भारतीय शिक्षा प्रणालीदृभूत, वर्तमान एवं भविष्य के सन्दर्भ में

 

डॉ. कुबेर सिंह गुरुपंच

प्राध्यापक एवं अधिष्ठाता, भारती विश्वविद्यालय, दुर्ग (..)

*Corresponding Author E-mail:

 

ABSTRACT:

प्रस्तुत अध्ययन भारतीय शिक्षा प्रणालीदृभूत, वर्तमान एवं भविष्य के सन्दर्भ में है यह द्वितीयक आकड़ों पर आधारित है इस अध्ययन में भारती शिक्षा प्रणाली के विभिन्न आयोगों के रिपोर्ट के आधार पर भूत, वर्तमान एवं भविष्य के बारे में विश्लेषण किया गया है। पहले की शिक्षा प्रणाली गुरुकुल शिक्षा प्रणाली थी लोग गुरुकुलों में जाकर अध्ययन करते थे वर्तमान में नयी शिक्षा प्रणाली में कौशल आधारित एवं रोजगार परख शिक्षा प्रणाली है एवं भविष्य में रोबोट एवं डिजिटल एवं मुख्य एवं ऑनलाइन शिक्षा प्रणाली संचालित होगी।

 

KEYWORDS: भारतीय शिक्षा प्रणाली।

 

 


INTRODUCTION:

उद्देश्य दृ

1. बालकों का शारीरिक एवं मानसिक विकास के साथ सर्वांगीण विकास पर जोर देना।

2. भूतकाल के शिक्षा प्रणाली के गुण दृ दोषों का विश्लेषण करना।

3. भविष्य की शिक्षा प्रणाली हेतु नीति निर्धारित करना।

4. शिक्षा प्रणाली के समस्याओं का समाधान करना।

 

हाल के दशकों में देश के आर्थिक, सामाजिक अन्य क्षेत्रों में ढाँचागत एवं नीतिगत स्तर पर काफी प्रगति हुई है। फलस्वरुप देश की विकास दर तेज़ी से बढ़ी है। इस बढ़ती विकास दर ने अन्य क्षेत्रों के साथ-साथ शिक्षा के क्षेत्र में भी सुधारों को गति प्रदान की है, लेकिन इन परिवर्तनों ने हमारी शिक्षा व्यवस्था की मूल समस्याओं को दूर नहीं किया है। प्रस्तुत लेख में हम वर्तमान शिक्षा व्यवस्था की विश्व में स्थिति, विद्यमान समस्याओं एवं संभावित समाधानों की चर्चा करेंगे।

 

दिल्ली में हुए एक हालिया अध्ययन से पता चला है कि शहर के केवल 54 प्रतिशत बच्चे ही कुछ वाक्य पढ़ सकते हैं। अनेक अध्ययनों से यह साबित हो चुका है कि विश्व में सीखने की दृष्टि से भारतीय बच्चे किसी अन्य देश से आगे हैं। उदाहरणस्वरूप अमेरिका में भारतीय अमेरिकी सबसे ज़्यादा शिक्षित समुदायों में से एक हैं।

समस्या- मुख्य समस्या शासन की गुणवत्ता (।इलेउंस फनंसपजल िळवअमतदंदबम) में कमी मानी गई है। शिक्षा प्रणाली ष्समावेशीष् नहीं है। शिक्षक प्रबंधन, शिक्षक की शिक्षा और प्रशिक्षण, स्कूल प्रशासन और प्रबंधन के स्तर पर कमी। पाठ्यक्रमों में व्यावहारिकता की कमी। स्कूल स्तर के आँकड़ों की अविश्वसनीयता। आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों (म्ॅै) के लिये किये गए प्रावधानों को लागू किया जाना। शिक्षा के अधिकार अधिनियम (त्ज्म्) को जमीनी स्तर पर लागू किया जाना इत्यादि। अवसंरचना का अभाव। शिक्षा संस्थानों की खराब वैश्विक रैंकिंग। प्रदान की गई शिक्षा और उद्योग के लिये आवश्यक शिक्षा के बीच अंतर। महंगी उच्च शिक्षा। लैंगिक मुद्दे। भारतीय बच्चों के लिये आधारभूत सुविधाओं की कमी।

 

