Author(s): सुषीला कुजूर, आभा रूपेन्द्र पाल

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Address: सुषीला कुजूर1, आभा रूपेन्द्र पाल2
1शोधार्थी, इतिहास अध्ययन शाला, पंडित रविषंकर शुक्ल विश्व विद्यालय, रायपुर (छ.ग.)
2प्राध्यापक एवं विभागाध्यक्ष, इतिहास अध्ययन शाला, पंडित रविषंकर षुक्ल विष्वविद्यालय, रायपुर

Published In:   Volume - 6,      Issue - 2,     Year - 2018


ABSTRACT:
नारी जो समाज की धुरी है वह समानांतर सिनेमा की भी केन्द्र बिन्दु रही है। नारी भारतीय समाज में आज भी दो राहों पर खड़ी है-परम्परावादी बनाम आधुनिक-आधुनिक की परिभाषा हर बार दषक बा दषक बदल जाती है-समयानुसार कभी उसके पहनावे से, कभी उसके दिखने, रूप-रंग से-पर वास्तव में आधुनिकता का अर्थ ‘‘सोच‘‘ से है। इस दृष्टिकोण से समान्तर सिनेमा में नारी के इन दोनो रूपों को बखूबी दो विभिन्न कथानक में पिरोकर निर्देषकों द्वारा उभारा गया। सिनेमा का प्रारंभिक इतिहास समानांतर सिनेमा के बहुत पहले प्रारंभ हो चुका था। एक आंदोलन के रूप में समानांतर सिनेमा का आरंभ छठे दषक में होता है। साठ के दषक के मध्य में बौद्धिक समाज में एक वैचारिक आंदोलन का उदय हुआ। बौद्धिक प्रतिभाओं का सिनेमा के प्रति रूझान बढ़ा और फिल्म अपने आदर्षवाद को छोड़कर यथार्थवाद की ओर आगे बढ़ी। यथार्थ को कहने का साहस समाज की वास्तविक तस्वीर तथा उद्देश्यपूर्ण समानांतर फिल्में विकसित हुईं जिसके महत्वपूर्ण फिल्मकार मुजफ्फर अली, राजिंदर सिंह बेदी, श्याम बेनेगल, बासु भट्टाचार्य, उत्पलेंदु चक्रवर्ती, नंदिता दास आदि है। 70 का दषक भारतीय सिनेमा में समांतर सिनेमा का दौर था। समांतर सिनेमा की स्त्रियाॅं विद्रोहिणी तथा अपने लिए नये राह को तलाषती स्त्रियांॅ हैं जिन्होने समाज की वास्तविकता को यथार्थ के साथ समान्तर सिनेमा में प्रस्तुति दी है। व्यावसायिक सिनेमा (मुख्यधारा कमर्षियल) में स्त्री को कोमलांगी तथा शेग की वस्तु मात्र बनाया गया था किन्तु समांतर सिनेमा में बदलते सामाजिक-राजनीतिक परिदृष्य में स्त्रियांॅ स्वयं को एक मनष्य के रूप में प्रतिष्ठित की यही समांतर सिनेमा की ताकत है।


Cite this article:
सुषीला कुजूर, आभा रूपेन्द्र पाल. ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में समानांतर सिनेमा में पारंपारिकता तथा आधुनिकता का निर्वहन करती स्त्री. Int. J. Rev. and Res. Social Sci. 2018; 6(2): 151-156 .


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