Author(s): राजेश अग्रवाल

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Address: राजेश अग्रवाल सहायक प्राध्यापक, गुरूकुल महिला महाविद्यालय, रायपुर छत्तीसगढ़

Published In:   Volume - 1,      Issue - 2,     Year - 2013


ABSTRACT:
जुलाई 1991 में नरसिंम्हा राव सरकार के तत्कालीन वित्त मंत्री जी श्री मनमोहन सिंह के प्रयासों से भारत में आर्थिक सुधारों के अन्तर्गत वैश्वीकरण, उदारीकरण एवं निजीकरण की नीति लागू हुए जिसके परिणामस्वरूप भारतीय अर्थव्यवस्था की विकास दर में अशातीत वृद्धि हुई। वैश्विक मंदी की अवधि में भी भारतीय अर्थव्यवस्था की विकास दर प्रभावशाली रही। वर्ष 2007-08 में भारतीय अर्थव्यवस्था 9.3 प्रतिशत विकास दर 2008-09 में 6.7 प्रतिशत वर्ष 2009-10 में 8.4 प्रतिशत, वर्ष 2010-11 में 8.4 प्रतिशत तथा वर्ष 2011-12 में 6.9 प्रतिशत संवृद्धि दर प्राप्त करने में भारतीय अर्थव्यवस्था सफल रही है उपरोक्त लगातार महत्वपूर्ण विकास दर के लक्ष्यों को प्राप्त करने के बाद भी भारतीय अर्थव्यवस्था आज भी संकट के दौर से गुजर रही है तथा विभिन्न वैश्विक संगठन और अर्थशास्त्री भारत को आर्थिक सुधारों के मार्ग पर लौटने का सुझाव दे रहे है। अन्तर्राष्ट्रीय मुद्राकोष ने भारत की विकास दर को वापस पटरी पर लाने तथा विकास दर के पूर्व लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए ढाँचागत सुधारों के सुझाव दिये है। इन सुधारों में अधोसंरचना का विकास, वित्तीय समेकन तथा महँगाई पर नियंत्रण शामिल है। आई.एम.एफ. के अनुसार अनुकूल व्यापक आर्थिक नीतियों तथा भारतीय अर्थव्यवस्था का परंपरागत आर्थिक ढाँचा ने भारतीय अर्थव्यवस्था को वैश्विक मंदी से निपटने के लिए सक्षम बनाया है इसके बाद भी वर्तमान में भारत के आर्थिक विकास दर में गिरावट का दौर जारी है अतः भारतीय परंपरागत आर्थिक ढाँचे को नकारात्मक विकास दर के लिए जिम्मेदार ठहराना उचित नहीं है। भारतीय आर्थिक विकास दर को पुनः गति देने के लिए ढाँचागत सुधारों से अधिक महत्वपूर्ण वित्तीय समेकन है। वित्तीय समेकन के लिए महँगाई दर में नियंत्रण सर्वाधिक महत्वपूर्ण है।


Cite this article:
राजेश अग्रवाल . भारतीय अर्थव्यवस्था पर आर्थिक सुधारों का प्रभाव. Int. J. Rev. & Res. Social Sci. 1(2): Oct. - Dec. 2013; Page 39-40


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