समाधान - शिक्षा क्षेत्र में प्रौद्योगिकी को बढ़ावा देना। शिक्षकों के प्रशिक्षण की व्यवस्था करना। सरकारी खर्च को बढ़ाना। समावेशी शिक्षा प्रणाली पर ज़ोर देना। गुणवत्ता की शिक्षा को बढ़ावा देना। शिक्षा क्षेत्र में ढाँचागत विकास हेतु पीपीपी मॉडलको अपनाना। समावेशी शिक्षा नीति का निर्माण करना। सरकार द्वारा उठाये जा रहे कदम सरकार द्वारा शिक्षा व्यवस्था में सुधार लाने हेतुटी.आर. सुब्रह्मण्यम समितिका गठन किया गया थाद्य समिति ने शिक्षा क्षेत्र के लिये एक नया सिविल सर्विस कैडर बनाने, यूनिवर्सिटी ग्रांट कमीशन (न्ळब्) का उन्मूलन, कक्षा- तक निरोधक नीति (दव ंदक कमजमदजपवद चवसपबल) जारी रखना और प्राथमिक विद्यालय स्तर पर अंग्रेज़ी की शिक्षा देने जैसे अनेक महत्त्वपूर्ण सुझाव दिये थे। इस समिति के प्रावधानों को सरकार द्वारा अभी तक लागू नहीं किया गया है। सरकार ने हाल ही में भारतीय शिक्षा नीति को तैयार करने के लिये के. कस्तूरीरंगन समिति’ (ज्ञ. ज्ञंेजनतपतंदहंद) का गठन कियाद्य इस समिति का प्रमुख कार्य भारतीय शिक्षा व्यवस्था को समकालीन बनाने, उसकी गुणवत्ता में सुधार करने, शिक्षा के अंतर्राष्ट्रीयकरण तथा विदेशी विश्वविद्यालयों के भारत में प्रवेश जैसे कई महत्त्वपूर्ण प्रावधानों पर रोडमैप तैयार करना है। मनुष्य का जीवन गुणों और प्रतिभाओं का भंडार है और यदि किसी भी मनुष्य के आधारभूत गुणों या ईश्वर प्रदत्त प्रतिभाओं का पूर्ण सदुपयोग उसके जीवन में नहीं किया जाता तो उसके वो गुण और प्रतिभाएं व्यर्थ ही हो जाती हैं। हम अपने बाल्यकाल से एक ऐसी शिक्षा पद्धति की छत्र-छाया में पले-बढ़े जिसमें सब विद्यार्थी एक-दूसरे की देखादेखी कोर्स का चयन करते थे, उनकी प्रतिभाओं का आकलन शिक्षक करते थे, ही अभिभावकों की ही दूरदृष्टि इस ओर जाती थी, या तो इंजीनियरिंग या मेडिकल या चार्टर्ड अकाउंटेंट या साधारण ग्रेजुएट होकर नौकरी ढूंढ़ने की प्रथा थी। शिक्षा प्रणाली कुछ ऐसी थी जो प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से अवरोध उत्पन्न करती थी- मूल चिंतन और विचारधारा के विकास में अवरोध, काल्पनिक और नए वैचारिक और मानसिक शक्ति के विकास में अवरोध, मनुष्य की मूलभूत प्रतिभाओं के विकासीकरण में अवरोध। देश के उज्ज्वल भविष्य के लिए और सजग, विचारशील और नवीनतम आयामों को ग्रहण करने वाले एक सशक्त युवा वर्ग के निर्माण के लिए बहुत आवश्यक था कि विषयों की जानकारी के साथ-साथ बच्चे समस्या समाधान, तार्किक और रचनात्मक रूप से सोचना सीखें, नया सोचें, अपने विचारों को विस्तृत करें। शिक्षण प्रक्रिया शिक्षार्थी केंद्रित, जिज्ञासा, खोज, संवाद के आधार पर लचीली हो, समग्र हो। नई शिक्षा नीति का लक्ष्य है- शिक्षार्थी का संपूर्ण विकास जिसे साक्षरता, संख्याज्ञान, तार्किकता, समस्या समाधान, नैतिक, सामाजिक, भावनात्मक मूल्यों के विकास के द्वारा सम्भव किया जा सके।

 

