Author(s): गजेन्द्र कुमार, किशोर कुमार अग्रवाल

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Address: गजेन्द्र कुमार1, डॉ० किशोर कुमार अग्रवाल2
1शोधार्थी, शा० वि० या० ता० स्ना० स्वशासी महा०, दुर्ग (छ० ग०)
2प्राध्यापक, डॉ० खूबचंद बघेल शास० स्ना० महा०, भिलाई-3 जिला-दुर्ग (छ० ग०)
*Corresponding Author

Published In:   Volume - 6,      Issue - 4,     Year - 2018


ABSTRACT:
बैगा जनजाति का अपना आदिम संगीत है। ये त्यौहार विवाह एवं अनेक पर्व में नाच-गान करते है। बैगा जनजाति के लोग दशहरा से वर्षारंभ तक नाच-गान करते है। ये बिना श्रृंगार के नृत्य नही करते है, नृत्य के लिए विशेष वेशभूषा होती है। बैगा कुछ नृत्य-गीत को स्त्री-पुरुष दोनों मिलकर समुह में करते है। नृत्य-गीत के समय पुरुष कमर में लहंगेनुमा घेरेदार साया पहनते है। शरीर में सलूखा (कमीज) तथा काली जाकिट पहनते है। सिर पर चकनुमा पगड़ी, उसपर ‘मोर पंख कलगी’, गले में विभिन्न रंगों की मूंगा मालाएं, गिलट या पीतल के सिक्कों से बने ‘रूपया’ तथा कानों मे मुंगे-मोतियों के बाले पहनते है। तथा पैरों मे लोहे या पीतल के पैजन पहनते है। पीठ पर लाल नीली छिट का पिछोरा बांधते है। हांथ में ठिसकी होती है। वहीँ स्त्रियाँ नृत्य के लिए शरीर पर मुंगी लुगरा पहनती है। युवतियां बालों को अधिक सजाती है। सिर के जुड़े मे मोर पंख की कलगी खोसती है। बगई घांस के छोटे-छोटे छल्लों को मिलाकर बनाया गया सांकल नुमा ‘लाद्दा’ का गुच्छा जुड़े में बांधती है, जो कमर तक लटकता है। गले मे रंग बिरंगे माला, कानों मे तरकल और मुंगों की बाली, हाथों में गिलट के चूरे, अँगुलियों में मुंदरी पैरों मे पैरी या पैजन, पैर के अँगुलियों में चुटकी इत्यादि प्रकार के श्रृंगार करके नृत्य-गीत करती है।


Cite this article:
गजेन्द्र कुमार, किशोर कुमार अग्रवाल. बैगा जनजाति के परम्परागत लोक गीत, संगीत एवं नृत्य. Int. J. Rev. and Res. Social Sci. 2018; 6(4):539-542.


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