Author(s): अर्चना शर्मा

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Address: डॉ0 अर्चना शर्मा असिस्टेंट प्र¨फेसर, प्राचीन भारतीय इतिहास, संस्कृति एवं पुरातत्त्व विभाग, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी

Published In:   Volume - 2,      Issue - 4,     Year - 2014


ABSTRACT:
नगरीकरण प्राचीन भारतीय सामाजिक इतिहास की महत्त्वपूर्ण घटना है। इसके फलस्वरूप अनेक परिवर्तन घटित हुए अ©र मान्य आदर्श तथा यथार्थ जीवन में व्यतिरेक दिखने लगा। धर्मशास्त्र्ा जहाँ आदर्श क¨ दृष्टि में रखकर विधिय¨ं का निर्माण करते हैं, वहीं ल©किक साहित्य की कुछ रचनाएँ सशक्तरूप से समाज के यथार्थ क¨ प्रस्तुत करती हैं। मृच्छकटिक इन विरल रचनाअ¨ं में से एक है। मृच्छकटिक एक प्रकरण है। निर्धारित मानक के अनुसार प्रकरण का इतिवृत्त कल्पित एवं ल¨काश्रित ह¨ता है। नायक, मंत्र्ाी, ब्राह्मण या वैश्य में से क¨ई एक ह¨ सकता है। नायक धीर प्रशान्त क¨टि का ह¨ता है तथा विघ्न¨ं से युक्त ह¨ता है। प्रकरण की नायिका कुलस्त्र्ाी या वेश्या ह¨ती है। कहीं-कहीं द¨न¨ं नायिकायें ह¨ती हैं।1 यह समस्त लक्षण मृच्छकटिक पर चरितार्थ ह¨ता है। प्रकरण का इतिवृत्त काल्पनिक ह¨ता है इससे यह नहीं समझना चाहिए कि वह सत्य से, यथार्थ से बहुत दूर है। सत्य कटु ह¨ता है। कानून आक्ष्¨प-प्रत्याक्ष्¨प के लिए प्रमाण की अपेक्षा रखता है, इससे बचने के लिए रचनाकार ‘कल्पित’ के आवरण में समाज के यथार्थ क¨ प्रकाशित करता है। मृच्छकटिक क¨ प्रायः गुप्तकालीन रचना माना जाता है।2 इसकी घटनाअ¨ं का स्थल प्रसिद्ध नगर उज्जयिनी है। इसके इतिवृत्त का आधार भासकृत रूपक ‘चारुदत्त’ है जिसे ‘दरिद्रचारुदत्त’ भी कहा जाता है। भास की यह कृति केवल चार अंक¨ं की है जबकि शूद्रक का मृच्छकटिक दस अंक¨ं का रूपक है। भास की कथा का मुख्य आधार चारुदत्त अ©र बसन्तसेना का प्रेम प्रसंग है।


Cite this article:
अर्चना शर्मा. मृच्छकटिक मंे नगरीय समाज का यथार्थ. Int. J. Rev. & Res. Social Sci. 2(4): Oct. - Dec. 2014; Page 208-211


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