Author(s): Vrinda Sengupta, Vandana Pandey

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Address: Dr. Mrs. Vrinda Sengupta1, Ku. Vandana Pandey2
1Asstt. Prof. Sociology, Govt. T.C.L.P.G. College, Janjgir (C.G.)
2Asstt. Professor (Hindi), Govt T.C.L..P.G. College Janjgir

Published In:   Volume - 3,      Issue - 2,     Year - 2015


ABSTRACT:
साहित्य और समाज का अटूट संबंध है। जिस प्रकार सूर्य की किरणों से जगत में प्रकाश फैलता है, उसी प्रकार साहित्य के अवलोकन से समाज में चेतना का संचार होता है। साहित्य समाज के निर्माण में योग देता है और समाज के द्वारा ही साहित्य का निर्माण होता है। अतः दोनों एक दूसरे के पूरक है। वैश्वीकरण, भूमण्डलीय करण और वैश्विक अर्थव्यवस्था द्वारा गढ़े गए शब्द है। वैश्वीकरण कोई आकस्मिक घटना या परिस्थिति नहीं है, बल्कि यह एक अनवरत प्रक्रिया है जो लंबे समय से चली आ रही है। इसे पूॅजीवाद का सबसे आंतरिक स्तर कहा जाए तो अतिश्याक्ति नहीं होगी, जिसके अंतर्गत अंदरुनी और बाहरी दोनों ही तरह से विस्तार की क्रिया मौजूद रहती है। ‘‘ वैश्वीकरण और शिक्षा ’’ अमूर्त एसा विषय है। अतः वैश्वीकरण की आंतरिक शक्तियों और उसके स्वभाव का थोड़ा विस्तार से विश्लेषण आवश्यक जान पड़ता है। अगर हम इतिहास के पाॅच सौ वर्षों पर नजर दौड़ाते हैं तो पूॅजीवादी, साम्राज्यवादी शोषण का बदला नाम वैश्वीकरण है। वास्तव में ‘‘ वसुधैव कुटुम्बकम् ’’ का भ्रम पैदाकर दुनिया गाॅव में तब्दील हो रही है, कहना! कितना सम्मोहन पैदा करता है। वैश्वीकरण एक ऐसे वैश्विक अभिजात वर्ग की संरचना कर रहा है। जो अमीर है, चलायमान और सयुक्त है। दुनिया का बहुमत यानि आमजन परिधि की ओर समान ढकेला जा रहा है। यह वैश्वीकरण ही है जो देश के रुप में नहीं बल्कि ‘‘ बाजार ’’ के रुप में पहचानता है। ‘‘ बोलो तुम क्या-क्या खरीदोगे ’’ की तर्ज पर पूरे विश्व में दौड़ लगाता है।


Cite this article:
Int. J. Rev. & Res. Social Sci. 3(2): April- June. 2015; Page 62-65. वैश्वीकरण के परिदृश्य में लुप्त होता साहित्य और संस्कृति. Int. J. Rev. & Res. Social Sci. 3(2): April- June. 2015; Page 62-65.


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