वृद्धजनों की समस्या एवं परिवर्तनशील स्थिति
(रीवा जिले के जवा तहसील के विशेष संदर्भ में)
डॉ. मधुलिका श्रीवास्तव1, दिनेश कुमार2
1सह प्राध्यापक (समाजशास्त्र), शास. ठाकुर रणमत सिंह महाविद्यालय रीवा (म.प्र.)
2शोधार्थी (समाजशास्त्र), शास. ठाकुर रणमत सिंह महाविद्यालय रीवा (म.प्र.)
*Corresponding Author E-mail:
ABSTRACT:
प्रस्तुत शोध पत्र में समाज में वृद्धों की समस्याओं की स्थिति को जानने का प्रयास किया गया है, जिसमें रीवा जिला के कुछ क्षेत्रांे को चुनकर समाज में वृद्धों की समस्याओं का अवलोकन किया गया है तथा 50 वृद्ध लोगों से साक्षात्कार के माध्यम से तथ्य एकत्रित किये गए हैं। भारत वर्ष में वृद्ध व्यक्तियों को आदर एवं सम्मान की दृष्टि से देखा जाता रहा है। सामान्यतः इन व्यक्तियों की आवश्यकताओं की पूर्ति एवं समस्याओं का समाधान भारतीय संयुक्त परिवार में होता रहा है; परन्तु औद्योगिकीकरण के परिणाम स्वरूप इस देश में संयुक्त परिवार का धीरे-धीरे विघटन हो रहा है तथा उसके स्थान पर एकल परिवार का वर्चस्व बढ़ रहा है। इसके साथ-साथ व्यक्तिवादी, भौतिकवादी एवं सुखवादी मूल्यों के बढ़ने के कारण वृद्धो की उपेक्षा की जाने लगी इसके अतिरिक्त कुछ वृद्ध निराश्रितता की समस्या से भी ग्रस्त होते जा रहें है। जिनमें आर्थिक समस्याओं स्वास्थ्य एवं चिकित्सकीय समस्याओं परिवारिक एवं भावनात्मक समस्याओं अवासीय समस्याओं इत्यादि का उल्लेख किया जा सकता है। सर्वेक्षण में शोधार्थी द्वारा उत्तरदाताओं से प्रश्न पूँछा गया जिसमें वृद्धों की समस्याओं के बारे में जानकारी प्राप्त की गई है। प्राप्त तथ्यों को वर्गीकृत व विश्लेषित कर निष्कर्ष प्रस्तुत किये गए है।
KEYWORDS: वृद्ध, परिवर्तनशील स्थिति, स्वास्थ्य परीक्षण।
INTRODUCTION:
अवधरणात्मक विवेचन -
वृद्धों की समस्या को समझने के लिए समसामयिक समाज में परिवार की भूमिका को समझना आवश्यक है। आज वृद्धों के प्रति वह नजरिया नहीं है जो पहले था विविध प्रकार के अध्ययनों से स्पष्ट होता है कि वृद्धों की देखरेख के लिए परिवार से बढ़कर कोई दूसरा संगठन नही है, परन्तु परिवर्तित परिस्थितियों में विविध प्रकार के सामाजिक, सांस्कृतिक एवं मनोवैज्ञानिक, वैज्ञानिक कारकों के परिणाम स्वरूप आज परिवार अपनी वह भूमिका प्रतिपादित नहीं कर पा रहा है, जिसकी अपेक्षा है। जहाँ तक वृद्धों के देखरेख का प्रश्न है, परिवार में वृद्धों का स्थान केन्द्रिय है इसके अन्तर्गत वृद्धों को सुचारू रूप से देखरेख करने के लिए बल दिया जाता है। परिवार के अन्तर्गत ही युवा वर्ग को वृद्धजनों की देखरेख का महत्वपूर्ण उत्तरदायित्व सौंपा जाता है। परंतु विभिन्न प्रकार के प्रभाव के परिणामस्वरूप आज परिवारों से उनके अपेक्षित भूमिका की विशेष आशा नहीं रखी जा सकती है। इस प्रकार यदि परिवार का युवा वर्ग वृद्धों के खान-पान, मनोरंजन, अध्यात्मिकता के आधार पर बढ़ता रूझान आदि के बारे में सक्रिय नहीं रहता, ऐसी स्थिति में हम वृद्धों के मगंलमय दीर्घ जीवन की बहुत अधिक अपेक्षा नहीं कर सकते। बुजुर्ग हमारे समाज के दर्पण होते है जो हमारे समाज का मजबूत आधार होते है जो समाज की परम्पराओं के सम्वाहक होते है जिनसे आने वाली पीढ़ियॉ इनके अनुभवो को बॉटती है किंतु आज इनकी अनेक प्रकार की समस्याओं से सम्बन्धित स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण संबंधी कार्यक्रमों की शुरूआत की गयी।
विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट(1) में भारत में वृद्धा की अनेक समस्याओं पर अनेक तथ्य दिए गए है। इसमें सर्वाधिक चिंतनीय मद्दा दुर्व्यवहार का है एल्डर एब्यूज इन ंइंडिया, अब्लीयुएचओं कंट्री रिपोर्ट 2002(2) में भारत में वृद्धों की स्थिति पर चर्चा करते हुए कहा गया है कि अपमान, उपेक्षा, दुर्व्यहार, प्रताड़ना एवं अकेलेपन के कारण भारत के अधिकांश बुजुर्ग वृद्धावस्था को एक बीमारी मानने लगे हैं।
विश्व स्तर पर वृृद्धों की बढ़ती समस्या को देखते हुए संयुक्त राष्ट्र संघ ने सन् 1999 को वृद्धों के सम्मान में अंतर्राष्ट्रीय वृद्ध वर्ष घोषित किया। हमारे देश ने भी सन् 2000 को राष्ट्रीय वृद्ध वर्ष के रूप में घोषित किया गया। संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा प्रतिवर्ष अक्टूबर को अंतराष्ट्रीय वृद्ध दिवस के रूप में मनाया जाता है।
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 41 में कहा गया है कि राज्य वृद्धावस्थ जैसी निर्योग्यता की दशाओं में वृद्धजनों को लोक सहायता पाने के अधिकार को प्राप्त कराने का प्रभावी उपाय करेगा। वृद्धजनों के कल्याण के लिए भारत सरकार का स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याणं मंत्रालय नीतियॉ एवं योजनाएॅ तैयार करता है। इसी मंत्रालय के प्रयास से जनवरी 1991 के केन्द्र सरकार द्वारा वृद्धजनों के लिए राष्ट्रीय नीति की घोषणा की गयी। इस नीति में सरकारी संस्थाओं तथा गैर-सरकारी अभिकरणों के मध्य सहभगिता का ढांचा उपलब्ध कराया गया है। इस नीति के तहत सरकारी हस्तक्षेप के अनेक विषयों की पहचान की गयी है। इसमें प्रमुख हैं- वित्तीय सुरक्षा, स्वास्थ्य एवं पौष्टिक आहार, आवास की उपलब्धता, सामाजिक सुरक्षा, वृद्ध कल्याण में जनसंचार माध्यमों की भूमिका, गैर सरकारी संगठनों, ग्राम पंचायतों तथा स्थानीय स्तर की अन्य संस्थाओं की भूमिका इत्यादि।
स्वास्थ्य संबंधी अनेकों कार्यक्रमों की बदौलत वृद्धजनों में रहन-सहन उनके स्वास्थ्य एवं उनकी औसत आयु में उल्लेखनीय सुधार हुआ है, किन्तु इतना ही काफी नहीं है। वृद्धों की बढ़ती संख्या, बदलती हुई परिवारिक संरचना वृद्धजनों के जीवन को नई कठिनाइयों से युक्त करता जा रहा है। ऐसी स्थिति में सरकारी प्रयासों पर प्रश्नचिन्ह लग रहा है। केन्द्र सरकार तथा राज्य सरकारों द्वारा इस दिशा में नए प्रयास करने की दरकार है। हालांकि यह भी सच है कि कोई भी सरकारी प्रयास तभी सार्थक होता है जब उसमें जनसाधारण की पर्याप्त भागीदारी होती है। वृद्धजनों की संख्या तो वास्तव में एक पारिवारिक समस्या है। घरेलू स्तर पर यदि इस समस्या के निवारण की पहल की जाय तो सरकारी प्रयास और भी अधिक प्रभावकारी भूमिका निभा सकेंगे।
