Author(s): संजु साहू, रमेश अनुपम

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Address: संजु साहू1, डाॅ. रमेश अनुपम2 1शोध छात्रा , दू.ब स्वशासी महिला स्ना. महा. रायपुर (छ.ग.) (पं. रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय रायपुर (छ.ग.) के अंतर्गत) 2शोध निर्देशक, दू.ब स्वशासी महिला स्ना. महा. रायपुर (छ.ग.) (पं. रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय रायपुर (छ.ग.) के अंतर्गत)

Published In:   Volume - 4,      Issue - 4,     Year - 2016


ABSTRACT:
तेजिंदर के उपन्यास ‘‘कालापादरी‘‘ समकालीन हिन्दी साहित्य उपन्यास जगत में अपने आप में विलक्षण है। ‘‘काला पादरी’’ हिन्दी उपन्यास परम्परा से हटकर समाज की कुव्यवस्था पर तीखा प्रहार व कुरूपता का चेहरा उजागर करने वाला बेजोड़ दस्तावेज है। ‘‘कालापादरी’’ में जेम्स खाका की अंतर्मन की संवेदनाओं को उपन्यासकार ने पूरी दक्षता से उभारा है। अंततः उपन्यास की तार्किक परिणिती जेम्स खाका के उस निर्णय में होती है जो उसे धर्म की चाकरी से मुक्त करता है और वह चर्च की संडे की प्रार्थना मेें शामिल होने के बजाए अपनी महिला मित्र सोंजेलिन मिंज के साथ बाजार जाने का निर्णय लेता है। ‘‘कालापादरी’’ की अंर्तवस्तु वर्तमान समय की अत्यंत संवेदनशील अंर्तवस्तु है इसमें व्यक्ति और समाज के भौतिक जीवन की संवेदनात्मक व मानवीय पहलू का सजग चित्रण है। निः संदेह कालापादरी के माध्यम से तेजिंदर ने उपन्यास जगत को गौरवन्वित किया है। युग कोई भी क्यों ना हो उपन्यास सदैव ही समाज का स्पंदन रहा है। उसमें व्यक्ति, विचार, समाज की प्रथाए, परंपराएं चेतना का सजग चित्रण मिलता है। इस प्रकार वातावरण समाज परिवेश उपन्यासकार के चिंतन एवं उसके अनुभुतियों को प्रभावित करता है। ऐसी ही अभिव्यक्ति हमें तेजिंदर की अद्भुत कृति ‘‘कालापादरी’’ उपन्यास में देखने को मिलती है। तेजिंदर का यह उपन्यास मानव जीवन का जीवंत साक्ष्य है। सन् 2000 में आयी, तेजिंदर की इस उपन्यास में एक ऐसे सहित्यिक विषय को स्पर्श किया गया है जो अपने आप में किसी बीहड़ से कम नहीं है और उपन्यासकार की विशेषता ही जटिलता और बीहड़ता की ओर रूख करना है इस तरह भूखमरी जो इस अंचल में मुंह फाड़ के बैठी है को बड़ी ही संवेदनात्मक ढंग से प्रस्तुत किया गया है और एक प्रश्न दाग दिया गया है। कि भूख हमेशा दलित या आदिवासी की क्यों होती है ?


Cite this article:
संजु साहू, डाॅ. रमेश अनुपम. कालापादरी’’ एक अप्रतिम उपन्यास (आज के संदर्भ में). Int. J. Rev. and Res. Social Sci. 4(4): Oct.- Dec., 2016; Page 233-236.


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