ज्ञान, प्रज्ञा, सत्य की खोज भारत के प्राचीनतम शिक्षा पद्धतियों के आधार हैं जिनकी लौ के प्रकाश में नई शिक्षा पद्धति का ढांचा बहुत संयम और धैर्य से बिल्कुल वैसे ही गढ़ा जा रहा है राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के मुख्यतः 4 भाग हैं और इसके कार्यान्वयन की पूर्णता का लक्ष्य वर्ष 2030 है ताकि वर्ष 2015 में अपनाए गए सतत विकास एजेंडा के अनुसार विश्व में वर्ष 2030 तक सभी के लिए सार्वभौमिक, गुणवत्तायुक्त सतत शिक्षा और जीवन पर्यंत शिक्षा के अवसरों को बढ़ावा दिए जाने का लक्ष्य प्राप्त किया जा सके। ये चार भाग हैं- स्कूल शिक्षा, उच्चतर शिक्षा, अन्य केंद्रीय विचारणीय मुद्दे और क्रियान्वयन की रणनीति। स्कूली शिक्षा में बदलाव स्कूल शिक्षा में मुख्य परिवर्तन ये किया जा रहा है जिसमें वर्तमान की 10$2 वाली स्कूल व्यवस्था (जो कि 6 वर्ष की आयु से आरंभ होती थी) को 3 वर्ष से 18 वर्ष की आयु के बच्चों के लिये नए शैक्षणिक और पाठ्यक्रम के आधार पर 5$3$3$4 की एक नई व्यवस्था का पुनर्गठन किया जाएगा। 3 से 5 वर्ष तक फाउंडेशनल, अगले 3 वर्ष प्रीपरेटरी, अगले 3 वर्ष मिडिल और अंतिम चार वर्ष सेकंडरी ढांचे को दिए जाएंगे। 3 वर्ष के बच्चों के लिए प्रारंभिक बाल्यावस्था देख-भाल और शिक्षा (.सी.सी.- अर्ली चाइल्डहुड केयर एंड एजुकेशन) की एक मजबूत बुनियाद को इस नई शिक्षा नीति में शामिल किया जा रहा है, जिससे कि सही दिशा में सीखने की सही नींव डाली जा सके। स्कूल शिक्षा नीति में इन विभिन्न आयामों पर नए मापदंड लगाए जाएंगे डिजिटल इन्फ्रास्ट्रक्चर फॉर नॉलेज शेयरिंग (दीक्षा) पर बुनियादी साक्षरता और संख्या ज्ञान पर उच्चतर गुणवत्ता वाले संसाधनों का एक राष्ट्रीय भंडार उपलब्ध कराया जाएगा। स्थानीय पुस्तकालयों में सभी भारतीय और स्थानीय भाषाओं की पुस्तकें पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध कराई जाएंगी जिससे बाल्यकाल से ही पाठ्यक्रम की पुस्तकों के अतिरिक्त भी अच्छा साहित्य पढ़ने की आदत का विकास हो सके। स्कूल शिक्षा नीति में इन विभिन्न आयामों पर नए मापदंड लगाए जाएंगे- प्रारम्भिक बाल्यावस्था देखभाल और शिक्षा, बुनियादी साक्षरता और संख्याज्ञान, ड्रॉप आउट बच्चों की संख्या घटाना और सभी स्तरों पर शिक्षा को सार्वभौमिक बनाना, विद्यालयों में पाठ्यक्रम और शिक्षण, शिक्षकों के लिए नए निर्णय, समतामूलक और समावेशी शिक्षा, स्कूल कॉम्प्लेक्स/क्लस्टर के माध्यम से कुशल संसाधन और प्रभावी गवर्नेंस, स्कूल की शिक्षा हेतु मानक निर्धारण और प्रमाणन। उच्चतर शिक्षा में बदलाव युवाओं के लिए उच्चतर शिक्षा का एक मुख्य उद्देश्य युवा को समाज और देश की समस्याओं के लिए प्रबुद्ध, जागरूक, जानकार और सक्षम बनाना है ताकि युवा नागरिकों का उत्थान कर सकें और समस्याओं के सशक्त समाधान ढूंढ कर और उन समाधानों को कार्यान्वित करके एक प्रगतिशील, सुसंस्कृत, उत्पादक, प्रगतिशील और समृद्ध राष्ट्र का प्रतिनिधित्व कर सकें। शोध गहन विश्वविद्यालय शोध को महत्व देने वाले होंगे जबकि शिक्षक गहन विश्वविद्यालय गुणवत्ता पूर्ण शिक्षण के साथ-साथ महत्वपूर्ण अनुसंधान का संचालन भी करेंगे। स्वायत्त डिग्री देने वाले कॉलेज स्नातक शिक्षण पर केंद्रित रहेंगे, ये तीनों ही संस्थान एक निरंतरता के साथ होंगे। अभी देश में एच.ईआई. का नामकरण विभिन्न नामों से है जिसे मानकों के अनुसार मापदंड पूरा करने पर केवल श्विश्वविद्यालयश् के नाम से प्रतिस्थापित कर दिया जाएगा। कौशल विकास पर जोर देती नई शिक्षा नीति भारत में समग्र और बहु विषयक शिक्षा की प्राचीन परंपरा है, ज्ञान का विभिन्न कलाओं के रूप में दर्शन भारतीय चिंतन की देन है जिसे पुनः भारतीय शिक्षा में शामिल किया जाएगा, इसका एक बहुत महत्वपूर्ण प्रभाव ये होगा कि युवाओं के लिए कभी भी भविष्य में अर्थाेपार्जन का कोई रास्ता बंद नहीं होगा और वो अपने संपूर्ण ज्ञान का प्रयोग स्वयं के व्यक्तिगत विकास में, सामाजिक और राष्ट्र के विकास में कर पाएंगे। उच्चतर शिक्षा संस्थानों को विभिन्न स्नातकोत्तर कार्यक्रमों की छूट दी जाएगी जैसे 3 वर्ष के स्नातक डिग्री वाले विद्यार्थियों के लिए 2 वर्षीय कार्यक्रम, 4 वर्ष के शोध स्नातक विद्यार्थियों के लिए एक वर्षीय स्नातकोत्तर कार्यक्रम और 5 वर्ष का एकीकृत स्नातक कार्यक्रम हो सकते हैं। सीखने की आकर्षक और सहायक पद्धतियों के लिए विभिन्न पहल की जाएंगी जैसे कि उच्चतर शिक्षा में नई रचनात्मकता लाने के लिए पद्धति में नवाचार और लचीलापन लाना होगा और सी.