Author(s): पूनम साहू, वासुदेव साहसी

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Address: श्रीमती पूनम साहू1’, डाॅ वासुदेव साहसी2 1शोध छात्रा, इतिहास अध्ययन शाला, पं. रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय रायपुर (छ.ग.) 2शोध निर्देशक, शा. जे योगानंदन छत्तीसगढ़ महाविद्यालय रायपुर (छ.ग)

Published In:   Volume - 1,      Issue - 2,     Year - 2013


ABSTRACT:
भारतीय समाज में आज भी महिलाओं को लेकर दोहरे मापदण्ड हैं। एक तरफ तो उन्हें पूजनीया, सरस्वती, लक्ष्मी जैसी उपमाएॅ देता है तो दूसरी तरफ उनका शोषण करने में भी पीछे नहीं रहता है। भारत में महिला अस्मिता और उसकी सुरक्षा, अधिकारों और सम्मान को लेकर आन्दोलन हुए हैं, परन्तु उन्हें पुरूष समाज की ओर से जितना समर्थन मिलना चाहिए नहीं मिला। घर परिवार और समाज में वाजिब सम्मान के लिए उसे लम्बा संघर्ष करना पड़ता है। बाहर एवं घर परिवार में हो रही हिंसा को मिटाए बिना समाज में महिला सशक्तिकरण का स्वप्न कभी पूरा नहीं हो सकता है। नये आर्थिक पर्यावरण के उद्भव, नई राजनीतिक व्यवस्था की स्थापना, आधुनिक शिक्षा पद्धति और चिन्तन शैली के प्रसार आदि के फलस्वरूप भारत में महिला सशक्तिकरण का आरंभ हुआ । महिला का स्थान प्राचीन काल से ही महत्वपूर्ण रहा है। महिला को ही सृष्टि रचना का मूल आधार कहा गया है। महिलाएॅ समाज का एक महत्वपूर्ण और आवश्यक अंग है क्योंकि विश्व की आधी जनसंख्या तकरीबन इन्हीं की है। महिलाएॅ आज भी पूरी तरह सशक्त नहीं हुई हैं, इसका सबसे बड़ा कारण आए दिन होने वाली तमाम घटनाएॅ हैं, जिसमें वे तरह-तरह की हिंसा का शिकार हो रही हैं। बाहर तो वे हिंसा का शिकार होती है साथ ही अपने परिवार के पु़़़रुष और दूसरी महिला सदस्यो के द्वारा भी उन्हें प्रताड़ित किया जाता है। बाहर एवं घर परिवार मे हो रही हिंसा को मिटाए बिना समाज में महिला सशक्तिकरण का स्वप्न कभी पूरा नहीं हो सकता है।(1) महिला सशक्तिकरण का अर्थ है, महिलाओं में आत्म सम्मान, आत्म निर्भरता व आत्मविश्वास जागृत करना है। महिला सशक्तिकरण के लिए वर्तमान में सबसे बड़ी आवश्यकता उनको अपने अधिकारों एवं कर्तव्यो के प्रति सजग होने की है। यदि कोई महिला अपने अधिकारों एवं कर्तव्यो के प्रति सजग और आत्मनिर्भर है, तो उसका आत्मसम्मान अवश्य ऊॅचा होगा और वे देश कि विकास में अपना महत्वपूर्ण योगदान दे सकती है।


Cite this article:
पूनम साहू, वासुदेव साहसी. महिला सशक्तिकरण दशा एवं दिशा. Int. J. Rev. & Res. Social Sci. 1(2): Oct. - Dec. 2013; Page 57-59 .


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