प्रकार के खाद्यान्न डिश बनाने में उपयोग में आता है।बिहार में मशरूम की खेती की अपार संभावनाएं हैं। इसे बहुत कम लागत में व्यवसायिक तौर पर उत्पादित किया जा सकता है। इसकी मध्यम एवं उच्च वर्ग के लोगों में बहुत मांग है।
बिहार में औषधीय गुणों वाले पौधों जैसे सतावर, कालमेघ, ब्राह्मी, अश्वगंधा, सर्पगंधा, पुदीना, तुलसी, मूसली, सफेद मूसली पिपली, कर्पूर, स्टीविया, जापानी पुदीना या मेंथा, गूग्गल, अगर, हरर, बहेरा, लेमनग्रास खस, बच, घृतकुमारी (एलोवेरा), कोलियस फॉरस्कोली, अमरबेल, रीठा, शिकाकाई इत्यादि के व्यवसायिक उत्पादन की पूरी संभावना है।
बिहार में खेतों की मेड़ों के बीच पॉपुलर नामक पौधे की बड़े पैमाने पर खेती की जा सकती है जो चार पांच साल में तैयार हो जाता है। यह पौधा इस प्रकार बड़ा होता है कि खेतों में इसकी छाया नहीं पड़ती और उसमें अन्य फसलों की खेती आराम से की जा सकती है। बिहार में बांस की खेती की भी असीम संभावनाएं हैं। यहां खाली जमीन पर शीशम, सागवान, महोगनी, अर्जुन, बनकट, कुसुम, कदंब, इमली, बबूल, यूकेलिप्टस, लसफसिया, पीपल, नीम और गंभार जैसे पौधे बहुत तेजी से विकास करते हैं। तराई के इलाके में सखुआ का भी पौधारोपण किया जा सकता है।
बिहार में तरह-तरह के गेंदा, डहेलिया, गुलदाउदी, बालसम, स्थल कमल, स्वर्ण कमल, चाइना चीनी, राखी, सदाबहार, कनैला, धतूरा, बेला, रातरानी, हर श्रृंगार, चंपा, चमेली, मोगरा, एवं रजनीगंधा जैसे फूलों का व्यवसायिक उत्पादन किया जा सकता है। यहां के जलीय क्षेत्रों में विभिन्न प्रकार के कमल और कुमुदिनी के फूल उगाए जा सकते हैं तथा उनकी पत्तियों से कागज एवम पत्तल भी बनाए जा सकते हैं।
२ कृषि आधारित उद्योगों का विकास
आज पूरे भारत में पैकेटबंद खाद्य पदार्थों की मांग बढ़ रही है तो बिहार भी विभिन्न किस्म के गेहूं के आटे का आपूर्तिकर्ता बन सकता है। इसके साथ साथ सूजी, मैदा, बिस्किट, ब्रेड इत्यादि का भी भरपूर उत्पादन किया जा सकता है। बिहार अपने यहां उत्पन्न विभिन्न किस्मों की चावलों का प्रचार प्रसार कर अंतरराष्ट्रीय बाजार में बेच सकता है। यहां पर श्रीविधि (ैत्प्) नामक खेती की अत्याधुनिक तकनीक को अपनाकर धान के उत्पादन को 3 गुना तक बढ़ाने में सफलता प्राप्त हुई है। बिहार उत्पादित जौ बड़े पैमाने पर माल्ट व्हिस्की के उत्पादन में प्रयुक्त हो सकती है।
स्वतंत्रता के आसपास बिहार सबसे बड़ा चीनी एवं गुड़ उत्पादक प्रांत था। बिहार की चीनी मिलों को पुनर्जीवित करने से बड़े पैमाने पर संगठित और असंगठित रोजगार पैदा होगाा चीनी मिलों में चीनी के साथ साथ गुड़, खांडसारी, मिश्री का तो उत्पादन होगा ही, एथेनॉल का भी बड़े पैमाने पर उत्पादन होगा जो अल्कोहल इंडस्ट्री के साथ साथ स्वच्छ इंधन के रूप में पेट्रोल के साथ भी उपयोग किया जाता है। केंद्रीय सड़क परिवहन, राजमार्ग, जहाजरानी, लघु, मध्यम तथा सूक्ष्म उद्योग मंत्रालय के मंत्री श्री नितिन गडकरी ने 10 दिसंबर 2020 को कोईलवर में सोन नदी पर बने नवनिर्मित पुल का उद्घाटन करते हुए कहा कि भारत भविष्य में धान, गन्ना और मक्के को इथेनॉल में बदलकर 8 लाख करोड़ के इंधन आयात को कम कर सकता है और बिहार सरकार पहल करे तो यह प्रांत देश में स्वच्छ जैव ईंधन के उत्पादन का अग्रणी केंद्र बन सकता है और यहां की अर्थव्यवस्था का कायाकल्प हो सकता है। केंद्रीय मंत्री गडकरी ने कहा है कि परिवहन मंत्रालय एक फ्लेक्सी इंजन विकल्प (थ्समगप म्दहपदम वचजपवद) योजना पर काम कर रहा है, जिससे यात्री अपने पसंदीदा ईंधन विकल्प का चयन कर सकेंगे। परिवहन मंत्री ने कहा है कि आने वाले दिनों में उपभोक्ता कार चलाने के लिए पेट्रोल या इथनॉल (म्जींदवस) में से अपनी मर्जी से कुछ भी चुन सकते हैं। उन्होंने यह भी बताया कि केन्द्र सरकार ने गन्ना के साथ ही मक्का और चावल से भी इथनॉल उत्पादन को मंजूरी दे दी है। देश में दो लाख करोड़ का व्यवसाय इथनॉल से हो सकता है। उन्होंने राज्य सरकार से आग्रह किया कि बिहार में इसको 100 नई फैक्ट्रियां लगाने की योजना तैयार करें। उन्होंने इसके लिए केंद्र सरकार द्वारा शत-प्रतिशत ऋण देने की सहमति व्यक्त की और केंद्र सरकार द्वारा समस्त उत्पादन के खरीद की गारंटी भी दी।7 यह उल्लेखनीय है कि भारत इन फसलों का अपनी आवश्यकता से अधिक उत्पादन कर रहा है। बिहार के चीनी मीलों से पूर्व के वर्षों में बिजली के उत्पादन का प्रयोग भी सफलतापूर्वक आजमाया जा चुका है। गन्ने के अवशेष से अच्छे किस्म का कागज भी बनाया जा सकता है। गन्ने की पेराई का मौसम समाप्त होने पर इन्हीं कारखानों में बांस और धान की भुसी से कागज बनाने का भी कार्य किया जा सकता है जिसके लिए बिहार में पर्याप्त कच्चा माल उपलब्ध है।
बिहार में पटसन का बड़े पैमाने पर उत्पादन होता है। इस क्षेत्र में शोध तथा पुराने जूट मिलों का नवीकरण एवं नए जूट मिलों की स्थापना द्वारा पर्यावरण के अनुकूल वस्त्र, पैकिंग उत्पाद, थैले, ब्रस, बोरियां, रस्सियां इत्यादि बड़े पैमाने पर उत्पादित करके निर्यात की जा सकती हैं जो बड़े स्तर पर संगठित एवं असंगठित रोजगार पैदा करेगा। इन्हीं पटसन मिलो में सेमल की रूई से भी विभिन्न प्रकार के वस्त्र एवं अन्य उत्पाद तैयार किए जा सकते हैं।
बिहार के किसान बड़े पैमाने पर अपने बंजर जमीनों में बांस, सेमल एवं बनकठ के पौधे लगाते हैं। बांस ना सिर्फ भवन निर्माण की एक महत्वपूर्ण सामग्री है वरन इसकी पत्तियां पशु चारे के रूप में बेहतरीन आहार मानी जाती है। बांस की नई कोंपल की सब्जी भी बनती है और अत्यंत स्वादिष्ट अचार भी। बिहार में नदियों का जाल बिछा है। यहां पर नदी के आस-पास वाले खेतों में स्वयमेव ही वनगंभार का वृक्ष उग आता है। सेमल सहित इन वृक्षों को कटाई के बाद दूसरे प्रांतों में आइसक्रीम स्टिक एवं प्लाईवुड उद्योग के कच्चे माल के रूप में भेज दिया जाता है। आवश्यकता इस बात की है कि बिहार में ही प्लाईवुड बनाने की कारखाने लगाया जाए ताकि यह एक संगठित उद्योग का रूप ले सके और बड़े पैमाने पर रोजगार सृजन हो।
फल प्रसंस्करण उद्योग-
बिहार में आम, लीची, अनानास, नींबू, अंगूर, माल्टा और नारंगी के पल्प से बृहद पैमाने पर जैम, जेली, सॉस, जूस बनाकर देश देश-विदेश को वितरित किया जा सकता है। लीची, अंगूर और अनानास से बड़े पैमाने पर वाइन भी तैयार की जा सकती है। मुजफ्फरपुर के युवा वैज्ञानिक अविनाश कुमार चैधरी ने बिहार में नाशपाती एवं सेब के पौधों को सफलतापूर्वक उगाकर साबित कर दिया है कि बिहार में भी इनकी खेती की जा सकती है। यहां पर आम के पकने से पहले अधिकांश आम मध्य आकार का होकर झड़ जाते हैं जिनका इस्तेमाल आम का सुखा आटा और अमचुर पाउडर बनाने में किया जा सकता है जिसकी सालों भर देश विदेश में मांग रहती है। बिहार की महिलाएं फलों से विविध प्रकार के अचार बनाने में निपुण है। वह विभिन्न प्रकार के पापड़, बड़ी और मिष्ठान भी बनाने में निपुण है और यह गृह उद्योग के रूप में बड़े पैमाने पर महिला रोजगार सृजन का कारण बन सकता है।
