Author(s): कुबेर सिह गुरुपंच, राजु चन्द्राकर

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Address: कुबेर सिह गुरुपंच1, राजु चन्द्राकर2
1प्राचार्य, देव संस्कृति कॉलेज आफ एजुकेशन एंड टेक्नोलॉजी खपरी दुर्ग, छत्तीसगढ़ भारत ।
2शोधार्थी भूगोल विभाग, देव संस्कृति विश्वविद्यालय ग्राम साकरा, कुम्हारी जिला दुर्ग, छत्तीसगढ़ भारत।
*Corresponding Author

Published In:   Volume - 10,      Issue - 3,     Year - 2022


ABSTRACT:
भारतीय समाज में विभिन्न प्रकार के जनजाति का होना हमारे संस्कृति का धरोहर हैं। जिसने से कमार जनजाति शासन द्वारा घोषित एक विशेष पिछड़ी जनजाति हैं। इस जनजाति को गोड जनजाति की उपजाति माना जाता है। यह जनजाति जो सदियों से जंगल में रहते आ रहे हैं। इस जनजाति का आर्थिक व सामाजिक विकास नहीं हो पाया है। इसी कारण यह जनजाति में सदियों के बाद भी विकासात्मक परिवर्तन देखने को नहीं मिला है। या जनजाति अत्यंत गरीब पिछड़ी और मुख्यधारा से विमुख हैं। यह जनजाति छत्तीसगढ़ के गरियाबंद जिले की गरियाबंद छुरा, मैनपुर तथा धमतरी जिले के नगरी तथा मगरलोड विकासखंड में मुख्यता निवास करते हैं यह जनजाति छोटे झोपड़ी काबिले व जंगल में निवास करते हैं। यह जनजाति का कोई अपना लिखा हुआ विकास नहीं है। कमार जनजाति सीधा सरल तरीके से जीवनयापन करते हैं ये जनजाति तीर धनुष भाले और शरीर पर वस्त्र धारण करते हैं। जिसे इन जनजाति का अलग पहचान बन जाते हैं। कमार जनजाति के दो उप जाती हैं पहाड़ पत्ती और बंदरजीवा हैं। छत्तीसगढ़ के कमार जनजाति अपनी उत्पत्ति मैनपुर विकासखंड के देव डोगर ग्राम में बताते हैं।


Cite this article:
कुबेर सिह गुरुपंच, राजु चन्द्राकर. कमार जनजाति के समाजिक आर्थिक स्थिति का भौगोलिक अध्ययन. International Journal of Reviews and Research in Social Sciences. 2022; 10(3):96-0.

Cite(Electronic):
कुबेर सिह गुरुपंच, राजु चन्द्राकर. कमार जनजाति के समाजिक आर्थिक स्थिति का भौगोलिक अध्ययन. International Journal of Reviews and Research in Social Sciences. 2022; 10(3):96-0.   Available on: https://ijrrssonline.in/AbstractView.aspx?PID=2022-10-3-2


संदर्भ ग्रंथ सूची
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