बी.सी.एस. (चॉयस बेस्ड क्रेडिट सिस्टम) का संशोधन करना होगा। उसकी जगह एक मानदंड आधारित ग्रेडिंग प्रणाली का निर्माण होगा जो प्रत्येक कार्यक्रम के लिए सीखने के लक्ष्यों के आधार पर छात्रों की उपलब्धियों का आकलन करेगा जिससे एक निष्पक्ष प्रणाली बन सकेगी। दूसरा, छात्रों में गुणवत्ता पूर्ण आदान प्रदान हेतु विभिन्न क्लब और गतिविधियां कराई जाएंगी, जिससे कि एक स्वतंत्र माहौल में शिक्षकों का संबंध विद्यार्थियों के मार्गदर्शक और संरक्षक के रूप में भी हो। तीसरा, आर्थिक रूप से वंचित पृष्ठभूमि के छात्रों को आर्थिक सहायता ही नहीं अपितु उनके शारीरिक, मानसिक और भावनात्मक कल्याण को बेहतर बनाने हेतु परामर्शदाता नियुक्त किए जाएंगे। चौथा, ओपन एंड डिस्टेंस लर्निंग और ऑनलाइन शिक्षा की गुणवत्ता के लिए रूपरेखा तैयार करके नवीनीकृत किया जाएगा। और अंत में सारे कार्यक्रमों का यही लक्ष्य होगा कि सभी कार्यक्रम गुणवत्ता के वैश्विक मानकों को प्राप्त कर पाएं, इससे एक बहुत बड़ा देश को लाभ ये होगा कि युवा वर्ग दूसरे देशों की ओर कम आकर्षित होंगे और देश की प्रतिभाओं का सदुपयोग देश के विकास के लिए हो पाएगा। सशक्त शिक्षा नीति विकास का आधार अन्तर्राष्ट्रीय विद्यार्थियों को भी भारत के शिक्षण संस्थान आकर्षित करेंगे और भारत विश्वगुरु के रूप में अपनी नई पहचान बना पाएगा। युवा वर्ग का आत्मविश्वास बढ़ेगा और वो वैश्विक स्तर पर विभिन्न चुनौतियों का सामना निर्भीकता से कर पाएंगे। किसी भी देश के विकास, संपन्नता और सुदृढ़ सांस्कृतिक विकास का आधार सशक्त शिक्षा नीति होती है और नई शिक्षा नीति ऐसे सभी पहलुओं को लेकर चलेगी जिससे कि सारे ऊंचे मानकों पर स्वयं को स्थापित कर सके। भारत की नई शिक्षा नीति का विज़न युवा वर्ग के व्यक्तित्व का विकास इस प्रकार करना है कि उनमें अपने मौलिक दायित्वों, संवैधानिक मूल्यों, देश के साथ जुड़ाव, बदलते विश्व में नागरिक की भूमिका और उत्तरदायित्वों की जागरूकता उत्पन्न हो सके। सही मायने में वो वैश्विक नागरिक बनकर अपने ज्ञान, कौशल, मूल्यों का सदुपयोग करते हुए देश का नाम सतत ऊंचा कर सकें और साथ ही स्वयं भी गौरवान्वित हो सकें। आजकल के युग में अगर इंसान शिक्षित ना रहा तो उसे जीवन बिताने में कठिनाई हो सकती है। पढ़ाई करना इंसान के जीवन में बहुत जरूरी होता है। गरीब से गरीब आदमी भी अपने बच्चों को पढ़ा लिखा कर अफसर बनाने का सपना देखता है। और अगर कोई बच्चा ठान ले तो बहुत पढ़ लिखकर डॉक्टर, वकील, जज या नचेब की परीक्षा देकर बड़ा अफसर बन सकता है। आजकल के युग में अगर इंसान शिक्षित ना रहा तो उसे बाहर की दुनिया में कोई इज्जत नहीं देगा उसका सम्मान नहीं करेगा। हमारे देश में ऐसे भी लोग है जो बेटी को पढ़ाने में नहीं मानते और अपने बेटों को बहुत पढ़ाते है। हमें जीवन में सबको ध्यान में रखना ही चाहिए। भारत में लड़कियों की शिक्षा का प्रमाण लड़कों से कम है। भारत देश में आज भी अशिक्षित लोगों का प्रमाण 23 प्रतिशत है। इसलिए हमारे देश की गिनती आज भी डिवेलपिंग कंट्रीज़ में की जाती है। पर हर बार माता पिता का दोष नहीं होता, जैसे की इस ब्लॉग की शुरुआत में कहा गया है कि गरीब से गरीब आदमी भी अपने बच्चों को पढ़ा लिखा कर अफसर बनाने का सपना देखता है, पर उस इंसान की जिंदगी में ऐसे कुछ हालात आते है जो ऐसा होने की अनुमति नहीं देते। कई गरीब लोगों के पास दो वक्त की रोटी खाने के पैसे भी नहीं होते तो ऐसे हालात में वो माँ बाप अपने बच्चे को कैसे पढ़ाएं लिखाए। हमारे देश में गरीबी का प्रमाण ज्यादा है जिसके कारण कोई माता पिता चाह कर भी अपने बच्चों को स्कूल, कॉलेज नहीं भेज पाते। आधुनिक युग आज इतनी तेज़ी से चल रहा है कि इस इस युग को आधुनिकता का क्रांतिकारी युग बोला जा सकता है।