३. क. डेयरी उद्योग
बिहार प्रदेश हमारे देश भारत में उत्तर प्रदेश प्रांत के पश्चात सर्वाधिक पशुओं वाला प्रदेश है। देश में उत्तर प्रदेश के पश्चात सबसे अधिक गाय, भैंस और बकरियां बिहार में ही पाली जाती है। गाय और भैंस दूध देती है जिसका बड़ा आंतरिक बाजार है। अविभाजित बिहार की सीमा में गुजरात के आनंद स्थित अमूल की तर्ज पर एक बड़ी सहकारी डेयरी है जो सुधा ब्रांड नाम से विभिन्न प्रकार के दुग्ध उत्पाद तैयार करती है और बिहार, झारखंड तथा दिल्ली तक अपने उत्पादों का वितरण करती है। बिहार में निजी क्षेत्र में बड़े पैमाने पर छोटी-छोटी डेयरी स्थापित की जा सकती है। ग्रामीण स्तर पर मिनी पाउडर प्लांट लगाए जा सकते हैं। दूध को परिष्कृत करके लंबे समय तक खराब ना होने वाले उत्पाद बनाए जा सकते हैं। कन्फेक्शनरी उद्योग लघु उद्योग के रूप में खड़ा किया जा सकता है। बीसवीं शताब्दी में पूरे भारत में मॉटर्न चॉकलेट काफी प्रसिद्ध थी जो वर्तमान सारण जिले के मढौडा ने बनाई जाती थी।
पशुओं के अपशिष्ट से जैविक रसोई गैस का बड़े पैमाने पर उत्पादन हो सकता है। इसके अतिरिक्त इसका बचा हुआ अपशिष्ट खेतों में प्राकृतिक खाद के रूप में उपयोग किया जा सकता है। बकरियां भी बिहार के ग्रामीण जीवन में अर्थव्यवस्था का एक महत्वपूर्ण आधार बन सकती है। एक समय बकरी को गरीब की गाय कहा जाता था। आज नवजात शिशुओं और 2 साल के बच्चों में भरपूर पोषण के लिए बकरी के दूध की मांग बढ़ी है। अब तो बकरी का दूध ग्रामीण इलाकों में भी 500 से लेकर 1000 रु किलो तक बिका करती है। हालांकि आज भी बकरी पालन मुख्यतः मांस के लिए ही किया जाता है। वैज्ञानिक ढंग से बकरी पालन किए जाने पर बिहार के लाखों गरीब परिवार आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर हो सकते हैं। बकरी पालन के साथ-साथ भेड़ पालन भी बिहार की परिस्थितियों में एक उपयोगी रोजगार बन सकता है।
ख. पोल्ट्री फार्मिंग
बिहार में अभी भी पोल्ट्री फार्मिंग का पर्याप्त विस्तार नहीं हुआ है। अभी भी सारा जोर मुर्गी पालन और अंडा उत्पादन पर ही रहता है। इसमें बत्तख और तीतर पालन पर भी जोड़ दिए जाने की आवश्यकता है। बिहार के बहुत सारे इलाकों में बंजर जमीन होती है जहां खर-पतवार उगते हैं। ऐसे क्षेत्रों के लिए एमू पालन किया जा सकता है। उल्लेखनीय है कि एमू पक्षी शुतुरमुर्ग के बाद दूसरा सबसे बड़ा पक्षी है जो उड़ नहीं सकता। एमू का अंडा लगभग 2 किलो का होता है और विश्व बाजार में औषधीय गुणों के कारण इसकी जबरदस्त मांग है। एमू के लिए विशेष चारे की जरूरत नहीं होती। इसे अन्य जानवरों से खतरा नहीं होता। यह मांस का भी उत्तम स्रोत है।
ग. मत्स्य पालन
बिहार में नदियों का जाल बिछा हुआ है जिनसे मीठे पानी में पलने वाली सैकड़ों किस्म की मछलियां प्राप्त की जाती है लेकिन यहां पर मत्स्य पालन में योजना का अभाव देखा जाता है। आवश्यकता इस बात की है कि बिहार के मत्स्यपालको के बीच जागरूकता पैदा की जाए जिससे उन्हें पता हो कि कब और कहां मछली पकड़नी है और कब नहीं। बिहार में अभी भी तालाब की संख्या बहुत कम है। सरकार को मनरेगा योजना के तहत बड़े पैमाने पर तालाब की खुदाई को प्रोत्साहन देना चाहिए जहां मत्स्य पालन किया जाएगा। इन तालाबों में रोहू, कतला, नैनी, शिमला, गोल्डन ग्रास, ग्लास कट जैसे किस्म की मछलियां और बड़े पैमाने पर उत्पादित की जा सकती है। इसके अतिरिक्त नहरों और झीलों में भी वैज्ञानिक ढंग से मछली पालन होना चाहिए।
बिहार में हर क्षेत्र के निचले इलाके में चैर पाए जाते हैं जहां बरसात के मौसम में कई महीने के लिए पानी लग जाता है। यह चैर एक विशिष्ट किस्म के धान का उत्पादक क्षेत्र है जिसक पौधे का दो तिहाई हिस्सा पानी में बढ़ता है और ऊपर का तिहाई हिस्सा पानी के ऊपर। यह धान की खेती वाला चैर क्षेत्र बोवारी, बामी, गईंचा, गरई, छही, रोहू, सिंगि, मुंगरी, मांगुर, भाकुर, झींगा, पोठिया, डेरवा, पगास अथवा जासर जैसे बेहतरीन स्वाद वाले मछलियों और केकड़ों के उत्पादन के लिए आदर्श स्थल है। इन मछलियों की स्थानीय बाजार के अतिरिक्त बाहर भी जबरदस्त मांग है जो बिहार के मत्स्य पालकों के लिए आर्थिक रूप से वरदान बन सकता है।
बिहार में पोल्ट्री फार्मिंग और मत्स्य पालन करने पर पक्षियों और मछलियों के भोजन के लिए मुर्गी दाना और मछली दाना बनाने का उद्योग भी बड़े पैमाने पर विकसित होगा जो विस्तृत रोजगार सृजन का कार्य करेगा।
४. पर्यटन उद्योग
बिहार प्रदेश अपने आंगन में प्राचीन भारत के मगध, अंग, वैशाली और मिथिला महाजनपदों का इतिहास समेटे हुए हैं। यहां राजगीर, नालंदा, बोधगया, गया, पाटलिपुत्र, वैशाली,सासाराम, मुंगेर तथा रोहताशगढ जैसे ऐतिहासिक स्थल है। इन जगहों पर असंख्य प्राचीन ऐतिहासिक इमारतें व उत्खनन वाले दर्शनीय स्थल विराजमान है। बिहार में अनेकों ऐसे टीले हैं जहां संभावना है की पुरातात्विक महत्व के स्थल दबे हुए हैं।
क. बिहार में धार्मिक पर्यटन
पूरे बिहार प्रांत में कई जगह बड़े-बड़े बौद्ध स्तूप बिखरे हुए हैं। पूरे राज्य में ऐतिहासिक महत्व के मंदिर विद्यमान है जिनके पुनरुद्धार की आवश्यकता है।
बिहार विश्व के 125 करोड़ से अधिक हिंदुओं की आराध्य माता जानकी का जन्म स्थल है जो सीतामढ़ी जिले में है। उनके पिता राजा जनक की राजधानी जनकपुर पहले भारत का ही हिस्सा हुआ करता था जिसे अंग्रेजों ने राणा शासकों द्वारा 1857 के विद्रोह में सहायता करने से खुश होकर नेपाल के अधिकार में दे दिया गया था। वर्तमान जनकपुर शहर भी सीतामढ़ी से कुछ घंटों की दूरी पर ही स्थित है।
बिहार के बेगूसराय जिले में सम्राट अशोक द्वारा स्थापित एक विशाल मंदिर है जिसका पुनरुद्धार किया गया है और अब यह अशोक धाम के नाम से जाना जाता है। औरंगाबाद जिले के देव में सूर्य मंदिर है जिससे पूरे भारत के प्रमुख सूर्य मंदिरों में एक माना जाता है। वैशाली के कमल छपरा गांव में विक्रमादित्य महादेव मंदिर का पुनर्निर्माण किया गया है जिसकी स्थापना मूल रूप से सम्राट चंद्रगुप्त विक्रमादित्य के द्वारा मानी जाती हैं। मुजफ्फरपुर शहर स्थित गरीबनाथ मंदिर पूरे बिहार के शिवभक्त श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र बना हुआ है। भागलपुर जिले में स्थित सुल्तानगंज के अजगैबीनाथ मंदिर की यात्रा के बिना बाबा बैद्यनाथ की यात्रा पूरी नहीं मानी जाती। द्वादश ज्योतिर्लिंगगो में एक देवधर स्थित वैद्यनाथ धाम अब झारखंड की सीमा में है लेकिन वहां भगवान शिव को जल अर्पित करने के लिए सुल्तानगंज में ही गंगा से जल लेकर कांवड़िए अपनी यात्रा शुरू करते हैं।
