Author(s): वृन्दा सेनगुप्ता

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Address: (श्रीमती) वृन्दा सेनगुप्ता सहायक प्राध्यापक, समाजशास्त्रए शा. ठा. छेदीलाल स्नातकोत्तर महाविद्यालय, जांजगीर, जिला-जांजगीर-चांपा

Published In:   Volume - 2,      Issue - 2,     Year - 2014


ABSTRACT:
अनुसूचित जनजातियाँ (एस.टी.) देश की कुल जनसंख्या की 8 प्रतिशत है। सन् 2001 में उनकी संख्या लगभग 820 लाख थी। उन्हंे दो भागों में विभाजित किया जा सकता है- 1. सीमा क्षेत्रीय जनजातियाँ 2. गैर-सीमा क्षेत्रीय जनजातियाँ वे जनजातियाँ या जनजातीय समुदाय या ऐसी जनजातियों या जनजातीय समुदायों के हिस्से या समूह जिन्हें उपर की धारा के तहत संविधान के प्रयोजन हेतु अनुसूचित जनजातियाँ माना जाता है, 1950वें आदेश के अनुसार 212 जनजातियों को अनुसूचित जनजातियां घोषित किया गया है। जनजातियां नृजातिक समूह ;म्जीदपब ळतवनचेद्ध हैं। विभिन्न जनजातियों की अपनी संस्कृतियाँ, यथाबोली, जीवन-शैली, सामाजिक संरचनाएँ, रीति-रिवाज, संस्कार, मूल्य आदि हैं जो उन्हें प्रमुख गैर जनजातीय कृषक सा. समूहों से अलग करती है। इसी के साथ, इनमें से कई जनजातियाँ स्थायी रूप से खेतिहर बन गई हैं और इनमें सा. विभिन्नताएँ विकसित हो गई हैं। इनकी कृषि समस्याएँ, कुछ सीमा तक, वे ही थीं और हैं जो अन्य गैर-जनजातीय कृषकों की रही है। कई विद्वानों ने जनजातीय आंदोलन को कृषक आंदोलन के रूप में माना है (गफ़, 1974; देसाई, 1979; गुहा, 1983)। रंगा और सहजानंद सरस्वती जैसे किसान नेताओं ने जनजातियों को ‘आदिवासी किसान’ कहा है। के. एस. सिंह ने भी इन विद्वानों और राजनीतिक कार्यकर्ताओं से सहमति प्रकट की है। वे कहते हैं, ‘ऐसा दृष्टिकोण जनजातीय सा. बनावट की विभिन्नताओं के महत्व को कम आंकता है जिसका जनजातीय आंदोलन एक हिस्सा है, दोनों संरचनात्मक रूप से जुड़े हुए हैं’ (1985)।


Cite this article:
वृन्दा सेनगुप्ता . स्वतंत्रोपरांत आंदोलन में जनजातीय भूमिका. Int. J. Rev. & Res. Social Sci. 2(2): April-June 2014; Page 128-132 .


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