अध्ययन से संबंधित शोध कार्य&
1- बंदनारानी द्वारा 1988(1) में वृद्धजन संस्थाएं तथा प्रथ्याक्षाएंः समाजशास्त्रीय परिप्रेक्ष्य में जनपद विजनौर का अध्ययन विभिन्न प्रकार के मानसिक रोगों से पीड़ित वृद्धजनों की स्थिति से सम्बंधित है। उन्होंने अपने अध्ययन में पाया कि मात्र 22.29 प्रतिशत वृद्धो की सामाजिक सांस्कृतिक संगठनो में सहभागिता है।
2- सुमनरानी सिन्हा ने 2007(2) में वृद्धजनों का समाजशा़स्त्रीय अध्ययन इलाहाबाद के सेवानिवृत्त की समस्याओं पर अपना शोध कार्य किया था। उनके अनुसार 18.34 प्रतिशत वृद्ध नींद कम आने के शिकार है तथा 16.66 प्रतिशत वृद्धजनों की स्मरण शक्ति कमजोर हो।
3- डॉ. अंजु शुक्ला का शोध कार्य वृद्धों की समस्याएं एक समाजशास्त्रीय अध्ययन विलासपुर नगर के विशेष संदर्भ में है।(3) जिसमें उन्होने पाया कि परिवार के सदस्यों द्वारा सम्मान में कमी तथा उपेक्षापूर्ण रवैया आदि उनकी प्रमुख समस्याएॅं थी।
4- सर इरूदया राजन मार्च 2010(4) ‘‘मोग्राफिग एजिंग एन्ड एम्प्लायमेन्ट इन इन्डिया‘‘ इन्होने ने अपने अध्ययन में पाया कि भारत के वृद्धों की जनसंख्या विश्व में दूसरे स्थान पर है। औसतन यह कहा जा सकता है कि 18 से 20 वर्ष में अधिकांश लोग 60 वर्ष से ऊपर के होंगें। जो कि 2051 में 298 लाख और 2101 में 500 सौ 5 लाख हो जाएगी। 2051 तक 20 प्रतिशत लोग वृद्ध होगें। इनमंे से 75 प्रतिशत ग्रामीण लोग होगे। 2001 की रिपोर्ट के अनुसार 30.1 प्रतिशत वृद्ध बिना साथी के जी रहे हैं जिनमें 15 प्रतिशत वृद्ध विधुर पुरूष हैं तथा 50.1 प्रतिशत विधवा है।
5- प्रो.महेश शुक्ला (समाजशास्त्र किया) ‘‘ग्रामीण वृद्धों की चुनौतियॉं‘‘ भारतीय समाज विज्ञान परिषद-ग्रामीण वृद्धों की समस्या से बढ़ रही है।(5) उपेक्षा तिरस्कार के सामाजिक के साथ आर्थिक और मनोवैज्ञानिक समस्यायें उन्हें बेचैन किये हुए है। शासन की बहुत सारी योजनाये है लेकिन अज्ञानता और असहायता के कारण से उनका लाभ नहीं पर रहे है।
शोध के उद्देश्य &
शोध के पीछे कोई न कोई उद्देश्य अवश्य होता है, क्योंकि उद्देश्य के बिना शोध दिशाहीन होता है। शोध के निम्नलिखित उद्देश्य है -
1. वृद्ध लोगों की पारिवारिक एवं आर्थिक समस्याओं का अध्ययन करना।
2. परिवार के सदस्यों और अन्य रिश्तेदारों द्वारा की जाने वाली देखभाल के संबंध में वृद्धों के विचारों को जानना।
3. वृद्ध लोगों की विभिन्न समस्याओं के कारणों के बारे में जानकारी प्राप्त करना।
4. वृद्ध लोगों की जीवन के प्रति नकारात्मक दृष्टिकोण के बारे में जानकारी प्राप्त करना।
5. वृद्ध लोगों की बीमारियों एवं उनके उपचार के बारे में जानकारी प्राप्त करना।
6. समाज में वृद्धों के देखभाल के प्रति लोगों में जागरूकता लाना।
उपकल्पना -
शोधार्थी द्वारा बनाई गई उपकल्पना इस प्रकार है &
1. वृद्ध लोगों को पारिवारिक एवं आर्थिक समस्याओं का सामना करने में कोई सार्थक अंतर नहीं पाया गया।