जैन धर्म के अधिकांश तीर्थंकर बिहार में जन्मे है। जैन धर्म के सबसे प्रसिद्ध तीर्थंकर वर्धमान महावीर का जन्म-स्थान वैशाली जिला अंतर्गत कुंडग्राम नामक गांव में है। वर्धमान महावीर जी का महापरिनिर्वाण स्थल नालंदा के पावापुरी में है। कुंडग्राम में महावीर के जन्म-स्थल पर एक मंदिर निर्माणाधीन हैा जिसे विश्व विरासत के रूप में विकसित किए जाने की आवश्यकता है।
सिखों के दसवें गुरु श्री गुरु गोविंद सिंह जी का जन्म पटना साहिब में हुआ था। श्री तख्त हर मंदिर साहेब या पटना साहिब को सिख धर्म में स्वर्ण मंदिर के पश्चात दूसरा सबसे महत्वपूर्ण धर्म स्थल माना जाता है हाजीपुर के नजदीक प्रथम गुरु श्री नानक देव जी से संबंधित गुरुद्वारा स्थित है।
इसी प्रकार सारी दुनिया के बौद्ध धर्मावलंबियों के लिए सबसे महत्वपूर्ण स्थल बोधगया और वैशाली बिहार में ही स्थित है। कपिलवस्तु के राजकुमार सिद्धार्थ को बोधगया में पीपल के वृक्ष के नीचे ही ज्ञान प्राप्त हुआ था और वह इसके पश्चात बुद्ध कहलाए। वैशाली महात्मा बुध का प्रिय प्रवास स्थल था जहां उन्होंने 8 वर्ष बिताए थे। वर्तमान मुजफ्फरपुर जिले की सीमा में स्थित अंबारा गांव वैशाली की सुविख्यात नगरवधू आम्रपाली का निवास स्थल था। उसने यहां पर आम के बाग लगवाए थे जो उसने महात्मा बुद्ध से शिक्षा ग्रहण करने के पश्चात बौद्ध संघ को दान कर दिया था।
वैशाली में ही कालाशोक के समय द्वितीय बौद्ध संगीति आयोजित की गई थी। वैशाली में ही बौद्ध संगीति के स्थल पर महात्मा बुध के अस्थि कलश को स्थापित किया गया था जिसे फिलहाल पटना के संग्रहालय में सुरक्षित रखा गया है। आवश्यकता इस बात की है कि वैशाली में शीघ्रतापूर्वक विश्वस्तरीय संग्रहालय का निर्माण किया जाए एवं एक विशिष्ट स्थल पर बुद्ध के अस्थि कलश को स्थापित किया जाए तो निश्चित रूप से यह बोध गया के समान ही पूरे विश्व के लगभग 55 करोड़ बौद्ध धर्मावलंबियों के लिए पवित्रतम स्थल बन जाएगा।
वैशाली के उत्खनन स्थल के पास ब्रिटिश शासन के दौर में तब के नागरिक सेवा अधिकारी और हिंदी के जाने-माने लेखक स्व. श्री जगदीश चंद्र माथुर के प्रयास से वैशाली महोत्सव जैसे सांस्कृतिक आयोजन का प्रारंभ हुआ था जिसने शीघ्र ही राष्ट्रीय रूप प्राप्त कर लिया था। इस महोत्सव में देश के राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, केंद्रीय मंत्रिमंडल के वरिष्ठ सदस्य, विभिन्न राज्यों के राज्यपाल, देश की उच्च न्यायपालिका के सदस्य, भारत के कला जगत की विशिष्ट हस्तियां, कवि, लेखक, लोक कलाकार उपस्थित होते थे लेकिन 1990 के पश्चात यह आयोजन अपना महत्व खोने लगा और अब इसकी मात्र खानापूर्ति हुआ करती है। विश्व में प्रथम गणतंत्र तथा लोकतंत्र की जन्मभूमि होने वाले स्थल पर इस महोत्सव के पुनरुत्थान के द्वारा हम विश्व को अपनी समृद्ध परंपरा से ना सिर्फ परिचित करवाएंगे वरन यह बिहार प्रदेश में बड़े पैमाने पर रोजगार सृजन का एक माध्यम बन सकता है।
दुनिया का सबसे बड़ा पशु मेला हाजीपुर के नजदीक सारण जिला के सोनपुर नामक शहर में गंगा और गंडक नदी के संगम क्षेत्र में आयोजित किया जाता है। पूरे देश के व्यापारी यहां हाथी घोड़ा ऊंट गाय, भैंस, बैल, बकरी, भेंड़ तथा विभिन्न किस्मों के पक्षियों की खरीद-बिक्री के लिए आते रहे हैं। इस मेले में विभिन्न प्रकार के कृषि यंत्र, घरेलू उपयोग के औजार, लकड़ी की बनी गाड़ी, खिलौने, कपड़े और औषधियां भी बड़े पैमाने पर खरीद बिक्री की जाती थी। यहां पर विभिन्न प्रकार के पेड़-पौधों और उनके बीजों के नए-नए प्रभेदों से किसानों को परिचित कराया जाता था तथा उनकी खरीद बिक्री भी होती थी। पूरे देश से लाए गए हस्तशिल्प और मूर्तिकला का भी यह मेला विपणन केंद्र होता था। खेती के लिए बैल का उपयोग लगभग समाप्त हो जाने तथा विभिन्न जानवरों को संरक्षित श्रेणी में शामिल कर लेने के कारण यह पशु मेला अपना महत्व खोने लगा है। इस मेले में पहले देशभर के कलाकार, गायक, नर्तक, नाटक मंडली अपना प्रदर्शन करने आते थे, इसके अतिरिक्त कुश्ती जैसी प्रतियोगिताएं भी आयोजित की जाती थी। आज आवश्यकता इस बात की है कि इस मेला को आज के युग की आवश्यकताओं के अनुरूप बनाते हुए एक समृद्ध सांस्कृतिक धरोहर के रूप में पुर्नस्थापित किया जाए।
ख. नदीध्जल पर्यटन
बिहार में नदी पर्यटन की विशाल संभावना है प् यहां छोटी-बड़ी असंख्य नदियां है जो नाव, मोटर बोट, स्ट्रीमर के लिए सालों भर उपयुक्त है। तिरहुत तथा सोन नहर भी इस कार्य के लिए सर्वथा उपयुक्त है। इनका जल पर्यटन हेतु विकास किया जा सकता है।
इसके अतिरिक्त बिहार के सभी शहरों में कहीं ना कहीं कुछ ऐसे क्षेत्र हैं जो 2-3 किलोमीटर लंबे चैड़े हैं और जहां बरसात का पानी इकट्ठा हो जाता है और सालों भर जमा रहता है। ऐसे इलाकों को मन कहा जाता है, उदाहरण के लिए उत्तर बिहार के मुजफ्फरपुर शहर में रेलवे स्टेशन से मुश्किल से 700 मीटर की दूरी पर सिकंदरपुर मन का इलाका है जो लगभग 2 किलोमीटर लंबा और 1 किलोमीटर चैड़ा है। यहां पर सालों भर पानी जमा रहता है। यह एक प्रकार का कृत्रिम झील कहा जा सकता है ।अगर सरकार और निजी क्षेत्र मिलकर काम करें तो यहां पर पर्यटक सुविधाएं उत्पन्न की जा सकती हैं। इसमें मत्स्य पालन किया जा सकता है, पैडल बोट, मोटर बोट का प्रबंध किया जा सकता है। रात में लाइट एंड साउंड, संगीत कार्यक्रम, लेजर शो, फूड कॉर्नर इत्यादि का प्रबंध करके बड़े पैमाने पर लोगों को आकर्षित किया जा सकता है। यह सारी गतिविधियां बृहत पैमाने पर रोजगार उत्पन्न करने में सक्षम है।
बिहार के सभी बड़े शहर नदियों के किनारे या नदियों के दोनों ओर या फिर नदियों के संगम पर बसे हैं। यहां गुजरात के अहमदाबाद में बने साबरमती रिवर फ्रंट की तर्ज पर रिवर फ्रंट का निर्माण किया जा सकता है और बनारस की तर्ज पर नदियों की आरती जैसे धार्मिक आयोजन भी किए जा सकते हैं जो राज्य को एक सांस्कृतिक विस्तार भी प्रदान करेगा। दुनिया भर के पर्यटक ज्यादा से ज्यादा बिहार की ओर आकर्षित होंगे, बिहार का भ्रमण करेंगे। इससे वायु यातायात में वृद्धि होगी, कैब सेवाओं में वृद्धि होगी, होटल उद्योग बढ़ेगा, खाद्य पदार्थ और भोजन वाले रेस्तरां बनेंगे ा सभी जगह से मांग पैदा होगी, रोजगार बढ़ेगा और विदेशी मुद्रा की प्राप्ति होगी।
५. नवीकरणीय ऊर्जा
