Author(s): कुसुमलता

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Address: कुसुमलता
शोधार्थीए बरकतुल्लाै विश्वएविद्यालयए भोपालए मण्प्रण्
*Corresponding Author

Published In:   Volume - 6,      Issue - 4,     Year - 2018


ABSTRACT:
प्रस्तुसत शोध आलेख के माध्यंम से वर्तमान संदर्भों में आतंकवाद की स्था0पना करते हुए आतंकवाद का मनोविज्ञानएउसका वैश्विकए राजनीतिक और सामाजिक परिप्रेक्ष्यन में आतंकवाद के उत्सा तक पहुंचने का प्रयास किया गया है। दरअसल विगत शताब्दीस में आतंकवादी घटनाओं.परिघटनाओं की तकनीकी में बहुआयामी परिवर्तन हुआ है। आधुनिक प्रौद्योगिकी उन्नाति व विस्ता‍र ने आंतकवादियों को नई गतिशीलता और मारक क्षमता प्रदान की है। सभी प्रकार के राजनीतिक आंदोलनए चाहे उनका राजनीतिक अभिप्राय कुछ भी होए उन्होंलने पहले पहल इसी प्रकार की रणनीति का प्रयोग करना आरंभ किया। गोयाए महान राजनीतिक चिंतक अडोल्फ हिटलर के अधीन नाजी जर्मनी व स्टा लिन के अधीन सोवियत संघ के सर्वाधिकार शासन ने अपनी राज्यक नीति के रूप में वास्त विक आतंकवाद को ही प्रत्यअक्ष अथवा परोक्ष रूप में अपनाया था। हालांकिए वे इसे सार्वजनिक रूप से कभी स्वीिकार नहीं करते थे।उन राज्योंव में यातनाए प्रताड़ना और प्राणदंड जैसी तकनीकें किसी कानून प्रतिबंधों के बिना अपनाई जाती थीं ताकि लोग भयवश उनकी नीतियों और विचारधाराओं का पालन करेंए निर्वहन करें।उल्लेनखनीय है कि स्टाीलिन की तुलना में माओ ने आतंक का साम्राज्य अधिक व्यानपक रूप से फैलाया। ईरान ने भी खुमैनी के शासन काल के दौरान अधिकतर हिंसक घटनाओं को झेला था जो प्रायरू वामपंथियों व राज्या द्वारा आयोजित की जाती थीं।अधिकांश लोगों का मानना है कि उपेक्षितए उत्पी डि़त और वंचित लोगों द्वारा न्यािय पाने की सामूहिक कार्यवाही ही आतंकवाद है। औरए इस प्रक्रिया में वे हिंसा का आश्रय लेते हैं। परंतु कतिपय संदर्भों में राज्य प्रत्यकक्ष या अप्रत्यहक्ष रूप से आतंकवाद का समर्थन नहीं करता है अपितु प्रोत्सायहन भी देता है। ऐसे में आतंकवादियों का संगठित समूह भी राज्ये त्तरर अभिकर्त्तार के रूप में कार्य करता है। इस आलोक में केग्जैली और विट्टकॉफ जैसे विद्वानों की पूर्ण मान्ययता है कि राज्यय आतंकवाद को किसी भी उद्देश्य के मूल्यां कन में शामिल किया जाना चाहिएए क्योंवकि हिंसात्माक आतंकवाद के कुछ सर्वाधिक निष्ठुूर कार्य राज्यी द्वारा उनके विरूद्ध किए जाते हैं जो उनका विरोध करते हैं।मनोवैज्ञानिक रूप से आतंकवाद का जन्म मानस की शून्याता से होता है। अर्थशास्त्री य रूप से आतंकवाद का जन्मो सापेक्षिक वंचितवाद की अनुभूति से होता है। समाजशास्त्री य दृष्टि से आतंकवाद का जन्म प्रवृत्ति की अनियमित स्थिति के चलते होता है। अस्तुषए आतंकवाद कोई विचारधारा या सिद्धांत नहीं माना जा सकता हैए अपितु यह मूल्यृ आधारित अतिव्यतहृतए दुर्व्यिवह्त तथा अशुद्धि परिवेष्टित अवधारणा है।


Cite this article:
कुसुमलता. आतंकवाद का मनोवैज्ञानिक स्वसरूप एवं विश्ले षण. Int. J. Rev. and Res. Social Sci. 2018; 6(4):547-550.


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