2. परिवार के सदस्यों और अन्य रिश्तेदारों द्वारा की जाने वाली देखभाल के संबंध में वृद्धों के विचारों में कोई सार्थक अंतर नहीं पाया गया।
3. वृद्ध लोगों की विभिन्न समस्याओं के कारणों के बारे में कोई सार्थक अंतर नहीं पाया गया।
4. वृद्ध लोगों की जीवन के प्रति नकारात्मक दृष्टिकोण के बारे में कोई सार्थक अंतर नहीं पाया गया। ।
अध्ययन पद्धति एवं उपकरण -
प्रस्तुत अध्ययन प्राथमिक एवं द्वितीयक समंको पर आधारित है। प्राथमिक समंकों के संकलन के लिए समय में से सविचार निदर्शन विधि द्वारा रीवा जिले के नगर पंचायत मऊगंज के वृद्धों की स्थिति के बारे में ‘‘ग्रामीण समाज में वृद्धों की समस्याओं’’ के अन्तर्गत जानकारी प्राप्त करने के लिए 50 सूचनादाताओं से साक्षात्कार अनुसूची, अवलोकन, आदि पद्धतियों का प्रयोग किया गया तथा सूचनाएं संकलित की गई, संकलित सूचनाओं का वर्गीकरण एवं विश्लेषण कर वैज्ञानिक निष्कर्ष निकाला गया प्रस्तुत शोध में आवश्यकतानुसार इंटरनेट का भी सहारा लिया गया है।
समाचार पत्र-पत्रिकाओं, लेखों, सरकारी रिकार्डो, तथा जनगणना आदि विभाग द्वारा भी द्वितीयक सामग्री संकलित की गई।
शोध क्षेत्र का संक्षिप्त विवरण:-
प्रस्तुत शोध में ‘‘वृद्धजनों की समस्या एवं परिवर्तनशील स्थिति’’ के बारे में अध्ययन किया गया है। जिला रीवा के जवा तहसील के संदर्भ में अध्ययन किया जो रीवा से 70 किलोमीटर दूर स्थित है जो एक नगर पंचायत है। जिसकी कुल जनसंख्या 26420 है, जिसमें से पुरुष 13589 एवं महिलाएँ 12831 है एवं 1000 पुरुषों के अनुपात में 940 महिलाएँ है। जवा नगर पंचायत जिला रीवा के 50 वृद्धजनों का चयन उद्देश्यपूर्ण दैव निदर्शन पद्धति के द्वारा किया गया है।
तथ्यों का विश्लेषण-
प्रस्तुत अध्ययन में तथ्यों के संकलन के पश्चात् प्राप्त तथ्यों को समानता एवं भिन्नता के आधार पर वर्गाकृत, सारणीयन कर कुछ महत्वपूर्ण निष्कषों का विश्लेषण किया गया है। वृद्धजनों में महिला एवं पुरूष दोनो ही पाये जाते है।
सारणी क्र. 01 -
सूचनादाताओं की लैंगित स्थिति को प्रदर्शित किया गया।
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1 |
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20 |
40% |
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2 |
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30 |
60% |
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50 |
100% |
उपर्युक्त तालिका से स्पष्ट है कि अध्ययन क्षेत्र में 60 प्रतिशत वृद्ध महिलाएॅ है और 40 प्रतिशत वृद्ध पुरूष है।
सारणी क्र. -02
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Ø- |
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1 |
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10 |
20% |
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2 |
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40 |
80% |
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50 |
100% |