बिहार में वर्ष के 9 महीनों तक अत्यंत तीव्र धूप पड़ती है। बिहार में अब अधिकांशतः पक्के मकान पाए जाते हैं जिन की छतों पर सोलर ऊर्जा का उत्पादन किया जा सकता है। बिहार में वर्तमान में अब सिर्फ मैदानी इलाका बच गया है जहां नदियों पर बांध नहीं बनाए जा सकते लेकिन नेपाल के साथ भारत सरकार द्विपक्षीय संधि करके और बांध बना सकती है, जिससे बिजली उत्पादन किया जा सकता है और नेपाल को बिजली का एक हिस्सा मुफ्त प्रदान किया जा सकता है और शेष बिजली को बिहार के उपयोग में लाया सकता है। बांध निर्माण से उत्तर बिहार में आने वाले बाढ़ को भी नियंत्रित किया जा सकता है तथा सूखे क्षेत्रों में सिंचाई के लिए पानी पहुंचाया जा सकता है।
बिहार के विभिन्न क्षेत्रों में पवन ऊर्जा की भी अच्छी खासी संभावना है। पवन ऊर्जा का उपयोग छोटे-छोटे मिलों को चलाने, सिंचाई के लिए पंप चलाने और विद्युत उत्पादन के लिए भी किया जा सकता है।
६. वस्त्र उद्योग
एक समय बिहार में वस्त्र उद्योग काफी फल-फूल रहा था। भागलपुर और आसपास के जिलों में विभिन्न प्रकार के वस्त्र बनाया जाते थे। भागलपुर भारत में रेशमी वस्त्र उद्योग का एक प्रमुख केंद्र होता था। आज भी भागलपुर के कारीगर रेशम के बेहतरीन वस्त्र बनाते हैं लेकिन आवश्यकता इस बात की है कि उन्हें बेहतरीन उपकरक, आधुनिक डिजाइन तथा विपणन एवं प्रचार सहायता दी जाए ताकि यह वस्त्र हजारों बुनकर परिवारों के लिए समृद्धि का कारण बन सके।
बिहार के विभिन्न क्षेत्रों में निर्यात हेतु रेडीमेड (बने बनाए) वस्त्रों के उत्पादन का कार्य किया जा सकता है। बिहार में इसके लिए कुशल श्रम मौजूद है। बिहार के लाखों लोग दिल्ली, जालंधर तथा लुधियाना के गारमेंट उद्योग में काम करते हैं । इनमें से कुछ अनुभवी लोगों को लेकर बिहार को ही वस्त्र निर्माण का केंद्र बनाया जा सकता है। उल्लेखनीय है कि बिहार की सीमा से सटे बांग्लादेश ने बने बनाए वस्त्रों के निर्माण में विश्व में एक प्रमुख स्थान बना लिया है जबकि वहां तो कपास की खेती होती ही नहीं जबकि बिहार को देश में उत्पादित पटसन तैयार धागा सूत तथा कृत्रिम सूत भी आसानी से उपलब्ध है।
आज विश्व में तथा भारत के अंदर भी खादी वस्त्रों की मांग बढ़ी है और बिहार खादी वस्त्रों का एक प्रमुख उत्पादक राज्य रहा है जिसे नए सिरे से संवारने सजाने और दुनिया के मंच तक पहुंचाने की आवश्यकता है। आज विश्व के विभिन्न राष्ट्रों में हाथ से बने ऊनी वस्त्रों की मांग भी बढ़ी है। बिहार की महिलाएं कांटों से विभिन्न प्रकार के आकर्षक डिजाइनों में ऊनी वस्त्र बनाने में सिद्धहस्त हैं वे विभिन्न प्रकार के सजावटी पर दो का निर्माण करने में भी माहिर हैं। इस प्रकार वस्त्र उद्योग बिहार में आर्थिक संपन्नता लाने में सहायक सिद्ध हो सकता है।
७. इलेक्ट्रॉनिक्स उद्योग
एक समय बिहार के वैशाली जिला मुख्यालय नगर हाजीपुर की कल्पना भारत के प्रथम इलेक्ट्रॉनिक सिटी के रूप में की गई थी। इस शहर को इलेक्ट्रॉनिक्स का केंद्र बनाने का सरकारी इरादा एक मजाक बनकर रह गया। लेकिन बिहार के युवाओं में क्षमता है कि अगर उन्हें सही मार्गदर्शन मिले तो वह पूरे बिहार को इलेक्ट्रॉनिक्स उद्योग का केंद्र बना सकते हैं। बिहार के प्रत्येक शहर में एक जमाने में पहले रेडियो और फिर टेलीविजन को असेंबल करके बनाने का बड़े पैमाने पर कार्य होता था। अधिकांश घरों में असेंबल्ड रेडियो तथा टीवी सेट पाए जाते थे जिनकी गुणवत्ता मशहूर कंपनियों के ऐसे ही उत्पादों के लगभग समान या थोड़ी ही कम होती थी लेकिन उनके मुकाबले यह 50ः तक सस्ते होते थे। कुछ वर्ष पहले तक बिहार में स्थानीय स्तर पर असेंबल्ड स्टेबलाइजर, इनवर्टर, इलेक्ट्रिक प्रेस, इलेक्ट्रिक मोटर, सीलिंग फैन, टेबल फैन, जनरेटर इत्यादि का प्रयोग होता था और इनमें से कई उत्पाद आज भी बदस्तूर असेंबल्ड किए जाते हैं और पसंद भी किए जाते हैं। बिहार के रेडियो तथा टीवी मकैनिक पुराने सेटों से कई बार अत्यंत उपयोगी सामान बना देते हैं। बिहार के कारीगर ध्वनि यंत्रों के निर्माण में भी माहिर हैं और यहां विविध प्रकार के ध्वनि यंत्रों का भी निर्माण कारखाना लगाया जा सकता है।
आज भी बिहार में लैपटॉप के मुकाबले स्थानीय स्तर पर असेंबल्ड डेस्कटॉप कंप्यूटर का ज्यादा प्रयोग किया जाता है। महानगरों में रहने वाले मजदूर वर्ग के लोग कई बार वहां से ऐसे पुराने फोन खरीद कर लाते हैं जो मूल रूप से उच्च स्तरीय महंगे फोन होते हैं लेकिन उनके प्रयोग कर्ताओं ने उसमें किसी बड़ी खराबी के कारण उनको त्याग दिया होता है, वह बंद हो जाने के कारण वह फेंक दिया जाता हैा मैं स्वयं ऐसे कई मजदूरों से मिल चुका हूं जिन्होंने बताया कि उन लोगों ने कई बार अपने मालिकों से उनके खराब हो चुके फोन को बच्चों के लिए खिलौने के रूप में मांग लिया और जिसे उनके स्थानीय शहर के युवा मैकेनिक ने कुछ एक 100-500 रू. के बीच लेंकर फिर से अच्छा खासा समय तक चलने योग्य कौन बना दिया। बिहार में कई स्थानों पर इंजीनियरिंग का प्रशिक्षण और कार्य दोनों होता है अतः कोई कारण नहीं कि बिहार में भी मोबाइल, लैपटॉप एवं अत्याधुनिक एलईडी टीवी निर्माण का संयंत्र नही लगाया जा सकता है क्योंकि इसके लिए यहां दक्ष एवं सस्ते कारीगर आसानी से उपलब्ध हैं। फिर बिहार की स्वयं अपनी लगभग 13 करोड़ की जनसंख्या स्थानीय निर्मित उत्पादों के लिए एक बड़ा बाजार है। इसी प्रकार एलईडी बल्ब, ट्यूबलाइट, रंगीन बल्ब, सजावट वाली बिजली की लड़ियां, सीलिंग लाइट्स, इमरजेंसी लाइट, टॉर्च इत्यादि बिहार में भी बनाई जाती हैं और बड़े पैमाने पर बनाई जा सकती हैं। इस प्रकार इलेक्ट्रॉनिक्स उद्योग बिहार में बेरोजगारी दूर करने और बिहार को आर्थिक रूप से समृद्ध बनाने में योगदान दे सकता है।
८. सॉफ्टवेयर उद्योग
आज भारत को सॉफ्टवेयर निर्यात के क्षेत्र में अग्रणी राष्ट्र माना जाता है। भारत में बैंगलोर हैदराबाद पुणे अमदाबाद और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र के आसपस के शहरों जैसे गुरुग्राम और गौतम बुध नगर (नोएडा) को सॉफ्टवेयर उद्योग का प्रमुख केंद्र माना जाता है। इनके अतिरिक्त दक्षिण एवं पश्चिम भारत में सॉफ्टवेयर उद्योग के कई महत्वपूर्ण केंद्र स्थित है लेकिन सॉफ्टवेयर उद्योग में बिहार का कहीं नाम नहीं आता। बिहार के लाखों युवा युवतियां देश और विदेश के सॉफ्टवेयर निर्माण इकाइयों में काम करते हैं और महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इन युवाओं को प्रोत्साहन देकर बिहार के विभिन्न शहरों में सॉफ्टवेयर टेक्नोलॉजी पार्क की स्थापना की जा सकती है। आज बिहार के पटना, मुजफ्फरपुर, गया, दरभंगा जैसे शहरों में कई युवा स्थानीय स्तर पर मिलजुल कर कई प्रकार के महत्वपूर्ण सॉफ्टवेयर का उत्पादन करते हैं कई बार वह बाहर की कंपनियों के लिए भी सॉफ्टवेयर बनाते हैं लेकिन उनके पास खुद का वृहद सुविधायुक्त केंद्र नहीं होता और ना ही बड़ी पूंजी होती है जिससे वे बड़ी अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं से अपने लिए सॉफ्टवेयर निर्माण का करार हासिल कर सकें।