किसी भी समय में बदलाव अपने आप नहीं आते, बदलाव लाए जाते हैं और इनके पीछे की यह प्रक्रिया शिक्षा के बिना असंभव है। आधुनिक युग में शिक्षा का महत्व पहले की तुलना में काफी बढ़ गया है।लोगों को अपना जीवन जीने में और अपने जीवन स्तर को ऊंचा उठाने के लिए शिक्षा की काफी जरूरत है। शिक्षा जीवन को बेहतर बनाने वाली संभावनाओं तक पहुँचती है। आज सिर्फ ज्ञान प्राप्त करना ही काफी नहीं, औद्योगिकरण के युग में ज्ञान के प्रयोग पर अधिक बल दिया जाता है। इसे व्यावहारिक ज्ञान कहा गया है। इसलिए शिक्षा के साथ-साथ विभिन्न व्यावसायिक प्रशिक्षण भी दिए जाते हैं। जिससे बच्चे छात्र जीवन में ही अपने व्यावसायिक समस्याओं के समाधान प्राप्त कर कुशल कर्मचारी बन सके। आधुनिक युग में विकसित होती सभ्यता तथा मशीनीकरण ने जहां एक और मनुष्य का काम कम किया है। वहीं दूसरी ओर लोग बेरोज़गार भी हुए हैं। वर्तमान समय में शिक्षा के द्वारा आत्मनिर्भर बनने की मुहिम चलाई जा रही है।इससे ना सिर्फ नए रोज़गार के अवसर प्राप्त होंगे बल्कि नए व्यवसाय कार्य क्षेत्र के मार्ग भी खोजे जाएँगे। शिक्षा समाज में आवश्यकता से बढ़कर एक मापदंड बन गई है। समाज में उन्हीं लोगों को सम्मान की दृष्टि से देखा जाता है, जिन्होंने अच्छी शिक्षा प्राप्त की है। इसलिए कहा जा सकता है कि आधुनिक युग में शिक्षा बहुत आवश्यक है। शिक्षा मनुष्य के अंदर अच्छे विचारों को लाती है और बुरे विचारों को बाहर करती है। शिक्षा मनुष्य के जीवन का मार्ग दिखाती है। यह मनुष्य को समाज में प्रतिष्ठित काम करने के लिए प्रेरणा देती है। इससे मनुष्य के अंदर मनुष्यता आती है। इसके माध्यम से मानव समुदाय में अच्छे संस्कार डालने में पर्याप्त मदद मिलती है।शिक्षा मनुष्य को पशु से ऊपर उठाने वाली प्रक्रिया है। पशु अज्ञानी होता है उसे सही या ग़लत का बहुत कम ज्ञान होता है। माता पिता भी अपने बच्चो को डॉक्टर, इंजीनियर, वकील, जज बनाने की सोचते है। बच्चों और माता पिता के ऐसे सब लक्ष्य शिक्षा द्वारा ही प्राप्त हो सकते है। सभी माता पिता अपने बच्चों को सफलता की ओर जाते हुए देखना चाहते हैं, जो केवल अच्छी और उचित शिक्षा के माध्यम से ही संभव है। जीवन में सफलता प्राप्त करने और कुछ अलग करने के लिए शिक्षा सभी के लिए एक बहुत महत्वपूर्ण साधन है।शिक्षण प्रक्रिया के दौरान हमें प्राप्त हुआ ज्ञान हम सभी को अपने जीवन में आत्मनिर्भर बनाता है। यह हमारे जीवन को बेहतर बनाता है और हमें एक अच्छा जीवन बिताने में मदद करता है। ग्रामीण क्षेत्र में शिक्षा के महत्व को बढ़ावा देने के लिए सरकार द्वारा बहुत से जागरूकता अभियान चलाए जा रहे हैं। आज के समाज में शिक्षा का महत्व काफी बढ़ चुका है। शिक्षा के उपयोग तो अनेक हैं परंतु उसे नई दिशा देने की आवश्यकता है। शिक्षा इस प्रकार की होनी चाहिए कि एक व्यक्ति अपने वातावरण से परिचित हो सके। शिक्षा हम सभी के उज्ज्वल भविष्य के लिए बहुत आवश्यक है। हम अपने जीवन में शिक्षा के इस साधन का उपयोग करके अच्छी चीजें प्राप्त कर सकते हैं। शिक्षा का समय सभी के लिए सामाजिक और व्यक्तिगत रूप से बहुत महत्वपूर्ण समय होता है, यहीं कारण है कि हमें शिक्षा हमारे जीवन में इतना महत्व रखती है। जीवन में सफलता प्राप्त करने और कुछ अलग करने के लिए शिक्षा सभी के लिए एक बहुत महत्वपूर्ण साधन है। यह हमें जीवन के कठिन समय में चुनौतियों से सामना करने में सहायता करता है। शिक्षा स्त्री और पुरुषों दोनों के लिए समान रूप से आवश्यक है, क्योंकि स्वास्थ्य और शिक्षित समाज का निर्माण यह दोनों मिलकर ही कर सकते हैं। यह उज्ज्वल भविष्य के लिए आवश्यक होने के साथ ही देश के विकास और प्रगति में भी बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। इस तरह, उपयुक्त शिक्षा दोनों के उज्ज्वल भविष्य का निर्माण करती है। वो केवल शिक्षित नेता ही होते हैं, जो एक राष्ट्र का निर्माण करके, इसे सफलता और प्रगति के रास्ते की ओर ले जाते हैं। दूरस्थ शिक्षा प्रणाली के प्रयोग के कारण, आजकल शिक्षा प्रणाली बहुत साधारण और आसान हो गयी है। आधुनिक शिक्षा प्रणाली, शिक्षा और समानता के मुद्दे को विभिन्न जाति, धर्म जनजाति के बीच से पूरी तरह से हटाने में सक्षम है। शिक्षा जहाँ तक संभव होता है उस सीमा तक लोगों बेहतर और सज्जन बनाने का कार्य करती है। आजकल के समय में शिक्षा के स्तर को बढ़ाने के लिए बहुत सारे तरीके अपनाए जाते हैं।