Author(s): बी. एन. मेश्राम

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Address: डाॅ. (श्रीमति) बी. एन. मेश्राम
(प्राचार्य) प्राध्यापक, राजनीति शास्त्र, शासकीय डाॅ. बाबा साहेब भीमराव अम्बेडकर स्नातकोत्तर महाविद्यालय डोंगरगांव, जिला - राजनांदगांव (छ.ग.)
*Corresponding Author

Published In:   Volume - 6,      Issue - 4,     Year - 2018


ABSTRACT:
जनजाति मानव समाज के एक ऐसे अंग के सदस्य हैं, जो कि मानव संस्कृति के प्रायः आदि अवस्था में रहते हैं और इस कारण वे अत्यधिक पिछड़े हुए होते है। अगर इनकी तुलना सभ्य समाज से की जाये तो यह लोग बहुत पिछड़े हुए हैं। ये आदिकालीन धर्म, प्रथा और परम्परा को मानते हुए अपनी आदिकालीन आर्थिक एवं सामाजिक व्यवस्था के अन्तर्गत निवास करते हैं। इन्हें अनेक नामों से पुकारा जाता है - कोई इन्हें आदिवासी कहता है, तो इन्हें आदिमजाति और कोई जनजाति के नाम से इन्हें जानते हैं। भारतीय संविधान के अनुच्छेद - 342 में इन्हें अनुसूचित जनजातियों के नाम से प्रस्तावित किया गया है। सन् 1991 के जनगणना के अनुसार भारत में आदिवासियों की संख्या 6.758 करोड़ थी। यह इंग्लैण्ड के जनसंख्या के बराबर ही थी। जनजातियों की संख्या देश के कुल आबादी की 8.08 प्रतिशत थी। जनजातियों की संख्या आफ्रीका के बाद भारत में द्वितीय स्थान पर है। भारत में ये जनजातियाँ समूचे क्षेत्र में फैली है। अलग - अलग राज्यों में इनकी संख्या अलग - अलग है। यह 100 से लेकर लाखों में है और इनकी संख्या सबसे अधिक मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में मानी जाती है।


Cite this article:
बी. एन. मेश्राम . भारत में जनजातियाँ:- छत्तीसगढ़ के विषेष संदर्भ में. Int. J. Rev. and Res. Social Sci. 2018; 6(4): 521-524.

Cite(Electronic):
बी. एन. मेश्राम . भारत में जनजातियाँ:- छत्तीसगढ़ के विषेष संदर्भ में. Int. J. Rev. and Res. Social Sci. 2018; 6(4): 521-524.   Available on: https://ijrrssonline.in/AbstractView.aspx?PID=2018-6-4-23


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