Author(s): वैभव कुमार पाण्डेय, आभा तिवारी

Email(s): vaibhav.pandeycg@gmail.com

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Address: वैभव कुमार पाण्डेय, डॉ. आभा तिवारी
साहित्य एवं अध्ययन शाला, पं. रविशंकर शु. वि वि. रायपुर
*Corresponding Author

Published In:   Volume - 5,      Issue - 4,     Year - 2017


ABSTRACT:
मानव से समाज है और समाज से भाषा या यह भी कह सकते हैं कि मनुष्य की भाषा परिवार से समाज तक कायम है। इस समाजभाषा को हम श्रीलाल शुक्ल के पहला पड़ाव उपन्यास से बेहतर तरीके समझ सकते हैं। पहला पड़ाव को एक सामाजिक उपन्यास कहना बेहतर होगा, क्योंकि श्री शुक्ल ने इस उपन्यास में रोजी-रोटी के लिए पलायन पर जाने वाले दिहाड़ी मजदूरों के जीवन का एक जीवंत चित्रण किया है। शुक्ल ने इस उपन्यास में छत्तीसगढ़ के बिलासपुर, दुर्ग संभाग से आने वाले मजदूरों को केन्द्र बिंदु में रहकर उनके सामाजिक जीवन को समाज के सामने लाने का प्रयास किया है। समाज के मजदूर, जाति-वर्ग, मालिक वर्ग और बंधुआ जीवन जीने वाले लोगों की संघर्षगाथा पहला पड़ाव में जीवन का ठहराव भी है, दर्द भी और घाव भी है। उपन्यास का सामाजिक पक्ष बेहद मजबूत है और इसमें हिन्दी, उर्दू, अंग्रेजी, सहित क्षेत्रीय भाषा भोजपूरी और छत्तीसगढ़ी के भाषायी तत्व विद्यमान है।


Cite this article:
वैभव कुमार पाण्डेय, आभा तिवारी. श्रीलाल शुक्ल के पहला पड़ाव का समाजभाषा-वैज्ञानिक अध्ययन. Int. J. Rev. and Res. Social Sci. 2017; 5(4):193-196 .


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