आज के आधुनिक संसार में शिक्षा काफी अहम है। वर्तमान समय में शिक्षा का पूरा तंत्र अब बदल चुका है। शिक्षा बहुत महंगी नहीं है, कोई इंसान कम धन होने के बावजूद भी अपनी पढ़ाई जारी रख सकता है। दूरस्थ शिक्षा के माध्यम से हम आसानी से किसी भी बड़े और प्रसिद्ध स्कूल, कॉलेज में बहुत कम शुल्क में प्रवेश ले सकते हैं। अन्य छोटे संस्थान भी किसी विशेष क्षेत्र में कौशल को बढ़ावा देने के लिए शिक्षा प्रदान कर रहे हैं।शिक्षा लोगों के मस्तिष्क को उच्च स्तर पर विकसित करने का कार्य करती है और समाज में लोगों के बीच सभी भेदभावों को हटाने में मदद करती है। आदरणीय मान्यवर, मेरे सम्मानीय अध्यापक और मेरे प्यारे मित्रों को सुप्रभात। मैं इस महान अवसर पर आप सभी के सामने शिक्षा के महत्व के विषय पर भाषण देना चाहता/चाहती हूँ। शिक्षा हम सभी के लिए बहुत महत्वपूर्ण है। हमारे माता-पिता हमें घर पर ही बहुत सी चीजें सिखाते हैं और फिर 3 साल का होने के बाद स्कूल भेजते हैं। हमारा घर ही हमारा पहला शैक्षणिक संस्थान है, जहाँ हम दूसरों के साथ व्यवहार करना, और अन्य कौशलों को सीखते हैं हालांकि, व्यवहारिक जीवन में सफल होने के लिए स्कूल की शिक्षा बहुत आवश्यक है। स्कूली शिक्षा के माध्यम से ही, हम व्यक्तित्व, मानसिक कुशलता, नैतिक और शारीरिक शक्ति का विकास करना सीखते हैं। बिना उचित शिक्षा के, एक व्यक्ति अपने जीवन के सभी शैक्षिक लाभों से वंचित रह जाता है। शिक्षा निजी और पेशेवर जीवन में सफलता की इकलौती कुंजी है। शिक्षा हमें विभिन्न प्रकार का ज्ञान और कौशल को प्रदान करती है। यह सीखने की निरंतर, धीमी और सुरक्षित प्रक्रिया है, जो हमें ज्ञान प्राप्त करने में मदद करती है। यह निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है, जो हमारे जन्म के साथ ही शुरु हो जाती है और हमारे जीवन के साथ ही खत्म होती है।हमें अपने अंदर पूरे जीवन भर अपने अध्यापकों, अभिभावकों, परिवार के सदस्यों और हमारे जीवन से संबंधित अन्य व्यक्तियों से कुछ ना कुछ सीखने की आदत डालनी चाहिए। हम एक अच्छा व्यक्ति बनने, घर, समाज, समुदाय और दोस्तों में रहने के लिए कुछ ना कुछ सीखते रहते हैं। स्कूल जाना और शिक्षा ग्रहण करना प्रत्येक व्यक्ति के लिए बहुत महत्वपूर्ण है और जो सफलता प्राप्त करना चाहते हैं उनके लिए बहुत आवश्यक है।हम सभी ने एक ही ढंग से, एक ही ग्रह पर जन्म लिया है हालांकि, धन की कमी और अभिभावकों के ज्ञान के अभाव के कारण इस तरह की औपचारिक शिक्षा के लिए एक समान अवसर नहीं मिलता जो सभी का सफलता की ओर नेतृत्व कर सके। जो व्यक्ति उचित शिक्षा प्राप्त करता है वो परिवार, समाज और देश में प्रशंसा के योग्य होता हैं। सभी के लिए उचित शिक्षा लोगों के बीच में समानता लाकर सभी प्रकार के भेदभावों को हटाती है। शिक्षा हमें केवल इतिहास, विज्ञान, गणित, भूगोल और अन्य विषयों को सीखने योग्य बनाती हैं हालांकि, यह हमें ये भी सिखाती है, कि जीवन में बुरी स्थितियों को कैसे संभाला जाये।हमारे देश में सब लोग शिक्षित होने चाहिए उसका अहम उद्देश्य यह है की हमारे देश को प्रगति और सफलता मिले। जैसे की इस ब्लॉग में पहले बताया गया है कि आज भी हमारे देश के 23 प्रतिशत लोग शिक्षित नहीं है। अगर हमारे देश की 100 प्रतिशत आबादी शिक्षित हो जाएगी तो हमारे देश की ज़्यादा से ज़्यादा प्रगति होगी। शिक्षा हमारे जीवन को अच्छा बनाती है। शिक्षा हमें एक खुशहाल जिंदगी बिताने में मदद करती है। गरीब आदमी को भी कम से कम स्कूल तक की शिक्षा प्राप्त करनी चाहिए, स्कूल का शिक्षण ज़िंदगी में अति आवश्यक होता है।

