Author(s): Vrinda Sengupta, Abhijeet Bhaumik, Satish Kumar Agrawal

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Address: Dr. (Mrs.) Vrinda Sengupta1, Dr. Abhijeet Bhaumik2, Dr. Satish Kumar Agrawal3 1Asstt.Prof., Deptt. of Sociology, Govt.T.C.L.P.G. College, Janjgir (C.G.) 2Principal, Lalit Shyam College, Baloda (C.G) 3Govt. College, Katghora

Published In:   Volume - 2,      Issue - 4,     Year - 2014


ABSTRACT:
01 अक्टूबर को वृद्ध दिवस के रूप में प्रतिवर्ष मनाया जाता है। ”कलयुग भी कितनी उल्टी गंगा बहा रहा है। माता-पिता को श्रवण ठोकर लगा रहा है।“ ”मैं अकेला ए दोइ जना, छेती नाही कोई। जे जम आगै उबरो, ता जुरा पछुँती आई।। कबीरदास जीवन-सत्य को उद्घाटित करती कबीर की इन पंक्तियों को देखिए, क्या कहते हैं कबीर? मैं अकेला हूँ और दो जन है, जिनमें कोई ’छूत’ अर्थात् भेदभाव नहीं है, यदि यम के आगे उबर भी गए तो जरा (वृद्धावस्था) पहुँच जाएगी। मनुष्य बेचारा अकेला है, प्राणी एकाकी है, वह दो तथ्यों से आमना-सामना करता है, एक तो मृत्यु और दूसरी जरा (बुढ़ापा)। यदि ईश्वरीय कृपा से वह मृत्यु से बच भी ले, आकस्मिक अकाल मृत्यु न भी हो तो सामने से वृद्धावस्था अवश्य स्वागत करेगी।


Cite this article:
Vrinda Sengupta, Abhijeet Bhaumik, Satish Kumar Agrawal. वृद्धावस्था] जिंदगी का तीसरा पड़ाव“ (बिलासपुर स्थित कल्याण कंुँज एवं बसेरा वृद्धाश्रम में निवासरत् वृद्धाओं का अध्ययन). Int. J. Rev. & Res. Social Sci. 2(4): Oct. - Dec. 2014; Page 226-228


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