उपर्युक्त तालिका से स्पष्ट है कि अध्ययन क्षेत्र में परिवार के वातावरण के स्थिति में शांतिपूर्ण 20 प्रतिशत है एवं कलहपूर्ण 80 प्रतिशत परिवार है।
सारणी क्र. -03
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6 |
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4 |
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22 |
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50 |
100% |
उपर्युक्त तालिका से स्पष्ट है कि अध्ययन क्षेत्र में आर्थिक स्थिति बहुत अच्छी 4 प्रतिशत, अच्छी 12 प्रतिशत, सामान्य 40 प्रतिशत, निम्न 44 प्रतिशत वृद्धो की स्थिति पायी गयी है।
सारणी क्र. 04 वृद्ध की आयु वर्ग की स्थिति
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Ø- |
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1 |
60&70 |
25 |
50% |
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2 |
70&80 |
15 |
30% |
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3 |
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10 |
20% |
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50 |
100% |
उपर्युक्त तालिका से स्पष्ट है कि अध्ययन क्षेत्र में वृद्धांे की आयु वर्ग की स्थिति से यह पता चलता है कि 60-70 वर्ष में 50 प्रतिशत, 70-80 में 30 प्रतिशत एवं 80 वर्ष से अधिक वृद्धांे की 20 प्रतिशत है।
सारणी क्र. 05 परिवारिक स्थिति
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Ø- |
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1- |
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12 |
24% |
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2- |
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38 |
76% |
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50 |
100% |
उपर्युक्त सारणी से स्पष्ट हो रहा है। कि संयुक्त परिवार 24 एवं एकांकी परिवार 76 पाया गया जिससे सिद्ध होता है कि संयुक्त परिवार का महत्व कम होता जा रहा है तथा एकांकी परिवार का औसत बढ़ता जा रहा है। तथा आज लोग एकांकी जीवन जीना पसंद करने लगे है।
अस्वस्थता के कारणों का विवरण&
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Ø- |
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1 |
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10 |
20 |
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2 |
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10 |
20 |
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3 |
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12 |
24 |
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4 |
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18 |
36 |
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50 |
100% |
