Author(s): अर्पिता चटर्जी

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Address: डाॅ. अर्पिता चटर्जी
एसोशिएट प्रोफेसर, प्रा0भा0इ0सं0 एवं पुरातत्त्व विभाग, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी
*Corresponding Author

Published In:   Volume - 7,      Issue - 1,     Year - 2019


ABSTRACT:
अर्थशास्त्र में नगर योजना सम्बन्धी विविध पक्षों के अवलोकन के उपरान्त निष्कर्षतः कहा जा सकता है कि आचार्य ने इस सम्बन्ध में जो भी सुझाव दिये हैं वे पूर्व परम्पराओं पर ही आधारित हैं। परन्तु उनके व्यवहारिक पक्ष को स्पष्ट करने का प्रथम श्रेय उन्हें अवश्य जाता है। कौटिल्य ने नगर योजना में नगरों की सुरक्षा को सबसे पहले प्राथमिकता दी। नगर निवेश के अन्तर्गत विविध वास्तु-संरचनाओं एवं पुर वासियों के वर्ण एवं जातिगत भेद के आधार पर स्थान निर्धारण करते समय आचार्य ने उनके प्रकार्यात्मक उपयोगिता को विशेष महत्त्व दिया। चँूकि नगर राज्य के शौर्य प्रदर्शन का एक माध्यम भी होता था अतः उनके नागरक वास्तु विषयक सन्दर्भों में भव्यता सर्वत्र दिखती है। अर्थशास्त्र में वर्णित नगर-वास्तु सम्बन्धी ये परम्परा आगे भी चलती रही। भले ही विशुद्ध रूप से वास्तु-शास्त्र सम्बन्धी ग्रंथ मौर्य काल के कई शताब्दियों बाद लिखे गये, परन्तु अन्य साहित्य में बिखरे हुए वास्तु शास्त्रीय शब्दों से इस तथ्य की पुष्टि अवश्य होती है। कालान्तर में विशुद्ध रूप से इस विषय पर ‘मानसार’ एवं ‘समरांगणसूत्रधार’ जैसे ग्रंथ भी उन्हीं मानकों का निर्वहन करते हैं।


Cite this article:
अर्पिता चटर्जी. प्राचीन भारत में नगर-योजना (कौटिलीय अर्थशास्त्र के विशेष सन्दर्भ में). Int. J. Rev. and Res. Social Sci. 2019; 7(1):251-259.


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