बिहार में फिल्म एवं टेलीविजन इंडस्ट्री के लिए डिजिटल सहायता केंद्रों के विकास की भरपूर संभावना है। बहुतों को जानकर आश्चर्य होगा कि बिहार के पटना में हॉलीवुड की फिल्मों के लिए वीएफएक्स का काम किया जाता है। बॉलीवुड की कृष सीरीज की फिल्मों में भी पटना के बीएफ एक्स बनाने वालों ने अपना बड़ा योगदान दिया है। क्या आप विश्वास करेंगे की हॉलीवुड की फिल्मों जैसे मिशन इंपासिबल-द घोस्ट प्रोटोकोल, आई रोबोट 3डी, द लीजेंड आफ जोर्रो, बैटलशिप, पिराहना 3क्, इम्मोर्टल्स पाइरेट्स ऑफ कैरेबियन, द हैपनिंग, टाइटेनिक 3क्, स्पाई किड4 और वाटर फॉर एलिफेंट्स जैसी विश्व प्रसिद्ध फिल्मों का वीएफएक्स का काम बहुत हद तक पटना के किदवईपूरी के छोटे-मोटे स्टूडियो में किया गया है।8
बिहार के युवा गणित में बहुत दक्ष होते हैं जो कंप्यूटर साइंस एवं सूचना प्रौद्योगिकी की शिक्षा की आधारशिला है। यही कारण है कि प्रदेश के युवाओं का कंप्यूटर साइंस तथा सूचना प्रौद्योगिकी की पढ़ाई में रुझान तेजी से बढ़ा है। कोई कारण नहीं कि यह युवा शक्ति बिहार को सॉफ्टवेयर निर्यात के क्षेत्र में भी अग्रणी पंक्ति में ला दे।
९. क. हस्तशिल्प उद्योग
बिहार की मिथिला चित्रकला शैली विश्व प्रसिद्ध है। इसे मधुबनी पेंटिंग के नाम से भी जाना जाता है। इस कार्य में मिथिला क्षेत्र की महिलाएं अत्यंत दक्ष है जो घर की दीवारों से लेकर पहनने वाले कपड़ों तक पर रामायण, महाभारत की कहानियों से लेकर लोक कथाओं तक के चित्र जीवंत कर देती हैं। कलमकारी और चित्रकारी की इस महान विद्या का व्यवसायीकरण और पूरे विश्व में पर्याप्त प्रचार-प्रसार तथा विपणन किए जाने की आवश्यकता है। पहले बिहार के ग्रामीण अंचल के घर-घर में ताड़ एवं खजूर के पत्तों से विभिन्न प्रकार की चटाई, सामान रखने वाला टोकरी डलिया और सजावट के सामान बनते थे। बिहार के ग्रामीण क्षेत्रों में पहले कुछ ऐसे खेत होते थे जहां पर खर उग आते थे। इस स्वर का इस्तेमाल मोटी चटाई बनाने में होता था साथ ही साथ इस से सुंदर कलाकारी वाली विभिन्न आकार प्रकार की छोटी-छोटी टोकरिया बनाई जाती थी जिसे सुपनी, डोरी, डोलिया, डोलची कहा जाता था। इसी प्रकार पटसन और डाभी (एक प्रकार का खर) का प्रयोग करके एक प्रकार की सीकरी बनाई जाती थी जिसके ऊपर एक के बाद एक कई मिट्टी या धातु के घड़े टांग दिए जाते थे।9 बांस की चिक और शीतलपाटी भी बिहार के ग्रामीण इलाकों के लोग खूब बनाया करते थे। खस और कुश के इस्तेमाल से भी बहुत सारी उपयोगी चीजें बनाई जाती रही है जो स्थानीय क्षेत्र के लोगों के लिए एक सामान्य वस्तु मानी जा सकती है लेकिन देश के बड़े महानगरों और यूरोप तथा अमेरिका में उनके बारे में प्रचार पसार करने से वह बेहतरीन हस्तशिल्प उत्पाद के रूप में जाना जाएगा। यह सभी वस्तुएं काफी टिकाऊ होती हैं और शत-प्रतिशत पर्यावरण के अनुकूल हैं इसलिए विशेष रूप से विकसित देशों में इनके लिए एक बड़ा बाजार उपलब्ध हो सकता है और यह बिहार के ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार सृजन एवं अर्थ उपार्जन का स्रोत बन सकता है।
आज भारत के बड़े-बड़े महानगरों से लेकर छोटे-छोटे कस्बों और ग्रामीण दुकानों में भी चीन के बने हुए खिलौने बिकते हैं। चीन के बने गुड्डे- गुड़िया, टेडी बियर, पांडा, कुत्ते, भालू और शेर-बाघ के डॉल हर जगह बेचे जाते हैं। क्या इनको बनाने के लिए भी आईआईटी में पढ़ाई करनी पड़ेगी? डिजाइनर स्तर पर भारतीय फैशन टेक्नोलॉजी संस्थान के छात्रों को आगे करके बिहार के ग्रामीण क्षेत्रों में खिलौना उद्योग को विकसित किया जा सकता है जो बड़े पैमाने पर रोजगार प्रदान करने वाला और आय अर्जित करने का साधन बन सकता है।
ख. मिट्ठी षिल्प और काष्ठ षिल्प उद्योग
बिहार के कुम्हार मिट्टी के खिलौने दिए और बर्तन बनाने में माहिर है तो फिर भारत में और बिहार में दिवाली पर चीन के बने दिए क्यों जलने चाहिए? लक्ष्मी-गणेश की मूर्तियां चीन के कारखानों से बनकर क्यों आनी चाहिए? क्या हम अपने कुम्हार भाइयों की स्वाभाविक प्रतिभा को व्यावसायिक रूप नहीं दे सकते हैं?
बिहार के बढ़ई लकड़ी के एक से बढ़कर एक कारीगरी वाले मजबूत और टिकाऊ फर्नीचर उपकरण और खिलौने बनाने में सिद्धहस्त हैं। क्या उनकी प्रतिभा सिर्फ दो जून की रोटी प्राप्त करने तक ही सीमित रहनी चाहिए? बिहार में तो फर्नीचर उद्योग का स्वयं का एक विशाल बाजार उपलब्ध है जिसका लाभ हमारे लकड़ी के कारीगरों को मिलना ही चाहिए। यह कारीगर बुद्ध महावीर के लकड़ी की मूर्तियां और धार्मिक प्रतीक चिन्ह भी बहुत कुशलता से बनाते हैं जिसकी देश-विदेश के पर्यटकों को प्रतीक चिन्ह के रूप में बिक्री की जा सकती है और इन कारीगरों के लिए अच्छी आय का साधन बन सकती है।
ग. धातु षिल्प
प्राचीन काल में मगध के पूरे दक्षिण एशिया में सबसे शक्तिशाली साम्राज्य होने का एक कारण यहां के धातु कर्मी, लौह कर्मी या लुहार थे जो कृषि उपकरण से लेकर युद्ध के उपकरण और चिकित्सा उपकरण बनाने में सिद्धहस्त थे। महरौली में कुतुब मीनार के सामने स्थित ध्रुव स्तंभ या लौह स्तंभ भारत एवं बिहार के इन्हीं धातु कर्मियों के ज्ञान की मिसाल है। आज से 2000 वर्ष पूर्व निर्मित हुआ यह लौह स्तंभ खुले में अनगिनत ऋतु चक्र और प्रतिकूल मौसम को झेल कर भी जस का तस खड़ा है और इसके ऊपर किसी प्रकार के क्षरण का कोई निशान दिखाई नहीं देता। फिर हम भारत के लोग छोटे-छोटे उपकरण चीन से क्यों मंगाते हैंघ् हम अपने इन धातु कर्मियों की प्रतिभा को बढ़ावा क्यों नहीं देते?
घ. अस्त्र शस्त्र निर्माण उद्योगः-
बिहार का मुंगेर क्षेत्र आए दिन मिनी गन फैक्ट्री के उद्भेदन के मामलों के लिए समाचार पत्रों और टेलीविजन समाचार चैनलों पर चर्चा में रहता है। यहां से अक्सर एके-47, ।ज्ञ-56, 9डड पिस्टल और सब मशीन गन, रॉकेट लॉन्चर जैसे अत्याधुनिक घातक अस्त्र शस्त्रों के नवनिर्मित जखीरो को बरामद किया जाता है। देश के दूसरे भागों से गिरफ्तार अपराधियों से भी पूछताछ में पता चलता है कि उनके हथियार मुंगेर में बनाए गए हैं। अब ऐसे उन्नत हथियार हमारे राज्य के कारीगर अपने घर में छोटी सी भट्ठी में बना देते हैं। इसमें शायद ही कभी शिकायत सामने आती है और दूसरी और दशकों तक शोध के नाम पर हजारों करोड़ फूंकने के बाद भारत के ऑर्डिनेंस फैक्ट्री बोर्ड के हथियार लड़ाई के समय जाम हो जाते हैं। क्या मुंगेर और आसपास के लोगों की शस्त्र निर्माण में पारंगतता को संस्थागत रूप देकर रोजगार एवं अर्थ निर्माण का कार्य नहीं किया जा सकता?