परिवार में सामंजस्य न होने पर मानसिक दबाव को अपनी बीमारी का कारण बताया। आज पश्चिमीकरण, आधुनिकीकरण, औद्योगीकरण एवं नगरीकरण जैसी बहुआयमी प्रक्रियाओें ने संयुक्त परिवार की संरचना को छिन्न-भिन्न कर दिया है। फलस्वरूप परिवार तथा समाज के ढांचे मे वृद्धजन अवांछनीय हो गए है। वृद्धजनों का परिजनों द्वारा डांटना, धमकाना, गालियॉ देना, निंदा करना, उपहास करना, अपमान करना तथा मानसिक पीड़ा देना आदि असम्मानजनक स्थितियों के आदि कारण है। हम जानते है कि भारत में रहन-सहन, खाने-पीने की स्थिति का स्तर बहुत अच्छा नहीं है। इसके परिणास्वरूप वृद्धाअवस्था में अधिकांश वृद्धों का स्वास्थ्य बहुत अच्छा नहीं रहता है।
वृद्धावस्था की एक प्रमुख समस्या स्वास्थ्य संबंधी है हम जानते है कि भारत में रहन-सहन, खाने-पीने की स्थिति का स्तर बहुत अच्छा नहीं है। इसके परिणास्वरूप वृद्धाअवस्था में अधिकांश वृद्धों का स्वास्थ्य बहुत अच्छा नहीं रहता है।
निष्कर्ष:-
वृद्धजनों का परिवार में अभियोजन स्वयं में एक जटिल समस्या है जिसे संकलित तथ्यों के आधार पर विश्लेषित करने का प्रयास किया गया है। संकलित तथ्यों के विश्लेषण से यह भी स्पष्ट होता है कि परिवार के अन्तर्गत वृद्धजन अभियोजित न होने की स्थिति में विविध प्रकार के तनाव की स्थितियों का सृजन करते हैं जिससे वे स्वयं तो प्रभावित होते हैं, परिवार के सदस्य भी उससे प्रभावित होकर उसी के अनुरूप व्यवहार करते हैं। परिवार के सदस्यों के व्यवहार एवं विचार के मूल्यांकन के संदर्भ में तथ्यों के विश्लेषण से यह स्पष्ट होता है कि परिवार के सदस्य वृद्धों के साथ अǔछा व्यवहार नहीं करते हैं और यदि करते भी हैं तो उसमें उनकी स्वार्थपूर्ण बेवसी होती है। यह सार्वभौमिक सत्य कि वृद्धजनों की देख-रेख करने वालों के संदर्भ में पुत्र एवं पुत्री की भूमिका महत्वपूर्ण है। परिवार के सदस्यों के बीच तनाव एवं झगड़ा स्वार्थयुक्त आवश्यकताओं के कारण होता है। समुदाय और परिवार कल्याण सेवाएँ स्वयंसेवी संगठनों की सहायता से वृद्ध लोगों के किसी आय का साधन एवं राज्य सरकारों द्वारा दी गई वृद्धावस्था पेंशन की सहायता निरंतर दी जाती रहनी चाहिए।
आज भारत में जहां वृद्धो की संख्या तेजी से बढ़ रही हैं वही दूसरी ओर औद्योगीकरण, नगरीकरण, आधुनिकीकरण एवं पश्चिमीकरण ने, बच्चो में मॉं-बाप से जोड़े रखने वाले पुराने संस्कारो व रीतियों की बजाय आज का समाज अपना देखो, खाओ पियो की शैली अपना रहा है जो वृद्धों को दिन प्रतिदिन उपेक्षा का शिकार होने के लिए धकेल रहा है। लोगों में आज संस्कारों व स्थितियों मंे बदलाव तेजी के साथ हो रहा है। आज वृद्धों के सामने पारिवारिक, आर्थिक एवं मनोवैज्ञानिक समस्याएॅं दिन प्रतिदिन बढ़ती जा रही है, जो वृद्धांे के लिये असाध्य बीमारियों का कारण बनती जा रही है, जिससे वे जीवित रहने की इच्छा नहीं रख पा रहे है। इसलिए आज अनेक देशो में ‘‘मृत्यु का अधिकार’’ की मांग की जाने लगी है। इसके पीछे सबसे बड़ा कारण पारिवारिक उपेक्षा एवं प्राताड़ना उनकी सबसे बड़ी समस्या है।
1 समस्त वृद्धों को शासन द्वारा वृद्धापेश्ं ान दिलाने का प्रयास किया जाए।