 

शिक्षा से मानवीय गुणो का विकास - शिक्षा से मानवीय गुणो का विकास अधिक मात्रा में बढ़ गया है। अगर कोई इंसान शिक्षित होगा तो बाकी लोग उसकी इज्जत करते है और शिक्षित आदमी का समाज में एक अलग स्थान होता है। हमें शिक्षित होने के कारण अच्छी नौकरी मिलती है और हमें अच्छी पगार भी मिलती है। उसके कारण हम एक अच्छा जीवन बिता सकेंगे। कोई भी इंसान पढ़ाई करने की वजह से एक खुशहाल जीवन और अपने देश का विकास खंडित कर रहा है। हमारे देश में केरल राज्य में लोगों की शिक्षा का प्रमाण सबसे अधिक है। भारत देश में बहुत बड़ी-बड़ी यूनिवर्सिटी है। बिना शिक्षा प्राप्त किये कोई व्यक्ति अपनी परम ऊँचाइयों को नहीं छू सकता। शिक्षा ने ऐसी बहुत बड़ी आबादी पैदा की है जो पढ़ तो सकती है पर ये नहीं पहचान सकती की क्या पढ़ने लायक है।वो जो स्कूल के दरवाजे खोलता है, जेल के दरवाजे बंद करता है।जिम्मेदारी इंसान को शिक्षित करती है। शिक्षा का उद्देश्य है युवाओं को खुद को जीवन भर शिक्षित करने के लिए तैयार करना। सच है, अल्प ज्ञान खतरनाक है,पर फिर भी ये पूर्ण रूप से अज्ञानी होने से बेहतर है।जब कोई विषय पूरी तरह से अप्रचलित हो जाता है तो हम उसे आवश्यक पाठ्यक्रम बना देते हैं।शिक्षा का मकसद है एक खाली दिमाग को खुले दिमाग में परिवर्तित करना। जो आपने सीखा है उसे भूल जाने के बाद जो रह जाता है वो शिक्षा है। शिक्षा स्वतंत्रता के स्वर्ण द्वार खोलने की चाबी है।