यह सारे कार्य संभव है, बस आवश्यकता इस बात की है की अवसरों को पहचाना जाए, चुनौतियों का सामना किया जाए और नकारात्मकता से हटकर सकारात्मकता की ओर बढ़ा जाए।
१०. शिक्षा
किसी भी समाज और राज्य को तरक्की की रफ्तार देने वाला और समृद्धि के पंख देने वाला शिक्षा ही है। बिहार प्राचीन काल से ही शिक्षा का केंद्र रहा है। हिंदू शिक्षा केंद्र के रूप में मिथिला क्षेत्र प्राचीन काल में पूरे उपमहाद्वीप में प्रसिद्ध था। आगे चलकर नालंदा, विक्रमशिला और ओदंतपुरी स्थित विश्व विख्यात विश्वविद्यालय इस क्षेत्र में सैकड़ों वर्षो तक ज्ञान के सृजन का कार्य करते रहे जब तक कि वे मुस्लिम आक्रमणकारियों द्वारा नष्ट नहीं कर दिए गए।
क. विदयालयी षिक्षा की दोषपूर्ण व्यवस्था
आज भी बिहार के प्रत्येक पंचायत में उच्च विद्यालय की स्थापना सुनिश्चित नहीं की जा सकी है जबकि औसतन एक पंचायत में 3 से 5 गांव शामिल होते हैं और उनकी सम्मिलित आबादी 15000 से 25000 के बीच होती है। सभी उच्च विद्यालयों को उच्चतर माध्यमिक विद्यालय में परिणत किए जाने की आवश्यकता है लेकिन मुश्किल से एक चैथाई उच्च विद्यालयों में ही ऐसी सुविधा उपलब्ध है। राज्य सरकार ने एक समान शिक्षा की व्यवस्था करने में कोई रुचि नहीं दिखाई है और बिहार में सामान्य विद्यालय जो कि हिंदी माध्यम के होते हैं के अतिरिक्त उर्दू विद्यालय का भी सरकार द्वारा संचालन किया जाता है। इसके अतिरिक्त मुस्लिम समुदाय के द्वारा मदरसा चलाए जाते हैं लेकिन उसका पूरा वित्तीय बोझ राज्य शासन द्वारा वहन किया जाता है। ये उर्दू विद्यालय और मदरसा एक धर्म विशेष के लोगों तक सीमित है और धार्मिक कूपमंडूकता को बढ़ावा देने का काम करते हैं। सरकार ने दिखावे के लिए संस्कृत माध्यम का मध्यमा शिक्षा बोर्ड भी बना रखा है जो 90ः से अधिक अंको के साथ बिना पढ़ाई के प्रमाण पत्र बांटने के लिए जाना जाता है। सबसे दुर्भाग्य जनक बात यह है कि शिक्षकों की नियुक्ति प्रक्रिया में सभी वर्ग के आवेदकों के लिए अलग-अलग मापदंड अपनाए जाते हैं जिसके कारण श्रेष्ठ शिक्षकों का चयन नहीं हो पाता और जो शिक्षक चुने जाते हैं वे शायद ही कभी अपने बच्चों को उसी विद्यालय में नामांकित कराते हैं जहां वह स्वयं सेवा देते हैं। हां, 10वीं और 12वीं की परीक्षा का फार्म वह अपने विद्यालय से जरूर भरवा देते हैं लेकिन वास्तव में उनकी संतान किसी निजी विद्यालय में पढ़ाई कर रही होती है।
ख. कोचिंग माफिया की समस्या
आज बिहार में कोचिंग माफिया चलाने वाले शिक्षा के आदर्श बने हुए हैं। 11वीं और 12वीं कक्षा का गणित पढ़ाने वाला व्यक्ति बिहार में बहुत बड़ा गणितज्ञ माना जा रहा है। आरक्षण व्यवस्था का नाम उठाकर चंद बच्चों को सफलता दिला कर करोड़ों की कमाई की जा रही है। कोई भी पूछ सकता है कि क्या सिर्फ 11वीं और 12वीं की कुछ घंटे की कोचिंग से ही किसी बच्चे की सफलता सुनिश्चित हो जाती है? पूरे बिहार में सुपर थर्टी, सुपर 40, सुपर फिफ्टी जैसे संस्थाओं की बाढ़ आई हुई है।
इससे भी बढ़कर बिहार के अभिभावकों का लगभग 20000 करोड़ रुपए से अधिक की धनराशि राजस्थान के कोटा या फिर दिल्ली जैसे शहरों में स्थित कोचिंग संस्थाओं में बेकार चला जाता है। जो छात्र पहले से ही प्रतिभाशाली होते हैं वही इंजीनियरिंग या मेडिकल की प्रवेश परीक्षा में सफल हो पाते हैं लेकिन इन बच्चों और उनके अभिभावकों की मस्तिष्क में यह बात डाल दी गई है कि जब तक वह बाहर की किसी प्रसिद्ध कोचिंग संस्था में अपने बच्चे को नहीं डालेंगे उन्हें सफलता नहीं मिल पाएगी। जब राज्य के छात्रों के अभिभावक परेशानियों को जलते हुए राज्य के बाहर हजारों करोड़ खर्च कर सकते हैं तो क्या एक उचित शुल्क की व्यवस्था करके राज्य के अपने उच्चतर माध्यमिक विद्यालयों की दशा नहीं सुधारी जा सकती। ध्यान देने की बात यह है कि राज्य के बाहर के कोचिंग संस्थानों में भी आधे से ज्यादा शिक्षक बिहारी मूल के ही होते हैं लेकिन वह सामाजिक कारणों से अपने राज्य में त्याज्य समझे जाते हैं।10
ग. उच्च शिक्षा के क्षेत्र में समस्या एवं सुधार की आवष्यकता
उच्च शिक्षा के क्षेत्र में बिहार की 13 करोड़ की आबादी के लिए गिने-चुने विश्वविद्यालय उपलब्ध हैं। अंग्रेजों द्वारा स्थापित पटना विश्वविद्यालय को छोड़कर सभी विश्वविद्यालय मान्यता प्रदान करने वाले हैं। दशक में एक बार विश्वविद्यालयों में नियुक्ति होती है जो प्रक्रिया कम से कम 6 साल में पूरी होती है और उसके बाद भी न्यायालयों में उनके सही गलत होने के मुकदमे चलते रहते हैं। ये संस्थान परीक्षा लेकर डिग्री बांटने वाले विश्वविद्यालय बनकर रह गए हैं। ये विश्वविद्यालय राजनीति का अड्डा है और इनमें सचमुच की पढ़ाई शायद 10ः भी नहीं होती। यहां पर अच्छे शिक्षकों को ऊंची जाति का सामंत कह कर प्रताड़ित किया जाता है। पिछड़े वर्ग के शिक्षकों को नया ज्ञानी कहकर ताना मारा जाता है। अनुसूचित जाति वर्ग से आने वाले अधिंकाष शिक्षक बस राजनीतिक गतिविधियों के लिए ही बने होते हैं। इस वर्ग के गणित के शिक्षक भी गणित नहीं पढ़ा कर सिर्फ इतिहास में अपने वर्ग के शोषण और वर्तमान में उससे लड़ने के लिए संघर्ष का तरीका ही पढ़ाते रहते हैं।
बिहार में विश्वविद्यालय शिक्षकों की नियुक्तियां भी दो दशक में एक बार होती है। नियुक्ति प्रक्रिया आमतौर पर 6 से 7 वर्षों तक पूरी नहीं हो पाती और नियुक्ति के पश्चात भी न्यायालयों में उनके गलत होने पर वाद चलता रहता है। पिछले तीन दशकों से स्थानीय सरकार ने इस प्रकार की नीति अपना रखी है की बिहार की शिक्षा में सामान्य वर्ग के लोग कम से कम आ सके। हाल में बिहार में विश्वविद्यालय शिक्षकों के लिए 3200 से अधिक पदों पर नियुक्तियां की गई जिसमें साक्षात्कार में 15 में 14 अंक लाने वाले सामान्य वर्ग के अभ्यर्थी बाहर हो गए वहीं अनुसूचित जाति वर्ग में 2 अंक लाने वाले अभ्यर्थीयों को भी चुना गया और आज वे शान से अपने-अपने महाविद्यालय में विभागाध्यक्ष बन चुके हैं। यह ऐसे शिक्षक है जो बगैर किताब में आंख गड़ाए सामाजिक विज्ञान और भाषा विषय भी नहीं पढ़ा सकते। बिहार में चूहा खाने की वकालत करने वाला एक पूर्व मुख्यमंत्री का मूर्ख पुत्र भी ऐसे ही विश्वविद्यालय प्राध्यापक के सम्मानित पद तक पहुंचा है। सामान्य वर्ग की सीटों पर आमतौर पर दूसरे प्रांत के प्रभावशाली और पहुंच वाले लोगों के करीबियों को नियुक्ति दी जाती है या फिर बिहार के राजनीतिक पहुंच रखने वाले जनप्रतिनिधियों और प्रशासनिक अधिकारियों से जुड़े लोगों के बच्चों की नियुक्ति होती है।
बिहार के उच्च शिक्षा के छात्र अपवाद स्वरूप ही कक्षा में उपस्थित होते हैं। वित्त रहित महाविद्यालयों में तो सिर्फ नामांकन और परीक्षा फार्म भरने का काम होता है। फिर भी इन्हीं के छात्र परीक्षाओं में ऊपर का स्थान रखते हैं जिसके पीछे उनकी मेहनत ना होकर इन महाविद्यालयों के संचालकों की बिहार विद्यालय परीक्षा समिति और विभिन्न विश्वविद्यालयों के अधिकारियों के साथ की गई सांठगांठ रहती है।
बिहार में कुकुरमुत्ता की तरह निजी इंटर कॉलेज और फर्जी औद्योगिक प्रशिक्षण संस्थान (आईटीआई) खुले हुए हैं जो थोड़ी सी जगह में टीन सेड या एसवेस्टस के मकान में चलते हैं। यहां व्यवस्थापक द्वारा रखा गया व्यक्ति ही मुख्य शिक्षक, प्रयोगशाला प्रदर्शक, पुस्तकालय अध्यक्ष, किरानी और चपरासी सब कुछ होता है। 2 वर्ष पूर्व उजागर हुआ बिहार टॉपर घोटाला इसी व्यवस्था की परिणिति थी।