2 वृद्धो के एकाकीपन दूर करने के लिए उनको मनोरंजन की व्यवस्था की जाए।
3 चिकित्सकीय सुविधा उपलब्ध कराने के लिये शासन द्वारा स्थानीय क्षेत्र में प्राथमिक एवं सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्रों की स्थापना एवं चिकित्सकों की अनिवार्यतः की जाए।
4 वृद्धो के स्वास्थ्य सम्बन्धी एवं व्यक्तिगत समस्याओं को जानने के लिए महीने में शिविरांे का आयोजन किया किया जाना चाहिए।
5 ठण्ड के दिनों में लिए वृद्धो के लिए गरम कपड़ो एवं अलाव की व्यवस्था की जाए।
6 वृद्धों के साथ परिवार में अǔछा व्यवहार किया जाना चाहिए।
7 सरकारी योजनाओं का लाभ यथा समय दिया जाना चाहिये।
8 वृद्धों को चलित स्वास्थ्य केन्ेों द्वारा निःशुल्क उपचार की सुविधा दी जानी चाहिए।
संदर्भ सूची &
1- बंदनारानी द्वारा 1988 में बृहजन संस्थाएं तथा प्रथ्याक्षाएंः समाजशास्त्रीय परिप्रेरय में जनपद विजनौर
2- सुमनरानी सिन्हा ने 2007 में वृद्धजनों का समाजशा़स्त्रीय अध्ययन इलाहाबाद के सेवानिवृत्त की समस्याओं पर
3- डॉ. अंजु शुक्ला का शोध कार्य वृद्धाओं की समस्याएं एक समाजशास्त्रीय अध्ययन विलासपुर नगर
4- सर इरूदया राजन मार्च 2010 ‘‘मोग्राफिग एजिंग एन्ड एम्प्लायमेन्ट इन इन्डिया‘‘
5- प्रो. महेश शुक्ल वैज्ञानिक अंक 22 गौरव प्रकाशन ‘‘ग्रामीण वृद्धों की चुनौतियॉं‘‘ भारतीय समाज विज्ञान परिषद
6- डॉ. मुकर्जी आर.के. (1995) सामाजिक सर्वेक्षण एवं शोध प्रकाशनः धीरज बुक्स 355, गॉधी मार्ग मेरठ, पृ. 101
7- मित्र, प्रताप नारायण: वृद्ध निबंध संकलित पाठ्य पुस्तक, साहित्य भारती, भाग-2
8- श्रीवास्तव, कृष्ण मोहन: पौराणिक मिथको में वृद्ध (आलेख) वैदिक नवस्वदेश अवकाश अंक 10 दिसम्बर 2005
9- सिद्दीकी सिराजुद्दीन: आपकी सेवा निवृत्ति उपलब्धि, प्रकाशन भारत पेंशनल समाज रीवा 1980
10- त्रिपाठी, विधि: सार्थक एवं आनन्दमय वृद्धावस्था के रहस्य भारतीय परिदृश्य में एक अध्ययन, कौटिल्य वर्ष 2 अंक षष्ठम्
11- चौरासिया, अनीता: ग्रामीण वृद्धों की समस्यायें, चोरगड़ी जिला रीवा विशेष सन्दर्भ में विन्ध्ययन रिचर्स जर्नल 2015.
12- डॉ. मदन जी.आर. (1970) समाज कार्य प्रकाशकरू विवेक प्रकाशक जवाहर नगर, दिल्ली, पृ. 45
13- डॉ. बघेल डी.एस. (1997) सामाजिक अनुसंधान, गायत्री पब्लिककेशन पू.15
14- डॉ. मुकर्जी आर. के. (1995) सामाजिक सर्वेक्षण एवं शोध प्रकाशकः धीरज धुक्स 355, गाँधी मार्ग मेरठ, पृ. 101
15 डॉ. अखिलेश एस. परिवार कल्याण गायत्री पब्लिकेशन रीवा (म.प्र.), पृ.19 16. स्मारिका प्रान्तीय सम्मेलन: भारत पेंशनर समाज रीवा 1990-91
17- शर्मा के.एल. ¼1991½ "A study of students stereo types towards aging" Indian Journal of Gerantology, 1 ¼1 o 2½ i`- 20&27 A
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Received on 16.03.2023 Modified on 31.03.2023 Accepted on 14.04.2023 © A&V Publication all right reserved Int. J. Rev. and Res. Social Sci. 2023; 11(1):17-23. DOI: 10.52711/2454-2687.2023.00003 |