 

निष्कर्ष दृ

बच्चों के भविष्य को सही राह दिखाने एवं देश में समावेशी विकास को बढ़ावा देने हेतु यह आवश्यक है कि शिक्षा व्यवस्था को चुस्त-दुरुस्त किया जाए। अतरू हमें अन्य सुधारों के साथ-साथ उचित प्रशासन मानकों, सरकार द्वारा पर्याप्त प्रोत्साहन और चेक और बैलेंस की नीति अपनाने की ज़रूरत है। भारत में शिक्षा प्रणाली बहुत आगे बढ़ चुकी है और इसे पूरी तरह से प्रभावी मानने में अभी समय लगेगा। स्थिति में सुधार के लिए सरकार और अन्य संगठनों को ध्यान में रखकर कई पहल की जाती हैं। समय और निरंतर प्रयास के साथ, भारत की शिक्षा प्रणाली अपने नागरिकों की अपेक्षाओं को पूरा करने वाली मानी जाती है।

 

सन्दर्भ सूची दृ

1.   https:@@en-wikipedia-org@wiki@Education&in&India

2.   https:@@byjus-com@free&ias&prep@indian&education&system&issues&and&challenges@       

3.   https:@@www-gnu-org@education@edu&system&india-en-html

4.   Women*s Education in India

5.   Education as a Civilizing Mission

6.   CBSE – Central Board of Secondary Education

7.   Planning For Development

8.   Role of Education in Economic Development

 

 

 

Received on 20.10.2023        Modified on 08.11.2023

Accepted on 26.11.2023        © A&V Publication all right reserved

Int. J. Rev. and Res. Social Sci. 2023; 11(4):297-302.

DOI: 10.52711/2454-2687.2023.00050