बिहार के विश्वविद्यालयों में अधिसंख्य छात्र तर्कशास्त्र, दर्शनशास्त्र, गृह विज्ञान, श्रम एवं सामाजिक कल्याण, समाजशास्त्र, इतिहास, राजनीति विज्ञान, गृह विज्ञान जैसे विषयों में नामांकन लेते हैं और शायद ही कभी कक्षा करते हैं। वाणिज्य और विज्ञान में स्थिति कुछ बेहतर है। मुख्य उद्देश्य स्नातक की उपाधि लेना होता है। स्नातकोत्तर में सिर्फ विश्वविद्यालय स्नातकोत्तर विभाग में पढ़ाई होती है और महाविद्यालय स्थित स्नातकोत्तर विभाग की कक्षा खाली रहती हैं। इस परिपाटी पर रोक लगाने की आवश्यकता है। बिहार में भाषा और सामाजिक विज्ञान विषयों में 90 फीसदी पीएचडी धारकों को अपने थीसिस के चैप्टर्स के बारे में ही पता नहीं होता। बिहार स्थित विश्वविद्यालय भाषा और सामाजिक विज्ञान में पीएचडी की उपाधि प्रदान करने का कारखाना बना हुआ है।
बिहार में सैकड़ों ठ.मक और क्.म्स.म्क के संस्थान खुल गए हैं जहां आप अनायास जाने पर छात्र तो दूर शिक्षकों को भी नहीं देख पाएंगे लेकिन यह प्रति छात्र लगभग 200000 रु का शुल्क वसूलते हैं और बस डिग्री प्रदान करने का काम करते हैं।जो छात्र कभी कक्षा नहीं करता और दूसरे काम में लगा हुआ है वह भी 70 से 80ः अंक ले आता है और फिर स्थानीय नियोजन इकाई को पैसा खिलाकर प्राथमिक से लेकर उच्च विद्यालय तक में नियोजित हो जाता है।
घ. प्राथमिक एवं माध्यमिक षिक्षा में सुधार की जरूरत
बिहार को सशक्त एवं समृद्ध बनाने के लिए आवश्यक है की ग्राम स्तर पर प्राथमिक एवं माध्यमिक शिक्षा को मजबूत बनाया जाए। सभी वर्ग के शिक्षकों के लिए एक समान योग्यता तय की जाए और निश्चित अंक तथा एक समिति के समक्ष कम से कम 3 घंटे के प्रभावी प्रदर्शन के उपरांत ही शिक्षकों की नियुक्ति की जाए। कक्षाएं नियम अनुरूप चलें, परीक्षाएं अत्यंत सख्त हो। नकल करने में सहायता देने वाले वीक्षक, अभिभावक या नकल माफिया के सदस्यों को 7 साल के कठोर कारावास के साथ-सथ पूरी संपत्ति जप्त करने का दंड देना चाहिए। अगर मैट्रिक परीक्षा में शामिल होने वाले लगभग 1000000 विद्यार्थियों में से एक आधा दर्जन आत्महत्या भी कर लें तो यह मानकर खुश हो जाना चाहिए कि वह इसी लायक थे। ऐसे ही कठोर कदमों से शिक्षा को सुधारा जा सकता है।उच्च विद्यालय स्तर पर शिक्षा में सुधार होने से उच्चतर माध्यमिक शिक्षा अपने आप सुधर जाएगी। इस स्तर पर सभी छात्रों को एक तकनीकी विषय में ज्ञान प्राप्त करना अनिवार्य कर देना चाहिए। उच्च तकनीकी विषय में कठोर परीक्षा लेकर सफल सिद्ध होने वाले छात्रों को ही आगे पढ़ने का मौका देना चाहिए।
ड. उच्च षिक्षा में सुधार की आवष्यकता-
विश्वविद्यालय स्तर की उच्च शिक्षा को अत्यंत विशिष्ट बना देना चाहिए और मुख्य जोर विज्ञान तथा तकनीकी विषयों की शिक्षा पर होना चाहिए। गृह विज्ञान, तर्कशास्त्र, दर्शनशास्त्र, गांधी दर्शन, अरबी, फारसी, मानव शास्त्र, जैसे विषयों की शिक्षा को पूर्णतरू बंद कर देना चाहिए अथवा एक या दो महाविद्यालय तक सीमित कर देना चाहिए। समाजशास्त्र, मनोविज्ञान, इतिहास, भूगोल जैसे विषयों की पढ़ाई के लिए सीटों की संख्या इनके लिए उपलब्ध अवसरों की संख्या के समानुपाती होना चाहिए। राजनीति विज्ञान और अर्थशास्त्र के अध्ययन का अवसर सिर्फ सर्वश्रेष्ठ प्रतिभायुक्त छात्रों को ही दिया जाना चाहिए और विश्वविद्यालयों में इनके लिए विशिष्ट विभाग होने चाहिए। आप स्वयं सोचिए कि बिहार में सबसे गया गुजरा छात्र राजनीति विज्ञान जैसे राज्य और शासन के अध्ययन वाले विषय का छात्र होता है, धड़ल्ले से पीएचडी तक की डिग्री ले लेता है और वह छठी कक्षा के नागरिक शास्त्र का ज्ञान भी नहीं रखता है। अर्थशास्त्र जैसे विशिष्ट विषय का छात्र जीडीपी नहीं समझता, प्रति व्यक्ति आय नहीं समझता, अर्थशास्त्र को ही परिभाषित नहीं कर पाता है। जब हम इन विषयों को विशिष्ट बनाएंगे तो इनकी प्रतिभाएं राज्य और राष्ट्र को बढ़ाने में योगदान देने वाली होंगी ना कि सिर्फ बेरोजगारों की फौज बढ़ाने वाली। सरकार को विश्वविद्यालय में उन्हीं विषयों में पर्याप्त सीटें रखनी चाहिए जिनकी विद्यालय स्तर पर शिक्षक के रूप में नियुक्ति हेतु आवश्यकता होती है। इन सभी विषयों के शिक्षकों के लिए हिंदी एवं कम्युनिकेटिव इंग्लिश की पढ़ाई अनिवार्य होनी चाहिए और प्रशिक्षण की कठोर अनुशासन वाली प्रक्रिया अपनाई जानी चाहिए।
आज पूरे देश में प्राथमिक से लेकर उच्चतर माध्यमिक विद्यालय के शैक्षणिक विषयों के लिए शिक्षकों की भारी मांग है लेकिन बिहार में भारी संख्या में ठ.म्क और क्.म्स.म्क योग्यता धारी होने के बावजूद वह बिहार से बाहर काम करने के लिए अयोग्य हैं। उन्नत प्रशिक्षण कार्यक्रम और भाषाई दक्षता होने पर वह अन्य राज्यों में तथा विदेशों में भी शिक्षक के गरिमा पूर्ण एवं पर्याप्त आय वाले पद को प्राप्त करने में सहायक सिद्ध होंगे और राज्य को प्रगति के पथ पर आगे ले जाएंगे। बिहार में शिक्षकों के निर्यातक राज्य बनने की पूरी संभावना है।
च. चिकित्सा शिक्षा
बिहार में चिकित्सा शिक्षा के क्षेत्र में भी पर्याप्त संभावनाएं हैं। बिहार में डॉक्टरों तथा सहायक चिकित्सा कर्मियों के हजारों पद खाली है। बिहार में नर्सों के 50,000 से अधिक पद खाली हैं। राज्य सरकार अगर पर्याप्त मेडिकल कॉलेज और नर्सिंग प्रशिक्षण संस्थान की व्यवस्था करेगी तो ना सिर्फ राज्य में बड़े पैमाने पर अच्छे डॉक्टर और सहायक चिकित्साकर्मी सामने आएंगे वरन अन्य राज्यों और राष्ट्रों तक उनकी सेवाएं मिल पाएंगी। राज्य के मरीजों को भी अपने इलाज में दूसरे प्रांतों में जाकर धन का अपव्यय नहीं करना पड़ेगा। अभी बिहार के अभिभावक अरबों रुपए की धनराशि कैपिटेशन फी के रूप में राज्य और देश के बाहर के निजी मेडिकल कॉलेज को देते हैं लेकिन उनके द्वारा प्रदान की गई शिक्षा की गुणवत्ता हमेशा संदेह के घेरे में रहती है।
ध. अन्य उद्योग
बिहार में पूर्व काल में मुजफ्फरपुर में इंडियन ड्रग एंड फार्मास्युटिकल्स लिमिटेड (आईडीपीएल) की स्थापना की गई थी जो जीवन उपयोगी जीवन रक्षक दवाइयां बनाती थी ऐसे उपक्रमों को पुनर्जीवित करने और विस्तार करने से बिहार में फार्मा उद्योग रोजगार भी देगा राज्य के लोगों को सस्ती दवाइयां भी मिलेंगी और निर्यात से विदेशी मुद्रा भी प्राप्त होगी।
ऊपर वर्णित क्षेत्रों के अतिरिक्त और भी बहुत सारे क्षेत्र हो सकते हैं जो राज्य में रोजगार सृजन तथा आर्थिक समृद्धि का द्वार खोल सकते हैं। साइकिल, मोटरसाइकिल और स्कूटर जैसे दोपहिया वाहनों कि निर्माण इकाई लगाई जा सकती है। राज्य सरकार स्कूली छात्रों को प्रतिवर्ष लाखों की संख्या में साइकिल खरीदने के लिए राशि जारी करती है जिसके लिए वह उनका बिहार में निर्मित होना अनिवार्य कर दे तो साइकिल निर्माण इकाइयां बिहार में भी अपना प्लांट लगा लेंगी। पटना के नजदीक फतुहा में एक स्कूटर और ऑटो रिक्शा की निर्माण इकाई सफलतापूर्वक आजमाई जा चुकी है। बैटरी चालित ई-रिक्शा का कारखाना लगाया जा सकता है बस एवं ट्रक जैसे भारी वाहनों के बॉडी निर्माण की इकाई प्रत्येक जिले में खोली जा सकती है। सोलर प्लेट एवं विभिन्न कार्यों में इस्तेमाल होने वाली छोटी बड़ी बैटरी के उत्पादन का भी केंद्र लगाया जा सकता है।
जन जागरूकता की आवष्यकता
