Author(s): प्रज्ञा त्रिवेदी

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Address: प्रज्ञा त्रिवेदी शोध-छात्रा, रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय, रायपुर छ.ग.

Published In:   Volume - 4,      Issue - 1,     Year - 2016


ABSTRACT:
मनुश्य को समाज में अपने जीवन का अस्तित्व बनाये रखने के लिए बहुत से संघर्श करने पड़ते हैं जिससे उसे नाना प्रकार के अनुभव प्राप्त होते रहते हैं। यह अनुभूति काव्य में भाव-पक्ष से सम्बन्ध रखती है जबकि अभिव्यक्ति काव्य के शिल्प-पक्ष से सम्बन्ध रखती हैं पर दोनों ही एक दूसरे के पूरक हैं। अनुभूति का सम्बन्ध संवेदना से होता है और साहित्य का गहरा सम्बन्ध साहित्यकार की संवेदनाओं से होता है। किसी भी अनुभूति का स्वरूप वास्तव में प्रत्येक रचनाकार के मानसिक-स्तर पर निर्भर करता है और यह निर्भरता ही काव्य में समुचित भावों को उत्पन्न करने में सहायक होती है। स्ंावेदना के महत्व की बात यदि हम करते हैं तो सबसे पहले तो यह समझना चाहिए कि मनुश्य जन्म लेने के कई वर्शों तक संवेदना एवं अनुभूति से काम लेता है क्योंकि बुद्धि या कल्पना का समावेश मानव-मन में बहुत बाद में होता है। एक शिशु रूप में वह समाज में आकर समाज से अनुभव ग्रहण करता है और उन अनुभव को ग्रहण करने हेतु उसे समाज की गतिविधियों का अवलोकन कर उन्हें आत्मसात करना आवश्यक हो जाता है बल्कि बहुत सी ऐसी भी सामाजिक गतिविधियाॅ होती हैं जिनका प्रभाव साहित्यकार पर बहुत गहरे तक पड़ता है। केदारनाथ सिंह का जन्म 7 जुलाई 1934, चकिया नामक गाॅव में हुआ जोकि बलिया जिला, उत्तर प्रदेश में स्थित है और बिहार की सीमा से लगा हुआ है। इनके इलाके से गंगा और सरयू जैसी प्रसिद्ध नदियाॅ बहती हैं, जिनका इनकी जातीय और सांस्कृतिक स्मृति-लोक से अविच्छिन्न संबंध है। इस क्षेत्र में प्राकृृतिक सुशमा भरी पड़ी है। ज़्यादातर लोग किसान हैं और केदार अपने गाॅव के अकेले ऐसे व्यक्ति हैं जिन्होंने उच्च शिक्षा प्राप्त कर साहित्य के क्षेत्र में इतनी प्रगति की।


Cite this article:
प्रज्ञा त्रिवेदी. केदारनाथ सिंह की कविताः संवेदना के संदर्भ में. Int. J. Rev. and Res. Social Sci. 4(1): Jan. - Mar., 2016; Page 31-34.


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