उपरोक्तकायों के लिए सही नेतृत्व, राज्य के वासियों का अपना इरादा, उच्च चरित्र और उच्च नैतिक मापदंड की भी आवश्यकता होगी। बिहार के लोगों को अपने जातीय दुराग्रह को त्यागना होगा। अपराधी किसी भी जाति का हो उसके प्रति कठोर भाव अपनाना ही पड़ेगा। व्यवसाय करने वालों को अपना शत्रु मारने से आम जनता का ही नुकसान होगा समाज का कोई भी वर्ग जो अपने उचित गुणों के कारण अग्रणी स्थान पर है उससे जलन की भावना त्याग देनी होगी और उसको साथ लेकर उसके गुण और अनुभव का फायदा उठाकर आगे बढ़ना होगा बिहार के सामाजिक व्यवस्था में पूर्व से अग्रणी चल रहे लोगों को भी अपने मन में बची खुची श्रेष्ठता की नकली भावना को त्याग कर सामाजिक सौहार्द और आर्थिक समृद्धि से परिपूर्ण राज्य बनाने में योगदान आवश्यकता है। जनता चाहे तो नेताओं और अधिकारियों को मजबूर कर सकती है कि वह उद्योगपतियों और व्यवसायियों के घर तक जाएं और उनके पैर पकड़कर उन्हें राज्य में निवेश करने और उद्योग धंधे खड़े करने का आग्रह करें ा उनको पूर्ण सुरक्षा का आश्वासन देना चाहिए। उद्योग स्थापना में उनकी सहायता करनी होगी उनको परेशान करने वाले तत्वों को राज्य आदेश से पुलिस द्वारा सीधे गोली मार दी जानी चाहिए। जब उद्योगपतियों तथा व्यवसायियों को अपने जीवन, संपत्ति और निवेश की सुरक्षा प्राप्त होगी, अपने कार्यों के प्रति उचित मान-सम्मान प्राप्त होगा तो वह खुशी-खुशी बिहार को आगे बढ़ाने में अपना योगदान देंगे।
अप्रासंगिक नेतृत्व से मुक्ति की आवश्यकता
एक और आवश्यकता बिहार में पिछले तीन दशकों से सत्ता पर हावी चार नेताओं की चांडाल चैकड़ी से मुक्ति पाने की है जिसमें से एक ने लोगों को सामाजिक न्याय के नाम पर हाथ में लाठी और बंदूक थमा दी और स्वयं मुंबई की बी ग्रेड फिल्मों की हीरोइनों का नाच देखता रहा और अपने परिवार के लिए हजारों करोड़ की संपत्ति इकट्ठा की। जब जेल जाने की नौबत आई तो पहले अपनी अनपढ़ गृहिणी पत्नी को शासन की बागडोर सौंप दी जिस के शासन में उसके दो भाई कानून व्यवस्था को ध्वस्त कर गुंडागर्दी का नंगा नाच करते रहे। उसके पश्चात उसने अपने 9वीं फेल बेटे को अपनी विरासत सौंप दी और उसकी सहायता के लिए अपने दूसरे गंजेड़ी बेटे को लगा दिया। चांडाल चैकड़ी के दूसरे नेता ने पहले वाले नेता के साथ पहले खुद को राजनीति में प्रासंगिक बनाया और फिर उसका भय दिखाकर 15 वर्ष से सत्ता से चिपका हुआ है और सावधानीपूर्वक सुरासुंदरी का आनंद भोगता है तथा बिहार के युवाओं को बरगला कर और विकास के झूठे सपने दिखा कर अपनी राजनीतिक रोटी सेंकता रहता है। इस पलटू राम के बारे में कहा जाता है कि इसके पेट में दांत हैं। इस चैकड़ी का तीसरा सदस्य सबसे बड़ा अवसरवादी व्यापारी है। वह कभी इस चैकडी के छात्र राजनीति वाले दौर में सहयोगी हुआ करता था लेकिन वह राष्ट्रवाद और भारतीय संस्कृति की पताका फहराने की बात करने वाले दल में सिरमौर बन बैठा। यह व्यक्ति किसी भी जाति के प्रतिभाशाली व्यक्ति को राज्य में आगे बढ़ने नहीं देता। यह सबसे खतरनाक दो मुहा सांप है।
चांडाल चैकड़ी का चैथा सदस्य राजनीतिक जगत में बाबा कहलाता है और गर्व से कहता फिरता है कि आज पूर्व काल के तथा कथित स्वर्ण समाज का काम पिछड़े नेताओं का ढोल बजाना है। यह व्यक्ति अपनी गंदी सोच के अनुसार कभी बड़े भाई के साथ रहता है तो कभी छोटे भाई की सरकार में साथ हो जाता है और दोनों जगह गाली खाकर भी अपने संकीर्ण हितों तथा अहम की पूर्ति करते रहता है। बिहार की राजनीति में इस चैकड़ी से बाहर एक अन्य नेता है जो काफी महत्वपूर्ण माने जाते थे लेकिन उनका निधन हो चुका है। इनको राजनीति का मौसम वैज्ञानिक माना जाता था और इन्होंने अपने पूरे कुनबे को सांसद, विधायक, पार्टी अध्यक्ष बना रखा था।हालांकि हम कह सकते हैं कि बिहार के विकास के लिए अपने साथियों के मुकाबले इस नेता ने सर्वाधिक काम किया। इनकी छवि भी व्यक्तिगत रूप से स्वच्छ बनी रही। इनकी मुख्य बुराई यही मानी जाती है यह राजनीति में अपने परिवार से आगे नहीं देख पाए। केंद्र में किसी भी दल द्वारा निर्मित केंद्रीय सरकार में यह नेता जी मंत्री बन जाते थे।यह नेता दिवंगत होने के पूर्व अपनी दूसरी पत्नी से उत्पन्न पुत्र को अपनी राजनीतिक विरासत सौंप चुके थे। यह पुत्र अपने समर्थकों के बीच फिल्मी सुपरस्टार माना जाता है क्योंकि इसने एक बी ग्रेड बंबइया फिल्म में काम किया था लेकिन इस सुपरस्टार के फैन को इसकी फिल्म का नाम ही पता नहीं होता।
निष्कर्षः
बिहार वासियों को अपने बीच से ही ऊर्जावान, उत्साही, कर्मठ, चरित्रवान एवं रचनात्मक सोच वाले जन-प्रतिनिधियों का चुनाव करना होगा। जातिगत श्रेष्ठता की भावना का त्याग करना होगा। बिहार की सभी जातियों के लोग बहुत अच्छे हैं। आज की तिथि में किसी भी जाति में चरित्रवान और गुणवान लोगों की कमी नहीं है विशेषकर वैसे लोगों की जो जनप्रतिनिधि बन सकें। ऐसे लोगों का अपने राज्य को प्रगति के पथ पर आगे बढ़ाने के लिए जुनूनी होना आवश्यक है। जनता को इन जन प्रतिनिधियों के ऊपर निरंतर दबाव बनाए रखना होगा ताकि जिस कार्य के लिए इन्हें चुना गया है उसे पूरा किया जा सके। शासन के अधिकांश कार्य स्थाई कर्मचारियों द्वारा किए जाते हैं। यहां पर राज्य के आवश्यकताओं के अनुरूप तकनीकीविदो को मुख्य पदों पर संविदा के आधार पर 5 वर्ष के लिए नियुक्त किया जाना चाहिए और उनका प्रदर्शन संतोषजनक रहने पर उन्हें आगे भी बरकरार रखना चाहिए। विधि व्यवस्था की अच्छी स्थिति के बिना राज्य में उद्योग धंधे ना तो आएंगे और ना ही आने वाले टिक पाएंगे। इसके लिए आवश्यक है कि सेना के रिटायर्ड उच्च अधिकारी को पुलिस का सलाहकार बनाना चाहिए और अपराध के मामले होने पर त्वरित कार्यवाही करके मामलों का निपटारा करना चाहिए। बिहार वासियों को छोटी-छोटी बात पर सड़क जाम करने, हड़ताल करने, धरना देने, जबरन दुकानें बंद कराने, राजकीय संपत्ति को नुकसान पहुंचाने की आदत छोड़ देनी चाहिए क्योंकि इससे अंतिम रूप से उन्हीं का नुकसान होता है। सभी को सरकारी संपत्ति की रक्षा अपनी संतान की तरह करनी चाहिए क्योंकि वह पूरी जनता को सुविधा प्रदान करने के लिए होता है। जनप्रतिनिधियों और शासकीय कर्मचारियों द्वारा किसी भी सुविधा के दुरुपयोग पर तुरंत आवाज उठाई जानी चाहिए। नियम तोड़कर अथवा शासकीय कर्मचारियों को रिश्वत देकर काम निकालने की आदत भी बंद होनी चाहिए। स्थानीय निकायों के जनप्रतिनिधि से लेकर राज्य एवं केंद्रीय विधायिका में अपने प्रतिनिधियों और शासन से जुड़े कर्मचारियों के भ्रष्टाचार के विरुद्ध खुलकर आवाज उठानी चाहिए क्योंकि यह जो अवैध संपत्ति अर्जित करते हैं वह राज्य की जनता के मेहनत की कमाई होती है। बिहार वासियों को अपने छोटे-छोटे झगड़े आपस में मिल बैठकर बातचीत के द्वारा निपटाना चाहिए और लड़ाई झगड़ा, थाना- पुलिस, कोर्ट -कचहरी और राजनीतिक दलों के दरबार से दूर रहना चाहिए। बिहार के लोगों में यह भावना होनी चाहिए की स्वरोजगार सर्वश्रेष्ठ है। अपने घर में स्वरोजगार सबसे उत्तम है। उन्हें यह भी विश्वास होना चाहिए की इमानदारी पूर्वक किया गया कोई भी कार्य मनुष्य को छोटा नहीं बनाता है। दुनिया के अन्य लोगों के समान बिहारवासी भी प्रतिभा संपन्न हैं, परिश्रमी हैं तो दुनिया के अन्य लोगों के समान ही वह भी अपना विकास कर सकते हैं, अपने राज्य में समृद्धि ला सकते हैं, अपने राज्य को खुशहाली प्रदान कर सकते हैं, अपने राष्ट्र के विकास में पूरे शान से अपना योगदान दे सकते हैं।
संदर्भ सूचीः
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http://unexploredbihar.blogspot.com/2017/03/morton-toffee-factory-marhowrah-bihar.html?m=1
Received on 18.12.2020 Modified on 21.01.2021
Accepted on 19.02.2021 © A&V Publications All right reserved
Int. J. Rev. and Res. Social Sci. 2021; 9(1):18-36.